Spirit of a Fighter83 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 83

6 min read November 5, 2026

"वो रोज़ आता है," कालू काका ने कहा। "तेरे घर के बाहर खड़ा रहता है। तुझे सोते हुए देखता है। फिर चला जाता है। कल रात उसने मिट्टी रखी — क्योंकि उसे पता था कि भैरव तुझे तहखाने से रोकेगा। वो चाहता था कि तेरे पास असली मिट्टी हो, जिससे तू भैरव के सामने खड़ा हो सके।"

मेरी आँखें भर आईं।

एक आदमी जिसे मैंने कभी नहीं देखा। जिसका नाम मैंने कभी नहीं सुना। वो रोज़ मेरे घर के बाहर खड़ा रहता है। मुझे सोते हुए देखता है। और मेरे लिए मिट्टी लाता है।

क्यों?

"क्यों?" मैंने पूछा। आवाज़ भारी थी।

कालू काका ने मिट्टी में हाथ डाला। "क्योंकि वो तेरे पापा का साथी था। और जिस दिन तेरे पापा कुएँ में गिरे, वो उस रात कुएँ के पास था। वो भाग गया। बीस साल से वो उस रात के लिए खुद को माफ़ नहीं कर पाया।"

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा।

"वो तुझे अपना बेटा मानता है।"

मैं वहीं बैठ गया। ज़मीन पर। ठंडी मिट्टी पर।

सुक्खी बुआ ने मेरे सिर पर हाथ रखा।

"अच्छा," वो बोलीं। "अब मैं चलती हूँ। और हाँ — सुन।" उन्होंने अपनी साड़ी ठीक की। "कल शाम पंचायत के चबूतरे पर सब इकट्ठे होंगे। भैरव ने खबर भिजवाई है। कहेगा कुछ बड़ा।"

"क्या?"

"वो तो कल पता चलेगा," वो बोलीं। "पर मैंने सुना है — भैरव तेरे खिलाफ़ कुछ काग़ज़ दिखाएगा। कुछ ऐसा जिससे गाँव तुझे चोर समझे।"

वो चली गईं।

मैं कालू काका के पास बैठा रहा। दोपहर ढल रही थी। दीवार की परछाईं लंबी हो रही थी।

"काका," मैंने कहा। "हरिया से मिलना है।"

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा।

"जा," वो बोले। "पर एक बात याद रख। हरिया बोलता कम है। और जो बोलता है, वो सीधा दिल में लगता है।"

"और अगर वो मुझसे न मिले?"

कालू काका मुस्कुराए। पहली बार उस दिन।

"वो मिलेगा," वो बोले। "उसे तेरी ज़रूरत है जितनी तुझे उसकी।"

मैं उठा।

"एक बात और," कालू काका ने मेरा हाथ पकड़ा। "हरनाम से जो बात तूने पूछी — हरे कवर वाली — वो बात अब गाँव में फैल जाएगी। हरनाम डरेगा। और डरा हुआ आदमी या तो भाग जाता है, या काटने आता है।"

"तो?"

"तो आज रात हरनाम के घर पर नज़र रख। अगर वो भागने की कोशिश करे, तो उसे रोक। क्योंकि वो कॉपी कहीं और नहीं ले जाएगा — वो उसे अपने साथ ले जाएगा।"

मैंने सिर हिलाया।

"और वीर," कालू काका ने कहा। "तेरे पापा ने भी यही किया था। रात में हरनाम के घर पर नज़र रखी थी। उस रात भैरव ने उन्हें पकड़ लिया।"

मेरी साँस रुक गई।

"तो मैं क्या करूँ?"

कालू काका ने मेरी आँखों में देखा।

"तू वही कर," वो बोले, "जो तेरे पापा नहीं कर पाए। तू अकेले मत जा।"

शाम को मैं नहर के मोड़ पर पहुँचा। मीरा वहीं थी। वो पत्थर पर बैठी थी, हाथ में कुछ काग़ज़ थे। मुझे देखकर वो उठी।

"तुम आ गए," उसने कहा। "सुक्खी बुआ ने मुझे सब बता दिया। हरनाम। नोट। चौथा।"

मैंने सिर हिलाया।

"मीरा," मैंने कहा। "आज रात हरनाम भाग सकता है। और उसके पास वो कॉपी है।"

"तो हम रोकेंगे," उसने कहा। सीधा। बिना रुके।

"अकेले नहीं जाना है," मैंने कहा। "कालू काका ने कहा—"

"मैं जानती हूँ," उसने मेरी बात काटी। "मैं तुम्हारे साथ चलूँगी।"

"मीरा—"

"वीर," उसने मेरी कलाई पकड़ ली। "तुम मुझे हर बार बचाने की कोशिश करते हो। मैं बचाई जाने वाली नहीं हूँ। मैं तुम्हारे साथ लड़ने वाली हूँ।"

मैं उसकी आँखों में देखता रह गया।

फिर मैंने सिर हिलाया।

"ठीक है," मैंने कहा। "टिंकू को भी बुलाऊँगा।"

"तीन लोग," मीरा ने कहा।

"तीन नहीं," मैंने कहा। "चार।"

"कौन?"

"हरिया," मैंने कहा। "जो कल रात मेरे दरवाज़े पर मिट्टी लेकर आया था।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। कुछ पल।

"तो पहले उससे मिलो," उसने कहा। "अगर वो सच में साथ है, तो हम चार होंगे। और अगर वो साथ नहीं है — तो हमें पता होगा कि वो किस तरफ़ खड़ा है।"

मैंने सिर हिलाया।

सूरज डूब रहा था। नहर का पानी लाल हो रहा था।

"वीर," मीरा ने कहा। "एक बात।"

"क्या?"

"तुमने हरनाम के नोट ज़मीन पर क्यों गिराए?"

"क्योंकि वो मेरे नहीं थे।"

"पर तुम्हारे पास एक जोड़ी चप्पल भी नहीं है," उसने कहा। "और गुड़िया की कॉपी फटी है। और तुम्हारी माँ—"

"मीरा," मैंने कहा। "अगर मैं वो नोट उठा लेता, तो आज हरनाम मेरे चेहरे पर हँसता। और कल भैरव कहता — 'देखा? ये भी हमारा है।' मैं भैरव का नहीं हूँ। मैं अपना हूँ।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।

और फिर उसने पहली बार वो मुस्कान दी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी। छोटी। धीमी। पर असली।

"तुम अजीब हो," उसने कहा।

"तुम भी," मैंने कहा।

"मैं कैसे?"

"तुम शहर से आई हो," मैंने कहा। "तुम्हारे पास किताबें हैं। डिग्री है। तुम यहाँ क्यों आई?"

वो कुछ पल चुप रही।

"क्योंकि मेरे पापा यहाँ हैं," उसने कहा। "और वो हँसते नहीं हैं। बीस साल से।"

मैंने सिर हिलाया।

"तो आज रात के बाद," मैंने कहा, "शायद वो हँसें।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था — उम्मीद जैसा।

"शायद," उसने कहा।

मैं पलटा। पुरानी ईंट की भट्ठी की तरफ़ चलने लगा। पर एक कदम बाद रुका।

मैं पलटा। पर मेरे पैर खुद ही रुक गए।

"मीरा," मैंने कहा। "हरनाम का दफ़्तर कहाँ है?"

"भट्ठी के पीछे," उसने कहा। "छोटा-सा कमरा है। जहाँ हिसाब-किताब रखता है।"

"चलो।"

हम भट्ठी की तरफ़ चले। रास्ते में मेरे हाथ ठंडे हो रहे थे, और ये अजीब थी, क्योंकि शाम अभी गरम थी। मैंने मुट्ठी बांधी। मीरा मेरे साथ चल रही थी, उसकी चप्पलों की आवाज़ मिट्टी पर साफ़ सुनाई दे रही थी।

भट्ठी के पीछे छोटा कमरा था। एक बंद खिड़की, एक टूटा दरवाज़ा जो पूरा बंद नहीं होता था। अंदर से पीली रोशनी आ रही थी।

मैंने दरवाज़े पर दस्तक दी।

अंदर काग़ज़ खिसकने की आवाज़ आई। फिर चुप्पी।

"कौन?" हरनाम की आवाज़। छोटी। फटी हुई।

"वीर।"

अंदर कुछ देर सन्नाटा रहा। फिर दरवाज़ा खुला। हरनाम के चश्मे का शीशा चमक रहा था, पर उसके पीछे की आँखें बेचैन थीं। उसने मेरे पीछे मीरा को देखा और उसका जबड़ा कस गया।

"तू लड़की को यहाँ क्यों लाया?" वो बोला। "ये दफ़्तर है।"

"ये तुम्हारा दफ़्तर नहीं," मैंने कहा। "ये हरनाम की भट्ठी का दफ़्तर है। और मैं यहाँ मज़दूरी का हिसाब लेने आया हूँ।"

वो कमरे के अंदर गया। मेज़ पर काग़ज़ों का ढेर था। उसने एक फ़ाइल खोली, फिर बंद की। फिर एक लिफ़ाफ़ा उठाया।

"ले," उसने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया। "तेरी मज़दूरी। तीन हफ़्ते की।"

मैंने लिफ़ाफ़ा नहीं छुआ।

"हिसाब दिखाओ," मैंने कहा। "दिन, घंटे, दाम।"

"अरे, तू मुझे सिखाएगा?" वो हँसा। पर हँसी में दम नहीं था। "तीन हफ़्ते काम किया, तीन हफ़्ते का पैसा। इतना हिसाब काफ़ी है।"

"नहीं है," मैंने कहा। "क्योंकि मैंने चार हफ़्ते काम किया है। और तुमने खुद कहा था — पंद्रह दिन का पैसा महीने के आख़िर में। ये कौन-सा महीना है?"

हरनाम की उँगलियाँ लिफ़ाफ़े पर सफ़ेद पड़ गईं।

फिर उसका तरीका बदला। वो मेरे पास आया, मेरे कंधे पर हाथ रखा। उसकी हथेली पसीने से भीगी थी।

"वीर बेटा," वो धीरे से बोला। "तू समझदार है। गाँव का सब लड़का एक जैसा नहीं होता। तू मेरे काम का आदमी है। ये ले, और साथ में ये भी ले।" उसने लिफ़ाफ़ा मेरी जेब की तरफ़ बढ़ाया, ठूँसने की कोशिश की।

मैं पीछे हटा।

"मुझे तुम्हारा पैसा नहीं चाहिए," मैंने कहा। "मुझे अपना चाहिए।"

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