Spirit of a Fighter81 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 81

7 min read November 5, 2026

गुड़िया मुझे देखती रही।

"किससे?"

"हरनाम से।"

उसकी आँखें फैल गईं। "वो तो भैरव का आदमी है।"

"हाँ," मैंने कहा। "इसीलिए तो ज़रूरी है।"

वो कुछ कहने ही वाली थी कि माँ की आवाज़ आई। "गुड़िया, सो जा। बाहर क्या बैठी है?"

गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा, फिर अंदर चली गई।

मैंने उस पर्ची को जेब में रखा और आसमान की तरफ़ देखा।

"भैरव को सब पता है।"

अगर सब पता है, तो अब क्या फ़र्क पड़ता है कि मैं चुपके से जाऊँ या खुलेआम? जब दुश्मन को रास्ता पता है, तो चोरी का कोई मतलब नहीं रहता।

पर सिर्फ़ भैरव को पता है, या सबको?

उस रात मैंने आँख नहीं लगाई। मैं छत पर लेटा रहा और सोचता रहा। एक बात बार-बार घूमती रही — जो आदमी मेरे दरवाज़े तक मिट्टी लाकर रख गया, वो भैरव का आदमी नहीं हो सकता। भैरव का आदमी मिट्टी देने नहीं आएगा। वो मिट्टी छीनने आएगा।

तो वो कौन था?

मुंशीजी? नहीं। मुंशीजी के हाथ काँपते हैं। वो रात में इतनी दूर नहीं चल सकता।

हरनाम? हरनाम के पास तो खुद सबूत हैं। वो अपनी ही चीज़ें मुझे क्यों देगा?

तो फिर?

सुबह माँ ने चूल्हा जलाया। दाल की गंध आँगन में फैल गई। पर आज दाल में कुछ और भी था। फूलों की गंध। वो पीली साड़ी पहनकर आई थीं जो उन्होंने पिछले हफ़्ते पीपल के नीचे पहनी थी।

मैंने हाथ धोकर तौलिया लिया।

"आज इतनी सज-धज?" मैंने कहा।

"क्यों?" उन्होंने पलटकर देखा। "माँ हूँ, सजूँगी तो नहीं?"

मैं हँसा। पर मैं जानता था। माँ उस दिन से अलग हो गई थीं जिस दिन उन्होंने मीरा का हाथ देखा था। कुछ और था जो उनके चेहरे पर बस गया था। शांति जैसा कुछ।

"आज मैं हरनाम से मिलने जा रहा हूँ," मैंने कहा।

माँ ने चूल्हे पर से कड़ाही नहीं उतारी। बस धीरे से बोलीं, "हिसाब माँगने?"

मैं ठिठका। मैंने ये बात किसी को नहीं बताई थी। गुड़िया से कही थी, बस।

"तूने सुना?"

"नहीं," माँ ने कहा। "पर जब से तूने पापा की धोती पहनी है, तेरी आँखें बदल गई हैं। अब तू वो लड़का नहीं है जो दीवार के छेद से कुश्ती देखता था। अब तू वो है जो मैदान के बीच खड़ा होता है।"

उन्होंने कड़ाही उतारी। गरम रोटी मेरी थाली में रखी।

"तो फिर जाकर हिसाब माँग," उन्होंने कहा। "पर एक बात याद रख। जब कोई अपना हिसाब देने से बचने लगे, तो समझ लेना उसके पास चोरी छिपाने के लिए बहुत कुछ है।"

वो बैठ गईं।

"अच्छा," उन्होंने कहा, "ये बता — वो लड़की, मीरा, क्या खाती है?"

मैं रोटी के टुकड़े पर रुक गया।

"क्या?"

"बहू बनानी है ना? तो पूछ रही हूँ।"

मैंने रोटी निगल ली। गले में अटक गई। माँ मुस्कुरा रही थीं।

"माँ, अभी—"

"अभी क्या?" उन्होंने कहा। "कल तू उसके लिए मरने को तैयार था। आज 'अभी' कहता है। जब बात शादी की आती है तो सब चुप हो जाते हैं।" वो उठीं। "जा। हिसाब ले आ। और ये बता देना हरनाम को — कि रामपुर में एक बूढ़ी औरत है जो उसके हर काग़ज़ के नीचे अपना हाथ रख सकती है।"

मैंने उन्हें देखा।

"तू?"

"माँ, हूँ," उन्होंने कहा। "हरनाम को लगता है कि सबूत सिर्फ़ काग़ज़ में होते हैं। पर गाँव में सबूत सिर्फ़ आँखों में होते हैं। और मेरी आँखें पचास साल से खुली हैं।"

अखाड़ा तीन दिन बंद था। पर हरनाम अखाड़े के बाहर वाले कमरे में बैठता था, जहाँ ठेकेदारों का हिसाब रखा जाता है। मैंने उस कमरे की तरफ़ जाते हुए देखा — दरवाज़ा खुला था, अंदर से काग़ज़ों की खड़खड़ाहट आ रही थी।

मैं दरवाज़े पर खड़ा हो गया।

हरनाम मेज़ पर झुका हुआ था। चश्मा नाक पर टिका था, और उसकी उँगलियाँ फ़ाइलों पर चल रही थीं। उसने मुझे देखा तो पहले चौंका, फिर चेहरे पर मुस्कान आ गई।

"अरे, वीर!" उसने चश्मा उतारकर पोंछा। "आओ, आओ। बैठो।"

"नहीं बैठूँगा," मैंने कहा। "तुम मेरा हिसाब दो।"

"हिसाब?" उसने भौंहें चढ़ाईं। "कौन-सा हिसाब?"

"मज़दूरी का। पिछले तीन महीने से मैंने अखाड़े की मिट्टी सींची। दीवारों की मरम्मत की। कालू काका के साथ तीन रातें कुएँ की सफ़ाई की—"

"अरे, वीर," उसने हाथ बढ़ाया। "वो तो गाँव की सेवा है। अखाड़ा गाँव का है।"

"अखाड़ा गाँव का है," मैंने कहा। "पर मज़दूरी का हिसाब तो होता है। भैरव सिंह हर मज़दूर को पैसा देते हैं। मुझे क्यों नहीं?"

हरनाम ने काग़ज़ों में कुछ खोजा।

"देखो," उसने कहा, "तुम्हारा नाम इस महीने की लिस्ट में नहीं है। शायद भैरव सिंह ने सोचा कि तुम अभी नए हो, अभी—"

"तीन महीने से मेरा नाम नहीं है?"

वो रुक गया।

कमरे के बाहर दो मज़दूर खड़े थे, जो दीवार की तरफ़ मिट्टी लगाने का सामान रख रहे थे। उन्होंने हमारी बात सुनी। एक ने दूसरे की तरफ़ देखा।

हरनाम ने बाहर देखा। फिर मुझे देखा।

"देखो, वीर," उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "तुम अच्छे लड़के हो। मेहनती हो। पर ये अखाड़े का हिसाब है। ये सब काग़ज़ों की बात है। तुम्हें इसमें क्यों पड़ना है?"

"क्योंकि मेरी माँ रोज़ चार बजे उठती है," मैंने कहा। "और चक्की चलाती है। और मेरी बहन की कॉपी फटी है। और मेरे पास एक जोड़ी चप्पल है जो अब और नहीं चलेगी।"

हरनाम की आँखें थोड़ी सिकुड़ीं।

फिर उसने मेज़ की दराज़ खोली और एक लिफ़ाफ़ा निकाला। मोटा लिफ़ाफ़ा। उसने वो मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ये लो," उसने कहा। "भैरव सिंह ने तुम्हारे लिए भेजा है। बोला है कि नया लड़का है, हिम्मत है। आगे बढ़ेगा।"

मैंने लिफ़ाफ़े को देखा। उसे हाथ नहीं लगाया।

"कितना है?"

"देख लो," उसने कहा। "सौ नहीं, दो सौ नहीं। इतना कि तीन महीने का हिसाब भी निकल जाए और बच भी जाए।"

मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया। छुआ। मोटा था।

फिर मैंने उसे उसकी मेज़ पर वापस रख दिया।

"ये मेरी मज़दूरी नहीं है," मैंने कहा।

हरनाम की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ी।

"ये भैरव सिंह की तरफ़ से है," उसने कहा। "तुम समझ रहे हो ना? ये मतलब है कि वो तुम्हें अपने लोगों में गिनते हैं।"

"अगर वो मुझे अपने लोगों में गिनते हैं," मैंने कहा, "तो फिर मेरा हिसाब क्यों नहीं देते?"

कमरा शांत हो गया।

हरनाम के चेहरे की मुस्कान जैसे किसी ने उतार दी हो। उसने धीरे से काग़ज़ रखे।

"वीर," उसने कहा। "मैं तुम्हारा भला चाहता हूँ। तुम जानते हो ना, अखाड़े में जो लड़के आते हैं और ज़्यादा सवाल पूछते हैं, उनके साथ क्या होता है?"

"क्या होता है?"

वो रुक गया। उसने लिफ़ाफ़ा उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ाया।

"ये रख लो," उसने कहा। "और अखाड़े के बारे में किसी से कुछ मत बोलना। यह तेरे भले की बात है।"

मैंने लिफ़ाफ़े को देखा।

फिर मैंने उसका हाथ पकड़ा। और लिफ़ाफ़ा उसकी उँगलियों से खींचकर ज़मीन पर गिरा दिया।

लिफ़ाफ़ा खुला। नोट हवा में उड़े। कुछ मेरे पैरों के पास गिरे। कुछ दरवाज़े के बाहर तक चले गए।

बाहर खड़े दोनों मज़दूर सन्न रह गए।

एक ने अपनी कमर पर रखा हाथ धीरे से ढीला कर लिया।

हरनाम की साँस रुक गई।

"तूने—" उसने कहना चाहा, पर आवाज़ गले में ही अटक गई।

"मेरी मज़दूरी का हिसाब काग़ज़ में है," मैंने कहा। "लिफ़ाफ़े में नहीं। और जब तक मुझे वो हिसाब नहीं मिलता, मैं अखाड़े की मिट्टी को हाथ नहीं लगाऊँगा।"

मैं पलटा। दरवाज़े की तरफ़।

और फिर रुककर पलटा।

"एक बात और," मैंने कहा। "तुम्हारे पास हरे कवर वाली एक कॉपी है। जिसमें बीस साल का हिसाब है। भैरव के कमरे में जो अलमारी है — उसकी चाबी जो भैरव की कमर पर बंधी रहती है — उसमें जो पीला काग़ज़ है — वो सब तुम्हारे पास है।"

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