Spirit of a Fighter80 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 80

6 min read November 5, 2026

"तू बच्ची थी।"

"पर आज मैं बड़ी हूँ।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और आज मैं जानती हूँ।"

उसकी आँखों में वो बात थी जो मैं समझ गया। वो बदला लेने की बात नहीं थी। वो कुछ और थी। वो वो बात थी जो माँ की आँखों में थी जब वो चक्की चलाती थीं — इंतज़ार। बस इंतज़ार।

"मीरा," मैंने कहा। "तेरे पापा ठीक हो सकते हैं।"

"अभय ने कहा—"

"अभय ने कहा कि दवा नहीं है," मैंने कहा। "पर दवा नहीं होने का मतलब ये नहीं कि तेरे पापा ऐसे ही रहेंगे। कल रात मैंने तहखाने की मिट्टी छुई थी। उसमें कुछ है। कुछ ऐसा जो शरीर से ज़हर खींचता है। कालू काका ने कहा था — ये मिट्टी पहले दवा थी। भैरव ने इसमें मिलावट की।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ जगा।

"तो अगर हमें असली मिट्टी मिल जाए…"

"तो शायद," मैंने कहा। "बस शायद।"

वो चुप रही। फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर उनमें एक ज़ोर था।

"तो हमें असली मिट्टी चाहिए," उसने कहा। "और वो तहखाने में है। और तहखाने तक भैरव का रास्ता है।"

"तो हम भैरव से पहले पहुँचेंगे," मैंने कहा।

उसने सिर हिलाया। और फिर उसने अपना हाथ छोड़ दिया। उसका चेहरा फिर से वैसा हो गया — सख़्त, सीधा।

"कल रात," उसने कहा। "भैरव का कमरा। मैं गिलास रखूँगी। और उसी वक़्त तू…"

"मैं कुएँ के पीछे वाले रास्ते से अंदर जाऊँगा," मैंने कहा। "कालू काका के साथ।"

"नहीं।" उसने सिर हिलाया। "तू अकेला नहीं जाएगा।"

"मीरा—"

"मैंने कहा नहीं।" उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जिससे बहस नहीं होती। "तुम अकेले नहीं हो।"

वो लाइन मेरे सीने में उतर गई। जैसे कोई गरम चीज़।

मैंने सिर हिलाया।

हम बिछड़े। वो साइकिल पर बैठी और शहर की तरफ़ मुड़ी। मैं नहर के किनारे-किनारे गाँव की तरफ़ चल पड़ा।

रास्ते में मेरे दिमाग़ में एक ही बात घूम रही थी — वो मैसेज। "उस गिलास को वापस रख दो, जहाँ से उठाया था।"

किसने भेजा? भैरव ने? हरनाम ने? या… कोई तीसरा?

और फिर मुझे भैरव की बात याद आई — "जिसके पास सबसे ज़्यादा सबूत हों, वही सबसे बड़ा मुजरिम होता है।"

सबूत। सबूत। सबूत।

मेरा दिमाग़ काम करने लगा। हरनाम के पास हरी कवर वाली कॉपी है। बीस साल का हिसाब। हर मौत का रिकॉर्ड।

पर अगर हरनाम सबसे बड़ा मुजरिम होता, तो भैरव उसका नाम क्यों नहीं लेता? भैरव उससे डरता क्यों नहीं?

मैं रुक गया। नहर का पानी बह रहा था। पानी में मेरा चेहरा दिख रहा था।

और मुझे एक बात समझ आई।

भैरव हरनाम से नहीं डरता। भैरव हरनाम को गुलाम की तरह इस्तेमाल करता है। तो हरनाम सबसे बड़ा मुजरिम नहीं है।

तो कौन है?

जिसके पास सबसे ज़्यादा सबूत हैं…

मेरा दिल धक्-धक् करने लगा।

मुंशीजी।

बूढ़ा मुंशीजी जो अखाड़े का हिसाब रखता है। जिसके पास हर काग़ज़ है। हर तारीख़। हर नाम।

पर मुंशीजी तो सिर्फ़ चाय पीता है और काग़ज़ लिखता है। वो क्या करेगा?

मैंने अपना सिर हिलाया। नहीं। ये सोचना बहुत दूर की बात है। पहले तहखाना। पहले असली मिट्टी। पहले रणवीर सिंह को ठीक करना।

मैं फिर चलने लगा।

घर पहुँचा तो शाम हो गई थी। माँ आँगन में बैठी थीं, और उनके सामने टिंकू खीर का बर्तन लिए खड़ा था।

"भाई!" टिंकू दौड़ा। "क्या हुआ?"

"रिपोर्ट मिल गई," मैंने कहा। मैंने माँ की तरफ़ देखा। "माँ, वो पानी सच में ज़हर है। और…" मैं रुका। "और रणवीर सिंह ने भी वही पिया था।"

माँ ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने बस अपने हाथ गोद में रखे और आँखें बंद कर लीं।

कुछ देर बाद वो बोलीं, "तो अब क्या?"

"कल रात," मैंने कहा। "तहखाना।"

माँ ने आँखें खोलीं। "और भैरव?"

"भैरव को पता नहीं चलेगा।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो बात थी जो वो हमेशा छुपाती थीं — डर। पर इस बार उन्होंने उसे जाने दिया।

"अगर पता चल गया तो?"

मैंने उनके पास बैठकर उनका हाथ पकड़ा।

"तो मैं लड़ूँगा," मैंने कहा। "पर सिर्फ़ अगर मुझे लड़ना पड़े। पहले मैं चुपके से जाऊँगा। जैसे चोर जाता है। और मैं उस मिट्टी को लाऊँगा जो पापा की थी।"

माँ ने मेरे सिर पर हाथ रखा। उनकी हथेली ठंडी थी।

"तेरे पापा भी ऐसे ही बोलते थे," उन्होंने कहा। "चुपके से जाऊँगा। फिर लड़ूँगा।" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "और वो लौटे नहीं।"

"मैं लौटूँगा," मैंने कहा।

"कैसे पता?"

"क्योंकि मेरे पास तू है," मैंने कहा। "और गुड़िया है। और उस लड़की ने कहा है कि मैं अकेला नहीं हूँ।"

माँ ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर उन्होंने पहली बार उस दिन मुस्कुराया।

"वो लड़की," उन्होंने कहा। "उसका नाम क्या है?"

"मीरा।"

"मीरा," माँ ने दोहराया। जैसे नाम को ज़ुबान पर रखकर तौल रही हों। "अच्छा नाम है।"

उस रात मैं सोया नहीं। मैं आँगन में बैठा रहा। आसमान में तारे थे। मेरे सामने टूटी घड़ी रखी थी — मीरा की घड़ी। जो बंद थी।

मैंने उसे उठाया। उसके काँच पर उँगली फेरी।

"जिस दिन सच खुलेगा," मैंने धीरे से कहा, "चलती हुई लौटाना।"

तभी मुझे कुछ सुनाई दिया। दूर से। बहुत धीमी आवाज़।

मैं उठा। दरवाज़े तक गया। बाहर अंधेरा था। पर कुछ था — किसी के चलने की आवाज़। पैरों के नीचे सूखी मिट्टी चरमरा रही थी।

मैंने दरवाज़ा खोला।

सामने कोई नहीं था। पर ज़मीन पर एक छोटी-सी थैली रखी थी — लाल कपड़े की, जिस पर कोई नाम नहीं लिखा था।

मैंने उठाई। खोली।

अंदर थी — मिट्टी।

गरम मिट्टी। अभी-अभी उठाई हुई। और उस मिट्टी में से एक गंध आ रही थी जो मैंने कल तहखाने में सूँघी थी।

असली मिट्टी।

मेरे हाथ काँपने लगे।

और थैली के अंदर एक काग़ज़ का टुकड़ा था। उस पर सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी, बूढ़े हाथों की लिखाई में —

"कल रात मत आना। भैरव को सब पता है।"

॥

"कल रात मत आना। भैरव को सब पता है।"

मैंने वो काग़ज़ कई बार पढ़ा। हर बार लगा कि अक्षर बदल जाएँगे। पर वो वही रहे।

मैं आँगन में खड़ा रह गया, हाथ में लाल थैली। मिट्टी की गरमाहट अब भी मेरी हथेली पर थी। जैसे किसी ने अभी-अभी उसे तहखाने से निकाला हो और मुझे दे दिया हो।

कौन दे गया?

किसने मेरे दरवाज़े तक आकर ये रखा और चला गया?

मैंने चारों तरफ़ देखा। रात बहुत गहरी थी। नीम के पत्ते हवा में सरसरा रहे थे, और दूर कुत्ते किसी चीज़ पर भौंक रहे थे। पर आदमी कोई नहीं दिखा।

"भैया?"

मैं पलटा। गुड़िया दरवाज़े की चौखट पर खड़ी थी। उसकी आँखें आधी नींद में थीं, पर चेहरे पर डर था।

"कुछ हुआ क्या?" वो बोली।

मैंने थैली अपनी कमर पर बाँधी और उसके पास गया।

"कुछ नहीं," मैंने कहा। "जा, सो जा।"

"तुम झूठ बोल रहे हो।" उसने मेरी कलाई पकड़ ली। "मुझे पता है तुम झूठ बोलते हो तो कैसे दिखते हो। तुम्हारी आँखें छोटी हो जाती हैं।"

मैं हँसा। ज़बरदस्ती।

"अच्छा, ठीक है," मैंने कहा। "किसी ने मिट्टी की थैली रख गई। और एक पर्ची।"

"क्या लिखा है?"

मैंने बताया।

गुड़िया ने एक पल सोचा। फिर बोली, "तो जो भी है, वो हमारे साथ है। वरना भैरव को देखकर डर जाता।"

मैं उसकी तरफ़ देखता रह गया।

बारह साल की लड़की। पर बात ऐसी बोली जैसे बीस साल का आदमी बोलता है।

"तू सो जा," मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "कल सुबह से बहुत काम है।"

"क्या काम?"

"हिसाब," मैंने कहा। "मुझे अपनी मज़दूरी का हिसाब लेना है।"

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