Spirit of a Fighter – Chapter 84
"बेवकूफ़," वो बोला। "इतना पैसा कहीं मिलेगा? सोच समझकर—"
मैंने उसके हाथ से लिफ़ाफ़ा पकड़ा। और ज़मीन पर गिरा दिया।
लिफ़ाफ़ा खुला। नोट हवा में उड़े। कुछ मिट्टी पर गिरे, कुछ दरवाज़े के बाहर। बाहर कुछ मज़दूर खड़े थे — गुड़िया के पापा भी थे। सबने देखा। कोई नहीं बोला।
हरनाम जम गया। उसका चेहरा लाल से सफ़ेद हो गया।
"तूने…" वो फुंफुंदा। "तूने मेरा पैसा—"
"ये तुम्हारा पैसा नहीं है," मैंने कहा। "ये उन लोगों का पसीना है जो तुम्हारी भट्ठी में जलते हैं।"
मज़दूरों में से किसी ने धीरे से कुछ कहा। मैं सुन नहीं पाया, पर हरनाम ने सुना। उसकी गर्दन अकड़ गई।
वो झुककर नोट समेटने लगा। हाथ काँप रहे थे। मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था — डर नहीं, कुछ और।
"हरे कवर वाली कॉपी कहाँ है?" मैंने पूछा।
हरनाम का हाथ रुक गया। बीच में। नोट पकड़े हुए, झुका हुआ, वो वैसे ही रुका रहा।
फिर वो धीरे से उठा। उसने नोट जेब में ठूँसे। फ़ाइलें उठाईं। मेरी तरफ़ देखा भी नहीं।
"मैं जा रहा हूँ," वो बोला। आवाज़ सपाट थी। "मुझे काम है।"
वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। मज़दूर हट गए। मैं रास्ते से हटा।
दरवाज़े पर पहुँचकर वो रुका। पलटा। और उसने मुझे देखा। उसकी आँखों में डर था और गुस्सा — दोनों एक साथ, और मैं नहीं बता सका कि कौन ज़्यादा था।
"वीर," वो धीरे से बोला, इतना धीरे कि मीरा भी न सुने। "तू चौथा है जो ये सवाल पूछ रहा है।"
मेरी साँस रुक गई।
"पहले तीन कौन थे?" मैंने पूछा।
पर हरनाम चल पड़ा था। उसकी आवाज़ अंधेरे में घुल गई। मैं वहीं खड़ा रहा, और मेरे कानों में बस उसकी वो एक लाइन गूँज रही थी — चौथा। मतलब तीन और भी थे। और वो तीन कहाँ गए?
॥
"चौथा।"
वो शब्द मेरे कानों में अटक गया, जैसे किसी ने मेरे कान में कील ठोंक दी हो। मैं हरनाम के दफ़्तर के बाहर खड़ा था, हाथ में मीरा की दी टूटी घड़ी की याद, और दिमाग़ में बस एक ही सवाल — पहले तीन कौन थे।
मीरा ने मेरी बाँह पकड़ी।
"वीर, वो जानबूझकर बोला। तुझे उलझाने के लिए।"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "पर उलझाने के लिए भी सच बोलना पड़ता है। झूठ से उलझाते तो वो अलग बात होती। ये डर से बोला — मैंने उसकी आँखों में देखा।"
मीरा चुप हो गई। उसने हाथ नहीं छोड़ा। मज़दूर धीरे-धीरे बिखर गए, गुड़िया के पापा भी अपनी गठरी उठाकर चले गए। पर जाते-जाते उन्होंने एक बार पलटकर मुझे देखा। उस नज़र में कुछ था जो मैं पहले कभी नहीं देख पाया था — न डर, न तरस। एक तरह की उम्मीद, जैसे कोई रास्ता खोज रहा हो।
दोपहर ढल रही थी और मेरे पेट में भूख कुलबुला रही थी। पर घर जाने का मन नहीं था। माँ को ये सब बताना — कि हरनाम ने ऐसा कहा — माँ की चक्की रुक गई है, ऐसा सुनकर माँ के हाथ फिर से काँपेंगे, ये मुझे नहीं चाहिए था।
टिंकू की दुकान मेरे रास्ते में पड़ती थी। नहर से लौटकर, बाज़ार के मोड़ से गुज़रते हुए, मैंने पहले ही दूर से देख लिया था — टिन के शेड के सामने भीड़ जमी थी। छह-सात आदमी। मुझे पहले लगा मिठाई लेने आए होंगे। फिर मैंने उनके हाथ देखे — खाली। कोई मिठाई उठाए नहीं था। कोई पैसा भी हाथ में नहीं था।
मैं तेज़ चला। मीरा मेरे पीछे-पीछे आई।
दुकान के सामने लुट्टन खड़ा था। अखाड़े की लाल वर्दी, छोटी मूँछें, एक हाथ कमर पर। उसके पीछे दो आदमी — जो अखाड़े के दरवाज़े पर हमेशा खड़े रहते हैं।
टिंकू सामने खड़ा था। उसका चेहरा सफ़ेद। टोपी कान पर टेढ़ी हो गई थी। हाथ में एक मिठाई का पत्ता, जिसे वो दोनों हाथों से पकड़े था, जैसे कोई काग़ज़ का टुकड़ा उसकी जान बचा सकता हो।
"अरे भाई," लुट्टन बोला, आवाज़ में गुड़ जैसी मिठास। "दो किलो। पैसे महीने के आख़िर में। भैरव सर का हुक्म है। अखाड़े के लड़कों के लिए। तू तो जानता है, अखाड़े के लड़के रोज़ खाते हैं।"
टिंकू का मुँह खुला, पर आवाज़ नहीं निकली। उसने पत्ता सीने से लगा लिया।
"पर लुट्टन भाई," वो धीरे से बोला, "पिछले महीने का भी… अभी तक नहीं—"
"पिछले महीने का?" लुट्टन ने आँखें बड़ी कीं। जैसे उसने ये शब्द पहली बार सुना हो। "अरे, पिछले महीने का तो मैंने भैरव सर को बोल दिया था। उन्होंने कहा था — टिंकू हमारा अपना लड़का है। हिसाब में मिला देंगे।"
"मिला देंगे" — उसने इतने प्यार से कहा कि सुनने वाले को लगे वो सच में टिंकू का भाई हो।
टिंकू ने पत्ता खोला। काँपते हाथों से दो किलो मिठाई तौलने लगा। मिठाई वाला बड़ा चमचा डिब्बी में डालते वक़्त उसकी कलाई काँप रही थी, और एक पीस ज़मीन पर गिर गया।
लुट्टन ने उसे देखा, हँसा।
"अरे, गिर गई। कोई बात नहीं। गिनती में से निकाल देना।" वो बोला, फिर अपने पीछे के आदमियों की तरफ़ मुड़ा। "देखा? हमारा टिंकू कितना ईमानदार है। एक पीस भी ज़्यादा नहीं देगा।"
वो हँसे। मैंने टिंकू की कलाई देखी। वो और तेज़ काँपने लगी थी। मैंने उसकी आँखें देखीं। वो मुझे देख रही थीं — बस एक बार, फिर झुक गईं। जैसे कह रही हों — भाई, चला जा। ये मेरी लड़ाई है।
पर मैं नहीं गया।
"मिठाई के पैसे दो, भाई।"
मेरी आवाज़ मैंने खुद सुनी, और मुझे लगा ये आवाज़ मेरी नहीं है। ये आवाज़ कहीं और से आई — शायद मेरे पापा की आवाज़, जो मेरे सीने में दबी बैठी थी।
लुट्टन पलटा। उसका चेहरा बदला — मिठास हट गई, जगह पर एक तरह की चिढ़ आ गई।
"अरे, ये तो वीर है," वो बोला। "मिट्टी सूंघने वाला।" उसने अपने आदमियों की तरफ़ देखा। "सुना था ये बड़ा पहलवान बन गया है। पूरे गाँव को ज़हर की कहानी सुना रहा है।"
"पैसे दो," मैंने दोहराया। "और पिछले महीने का भी।"
लुट्टन ने एक कदम आगे बढ़ाया। उसकी छाती फूली हुई थी। वो मुझसे लंबा नहीं था, पर मोटा था — और मोटाई में भी एक धौंस होती है, जो दूर से ही लग जाती है।
"ये तेरा रक्षक कौन है?" उसने टिंकू की तरफ़ इशारा किया। "तेरी मिठाई की दुकान है? तू मालिक है? तूने दुकान खोली? तेरा पैसा इसमें लगा है?"
"रक्षक नहीं," मैंने कहा। "हिस्सेदार हूँ।"
लुट्टन ठिठक गया।
"हिस्सेदार?" उसने भौंहें चढ़ाईं। "कब से?"
"जब से मैंने देखा कि इस दुकान की मिठाई पैसे के बिना अखाड़े जाती है," मैंने कहा। "जो मिठाई पैसे के बिना जाती है, वो मेहनत का अपमान है। और जिस दिन मेहनत का अपमान होता है, उस दिन मैं हिस्सेदार बन जाता हूँ।"
मेरी आवाज़ सुनकर टिंकू ने सिर उठाया। उसकी आँखों में पानी था, पर वो पोंछा नहीं।
लुट्टन ने मुझे घूरा।
"अच्छा," वो बोला। "तो तू अब पैसे का हिसाब रखता है। बड़ी बात है।" उसने धीरे से, मीठी आवाज़ में कहा, "भैरव सर तुझे नहीं भूलेंगे। वो तेरे लिए अलग से हिसाब रख रहे हैं।"
"तो रखने दो," मैंने कहा। "मैं भी उनके लिए हिसाब रख रहा हूँ।"
लुट्टन का चेहरा एक पल के लिए बदला। फिर वो अपने आदमियों की तरफ़ मुड़ा और हँसा — ज़ोर से, जैसे कोई नाटक कर रहा हो।
"देखो इसे। दो किलो मिठाई के लिए।" फिर उसने एक कदम आगे बढ़ा, मेज़ के पास रखी मिठाई की डिब्बी उठाई — जो टिंकू ने अभी बाँधी थी, बड़ी सावधानी से, लाल धागे से, दोहरी गाँठ लगाकर — और उसे ज़मीन पर पटक दिया।
डिब्बी खुली। मिठाई बिखरी। गुलाब जामुन, लड्डू, बर्फ़ी — सब लाल मिट्टी में। लाल धागा टूटकर एक तरफ़ गिरा। चाशनी की चिपचिपाहट मिट्टी से चिपक गई।
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