Spirit of a Fighter – Chapter 82
हरनाम का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
ऐसा सफ़ेद जैसे किसी ने उसके चेहरे पर चूना पोत दिया हो। उसने अपना चश्मा उतारा और मेज़ पर रखा। उसके हाथ काँप रहे थे।
"तू… तू ये क्या बोल रहा है?"
"जो तुम जानते हो," मैंने कहा। "हरे कवर वाली कॉपी कहाँ है?"
हरनाम ने कोई जवाब नहीं दिया।
उसने बस अपनी फ़ाइलें समेटनी शुरू कीं। तेज़ी से। जैसे किसी को पकड़ा जा रहा हो।
"मुझे जाना है," उसने कहा। आवाज़ जैसे किसी और की थी। "मेरा काम है।"
उसने फ़ाइलें बगल में दबाईं और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। मेरे पास से गुज़रते वक्त उसकी साँस मेरे कानों तक आई।
फिर वो रुका।
दरवाज़े के बाहर। उसने एक बार पलटकर मुझे देखा।
उसकी आँखों में दो चीज़ें थीं। डर। और गुस्सा। दोनों बराबर। जैसे एक ही आँख में दो आदमी बैठे हों।
मैंने उसे घूरकर देखा।
और फिर उसने धीरे से, बहुत धीरे, ऐसे कहा जैसे बात मुझसे नहीं, खुद से कह रहा हो —
"तू चौथा है जो ये सवाल पूछ रहा है।"
मैं सन्न रह गया।
"कौन से तीन?" मैंने पूछा।
पर हरनाम जवाब नहीं दिया। वो पलटा और तेज़ कदमों से चल पड़ा। उसकी फ़ाइलें उसकी बगल में दबी थीं, और उसका चश्मा उसके हाथ में काँप रहा था।
मैं दरवाज़े पर खड़ा रह गया।
ज़मीन पर नोट पड़े थे। हवा उन्हें उड़ा रही थी। एक मज़दूर झुककर उन्हें समेट रहा था।
पर मुझे वो नहीं दिख रहा था।
मुझे सिर्फ़ एक बात दिख रही थी — "तू चौथा है।"
चौथा।
इसका मतलब पहले तीन लोग थे। तीन लोगों ने हरे कवर वाली कॉपी के बारे में पूछा था। तीन लोगों ने हरनाम के चेहरे का रंग उड़ाया था।
और वो तीन कहाँ हैं?
जिंदा हैं? या…
मेरे पेट में ठंडी सी लहर दौड़ी।
मैंने वो नोट नहीं उठाए। मैं पलटा और तेज़ कदमों से चल पड़ा। सीधा कालू काका की तरफ़।
कालू काका अखाड़े के पीछे, दीवार के सहारे बैठे थे। अपनी कुबड़ी पीठ को ईंटों से टिकाया हुआ था। सामने मिट्टी का बर्तन था, जिसमें से भाप उठ रही थी। उनके हाथ मिट्टी से सने थे।
मुझे देखकर उन्होंने आँखें ऊपर कीं।
"आ गया," वो बोले। जैसे मेरा आना तय था।
"काका," मैंने उनके सामने घुटने टेक दिए। "कालू काका — तुम्हें किसी और ने हरे कवर वाली कॉपी के बारे में पूछा था? मेरे अलावा?"
कालू काका ने मिट्टी में अपनी उँगली चलाई। धीरे-धीरे। जैसे कोई नाम लिख रहे हों।
"तीन लोग," वो बोले। "पर तीन नहीं।"
मेरा माथा ठंडा हो गया।
"क्या मतलब?"
"चार लोग," कालू काका ने कहा। "पर एक साथ नहीं। एक-एक करके। बीस साल में।"
उन्होंने बर्तन से पानी पिया। धीरे।
"पहला — रघुवीर। तेरे पापा।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "उसने सबसे पहले पूछा था। कॉपी कहाँ है? हिसाब कहाँ है? और उसका जवाब उसने खुद कुएँ में दिया।"
मेरी साँस रुक गई।
"दूसरा — जगदीश। तेरे गोद लेने वाले पापा।" कालू काका ने धीरे से कहा। "उसने मुझसे पूछा था। मैंने उसे बताया। और वो कॉपी ढूँढने की कोशिश में ज़हर पीकर मर गया।"
मेरी आँखों में पानी आ गया। मैंने पलकें झपकीं।
"तीसरा?" मेरी आवाज़ फट रही थी।
कालू काका ने अपना बर्तन रख दिया।
"तीसरा," वो बोले, "वो आदमी था जो अब अखाड़े में काम नहीं करता। जो दूर है। जो बोलता नहीं। पर जो जानता है कि कॉपी कहाँ है।"
"कौन?"
कालू काका ने अपनी आँखें मेरी आँखों में डाल दीं।
"जिसने तेरे दरवाज़े पर कल रात मिट्टी रखी।"
मेरा दिल धम से रह गया।
मैं बैठा ही था कि पीछे से आवाज़ आई।
"वीर!"
मैं पलटा। सुक्खी बुआ साड़ी समेटे दौड़ी आ रही थीं। उनके हाथ में पान का बीड़ा था और मुँह में कुछ।
"अरे मैंने तो सुना है," वो हाँफते हुए बोलीं। "कि तूने हरनाम के नोट ज़मीन पर गिरा दिए!"
"किसने बताया?"
"अरे पूरा बाज़ार बता रहा है!" उन्होंने हाथ हिलाया। "दो मज़दूरों ने देखा। अब गाँव में सब कह रहे हैं कि वीर ने भैरव की मज़दूरी ठुकरा दी।" वो मेरे पास आकर बैठ गईं। "पगली! इतने पैसे? तूने ऐसा क्यों किया?"
"क्योंकि वो पैसा मेरा नहीं था," मैंने कहा।
"अरे, पैसा पैसा होता है!" उन्होंने बीड़ा मुँह में दबाया। "चाहे किसी का हो, जेब में आए तो अपना।"
मैं मुस्कुराया।
"बुआ," मैंने कहा। "तुम्हें कभी हरनाम ने हरे कवर वाली कॉपी के बारे में कुछ बताया?"
सुक्खी बुआ का चबाना रुक गया।
"हरी कवर?" वो बोलीं। "क्या हरी कवर?"
"उसकी कॉपी में हिसाब है। बीस साल का।"
सुक्खी बुआ कुछ पल मेरी तरफ़ देखती रहीं। फिर उन्होंने बीड़ा थूक दिया और आवाज़ धीमी कर दी।
"सुन," वो बोलीं। "मैं तुझे एक बात बताती हूँ। पिछले साल हरनाम की बीवी बीमार पड़ी। बहुत बीमार। कोई दवा काम नहीं कर रही थी। तो हरनाम ने किसी को बुलाया — शहर से। कोई वैद्य था या डॉक्टर।" उन्होंने चारों तरफ़ देखा। "और वो वैद्य जब जाने लगा, तो उसने हरनाम से कहा — 'तेरी बीवी ठीक हो जाएगी, पर तू जो काग़ज़ छिपाए बैठा है, वो तुझे खा जाएँगे।'"
मेरी साँस तेज़ हो गई।
"हरनाम ने क्या कहा?"
"हरनाम रोया," सुक्खी बुआ ने कहा। "मैंने अपनी आँखों से देखा। वो उस वैद्य के पैरों पर गिर गया। बोला — 'मैं मजबूर हूँ। मेरे बच्चे हैं।'" उन्होंने पान की पीक थूकी। "और फिर उसने कहा — 'अगर मैं ये काग़ज़ जला दूँ, तो क्या मेरी जान बच जाएगी?'"
"और वैद्य ने क्या कहा?"
सुक्खी बुआ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में अब हँसी नहीं थी।
"वैद्य ने कहा — 'काग़ज़ जलाने से कुछ नहीं होगा। जिसने ये काग़ज़ बनवाए हैं, वो तेरे घर के नीचे से भी निकाल लेगा। तेरे पास सिर्फ़ एक रास्ता है — जिस दिन कोई चौथा आदमी इन काग़ज़ों की माँग करे, उस दिन उसे दे देना और खुद भाग जाना।'"
मैं सन्न बैठा रह गया।
चौथा आदमी।
मैं चौथा हूँ।
मैंने अपने घुटनों पर हाथ रखा। मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"तो हरनाम मुझे कॉपी देने वाला है?" मैंने धीरे से कहा।
कालू काका ने पहली बार बीच में बात की। "नहीं। वो डरा हुआ है। डरा हुआ आदमी कभी सीधा नहीं देता। वो पहले तुझे तोड़ेगा। फिर देगा।"
सुक्खी बुआ ने मेरी तरफ़ देखा।
"पर एक बात," वो बोलीं। "तीसरे वाले की बात।"
"कौन?"
"जो मिट्टी लेकर आया," उन्होंने कहा। "मुझे पता है वो कौन है।"
मेरी आँखें फैल गईं।
"कौन?"
सुक्खी बुआ ने चारों तरफ़ देखा। फिर मेरे कान के पास झुककर धीरे से कहा, "वो आदमी जो अखाड़े का पहला मज़दूर था। जिसे भैरव ने बीस साल पहले निकाल दिया। जो अब शहर के बाहर एक झोपड़ी में रहता है और कोई उसका नाम नहीं लेता।"
"नाम?"
"हरिया।" उसने कहा। "हरिया मज़दूर। जो कभी भैरव का सबसे करीबी था।"
मैं खड़ा हो गया।
"कहाँ रहता है?"
"शहर जाने वाले रास्ते पर," कालू काका ने कहा। "जहाँ नहर सूख जाती है। वहाँ एक पुरानी ईंट की भट्ठी है। उसके पीछे।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। "तुम जानते थे?"
कालू काका ने अपना सिर झुकाया। "मैं जानता था कि वो ज़िंदा है। पर मैंने तुझे नहीं बताया, क्योंकि वो खुद आना चाहता था। उसने मुझसे कहा था — 'जिस दिन वो लड़का अखाड़े में खड़ा होगा, उस दिन मैं खुद आऊँगा।'"
"तो वो कल रात आया था?"
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