Spirit of a Fighter – Chapter 841
"और वो लौटकर नहीं आए," मैंने पूरा किया।
माँ ने सिर हिलाया। बस एक बार। फिर आँचल से आँखें पोंछीं, पर पोंछते-पोंछते नज़र फाटक पर जम गई।
कालू काका ने कुदाल पकड़कर कदम बढ़ाया।
"रुको। रात के इस वक़्त कोई अच्छा आदमी दस्तक नहीं देता। मैं देखता हूँ कौन है।"
"कालू," माँ ने रोका। "जाने मत देना।"
कालू काका फाटक तक गए। पहले कान लगाया, फिर कील खोली। फाटक धीरे से खुला। बाहर अंधेरा था — इतना गाढ़ा कि लगा रात ने कोई चादर तान दी हो।
कोई नहीं था।
कालू काका बाहर निकले। चारों तरफ़ देखा। सड़क सूनी थी। नीम के पेड़ की पत्तियाँ भी नहीं हिल रही थीं। और तभी — वो झुके। ज़मीन से कुछ उठाया।
वो लौटे, और उनके हाथ में एक छोटी सी पोटली थी। ज़र्द कपड़े की, जिस पर कोई निशान बना था।
"फाटक के नीचे पड़ी थी," कालू काका ने कहा। "जैसे किसी ने दस्तक देकर ये रख दी और चला गया।"
माँ ने पोटली देखी और होंठ फिर काँपने लगे।
"ये…" वो बोलीं, और आवाज़ निकल ही नहीं रही थी। "ये वही पोटली है। वही ज़र्द कपड़ा। वीर, ये वही है जो उस रात भी फाटक के नीचे मिली थी।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। पर मैंने हिम्मत की।
"खोलो।"
कालू काका ने गाँठ खोली। पोटली में सिर्फ़ तीन चीज़ें थीं — सूखी लाल मिर्च, एक टूटा हुआ सिक्का, और एक छोटी पर्ची, जिस पर दो लाइनें लिखी थीं। अक्षर किसी के हाथ के नहीं, जैसे किसी ने खींचकर लिखे हों।
माँ ने पर्ची मेरी तरफ़ बढ़ा दी। मैंने पढ़ा — "जो तेरा नहीं, वो तेरा बनेगा। जो तेरा है, वो तू खोएगा।"
टिंकू ने गर्दन आगे करके देखा। "इसका मतलब क्या है?"
"मतलब ये कि कोई हमें कह रहा है," रणवीर सिंह ने पीछे से कहा, "कि हमारे पास जो कुछ है, वो एक-एक करके उसका होने वाला है।"
माँ ने एक कदम पीछे हटकर दीवार का सहारा लिया। मैंने उन्हें सँभाला। उनका हाथ मेरे कंधे पर रखा। उँगलियाँ काँप रही थीं।
"माँ।"
"मैं तुझे बताना चाहती थी," वो अचानक बोलीं, और आवाज़ टूट गई। "उस रात। बीस साल पहले। तेरे पापा ने भी ये पर्ची पढ़ी थी। और फिर भी गए। और मैंने उन्हें रोका नहीं। क्योंकि मुझे लगा कि जो आदमी अपनी ताकत पर भरोसा करता है, वो नहीं डरता। मैं गलत थी।" उनका अगला शब्द गले में ही फँस गया। "तेरे पापा डरे हुए थे। उस रात उनके हाथ काँप रहे थे। मैंने देखा था। और मैं कुछ नहीं बोली।"
"और मुझसे छुपाया? तेरा वही सच डरा हुआ था जो अब मुझमें है।"
"मैं तुझे बताना चाहती थी। पर डरती थी कि तू बदला लेने निकल पड़ेगा। और मैं तुझे खो दूँगी। पहले तेरे पापा को खोया। अब तुझे नहीं खो सकती।"
वो मेरे पास आईं। चेहरा दोनों हाथों में लिया। उनका हाथ ठंडा था, और मेरे गाल पर उँगलियों की कँपकँपाहट साफ़ महसूस हुई। फिर मेरा माथा अपने माथे से लगा दिया। हम दोनों चुप रहे। बस एक लंबी साँस ली।
गुड़िया रोते हुए बीच में आ गई। माँ के पैर पकड़कर मुँह बिचकाया। "माँ, तू रो रही है?"
माँ ने उसे उठा लिया।
और तभी टिंकू ने अपनी जेब से मिठाई का डिब्बा निकाला। ढक्कन खोला। अंदर लड्डू थे। एक-एक करके सबको दे दिए — माँ को, गुड़िया को, कालू काका को, रणवीर सिंह को, और मुझे।
"अबे, ये मिठाई क्यों?" मैंने पूछा।
टिंकू ने बड़ी गंभीरता से कहा, "जब घर में कोई रोता है तो मिठाई का काम बढ़ जाता है। ये मेरी दादी कहती थीं।"
मैं उसे देखता रह गया। और फिर मेरे अंदर कुछ फूट पड़ा। मैं हँसा। ज़ोर से, भरकर, ऐसे जैसे बहुत दिनों से बाँधा हुआ था। आँखों से आँसू भी बहने लगे। आँसू और हँसी, दोनों एक साथ। मैं रुक ही नहीं रहा था।
माँ पहले हैरान देख रही थीं, फिर उनके होंठ भी फड़के। गुड़िया ने लड्डू चखा और हँस दी। और पूरे आँगन में हँसी फैल गई, उस डर के बीच भी जो अभी दरवाज़े पर खड़ा था।
मैं रुका। आँसुओं ने आँखें साफ़ कर दी थीं। माँ का हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ अब कम काँप रही थीं।
"माँ। अब मैं सिर्फ़ बदला नहीं लूँगा। मैं सच को जीत दिलाऊँगा। पापा इसीलिए नहीं लौटे कि वो सबसे अकेले लड़े। अब हम सब हैं। हमारा सच सबका सच बनेगा, और वो सच ठाकुर की शीशी से बड़ा होगा।"
माँ ने मेरा हाथ दबाया। "लड़।"
और तभी, आँगन की दीवार के पीछे से, अंधेरे में किसी के हँसने की आवाज़ आई। धीमी, दबी हुई — जैसे कोई अपनी मूँछों में हँस रहा हो।
कालू काका ने कुदाल कसकर पकड़ी।
"ये ठाकुर है," उन्होंने धीरे से कहा। "ये हँसी मैं बीस साल से जानता हूँ।"
हँसी रुकी। और फिर दीवार के उस पार से एक आवाज़ आई, मीठी और ठंडी — "वीर सिंह, तेरे पापा भी ऐसे ही बोले थे। और तेरे ठाकुर ने उन्हें ऐसे ही जवाब नहीं दिया था।"
मैंने मुट्ठी कसी। मेरे रोंगटे खड़े थे, पर मेरी आवाज़ काँपी नहीं।
"ठाकुर," मैंने कहा, और आँगन में मेरी आवाज़ गूँज गई। "आज रात तेरी पोटली आई है। कल सुबह मेरा जवाब जाएगा। और वो जवाब सिर्फ़ दो लाइनों का नहीं होगा।"
अंधेरे में सन्नाटा छा गया। फिर ज़मीन पर कदमों की आवाज़ आई — भारी चमड़े के जूतों की — जो धीरे-धीरे दूर होती गई।
कालू काका ने कुदाल ज़मीन में टिकाई।
"तहखाना," उन्होंने कहा। "अब जाना ही होगा।"
॥
कालू काका की बात हवा में लटकी रह गई। मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी उँगलियाँ कुदाल पर सफ़ेद हो रही थीं, ऐसे पकड़ रहे थे जैसे कुदाल ही उन्हें सहारा दे रही हो।
"काका, आप अंदर चलिए। गुड़िया सो जाए। माँ को भी आराम करने दीजिए।"
कालू काका ने सिर हिलाया, पर पैर नहीं हिले। "तू पहले जा," उन्होंने कहा। "मैं दरवाज़े पर बैठता हूँ। आज रात कोई नहीं सोएगा।"
मैं आँगन से बढ़ा, तो माँ ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी उँगलियाँ मेरी कलाई पर ठंडी थीं। "कुछ खा ले," उन्होंने कहा। आवाज़ में वो सख्ती थी जो सिर्फ़ डर के वक़्त आती है। "खाली पेट नहीं।"
"माँ, भूख नहीं—"
"मुझे नहीं सुनना।" उन्होंने मेरा हाथ छोड़ा और चूल्हे की तरफ़ बढ़ गईं। "जब आदमी को मौत का न्योता मिले, तो वो खाली पेट नहीं जाता। धरती भी कहती है — पहले रोटी, फिर लड़ाई।"
मैं चुप खड़ा रहा। माँ ने आटा गूंधना शुरू किया। उनके हाथों की आवाज़ और चूल्हे में लकड़ी चटकने की आवाज़, बस यही सुनाई दे रहा था।
फिर गुड़िया आई। आँखें मलती हुई, आधी नींद में। "भैया।"
"क्या?"
"तू डरा हुआ है।" उसने कहा, बिलकुल सीधा। बारह साल की लड़की, पर आँखें दादी जैसी।
मैं मुस्कुराया। "नहीं तो।"
"झूठ।" वो मेरे पास आई और मेरी कमर से चिपक गई। "मुझे पता है तू कब डरता है। जब तू डरता है, तू अपनी मुट्ठी बंद करके रखता है और नाखून हथेली में गड़ा देता है। देख, अभी भी वैसा ही कर रहा है।"
मैंने हाथ खोला। हथेली पर नाखूनों के निशान थे। लाल। मैं हँसने लगा। ये बच्ची कहाँ से सीख लाती है ये सब?
"ठीक है, थोड़ा डरा हूँ," मैंने कहा। "पर तू चिंता मत कर।"
"मैं चिंता नहीं करती।" उसने मुँह उठाया। "मुझे पता है भैया तू उन सबको पछाड़ देगा। मैंने अखाड़े की मिट्टी भी रखी है तेरे लिए। नई मिट्टी। आज ही लाई।"
मेरा गला भर आया। मैंने उसका सिर सहलाया। "तू जा, सो जा। कल सुबह तेरे भैया को मैदान में देखना।"
वो गई। माँ ने रोटी परोस दी। मैं बैठा और खाने लगा। रोटी का स्वाद मुझे आज कुछ अलग लगा — जैसे हर कौर के साथ कुछ जुड़ रहा हो। माँ मेरे सामने बैठी रहीं, चुप, बस मुझे देखती रहीं।
रोटी खत्म करके मैं उठा। "माँ, मैं सुबह जल्दी उठूँगा।"
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