Spirit of a Fighter79 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 79

7 min read November 5, 2026

अभय ने मुझे ऊपर से नीचे देखा। मज़दूर के कपड़ों में, टूटी चप्पल में। उसके चेहरे का भाव वो था जो हर शहर का आदमी गाँव वाले के लिए रखता है।

"इसने पहचाना?" उसने मीरा से पूछा। जैसे मैं सामने खड़ा न होऊँ।

"हाँ," मीरा ने सपाट आवाज़ में कहा। "और अभय — अगर अगली बार तुमने मेरे किसी साथी को उस नज़र से देखा, तो तुम्हारी लैब का दरवाज़ा मेरे लिए हमेशा के लिए बंद हो जाएगा। समझे?"

अभय चुप हो गया। उसने सिर हिलाया और फ़ाइल खोल दी।

"ठीक है," वो बोला। "रिपोर्ट तैयार है।"

उसने काग़ज़ मेज़ पर रखा। मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और फिर पढ़ने लगी।

"गिलास में जो पानी था," अभय ने कहा, "उसमें कुछ चीज़ें मिली हैं। पहला — एक पौधे की जड़ का रस। दूसरा — कुछ कुचले हुए बीज। तीसरा — और ये सबसे ज़रूरी है — एक तरह का नमक।"

"नमक?" मैंने पूछा।

"हाँ। पर साधारण नमक नहीं। जिसे हम मिट्टी से निकालते हैं। इस इलाक़े की मिट्टी में ये खास किस्म मिलती है।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "इसका असर ये है कि शुरू में शरीर को ताकत देता है। आदमी को लगता है जैसे उसके अंदर आग जल गई है। दर्द ख़त्म, थकान ख़त्म। दो-तीन हफ़्ते में वो जिसे छुए, गिरा दे।"

मीरा ने काग़ज़ पलटा।

"और फिर?" मैंने पूछा।

"और फिर," अभय ने कहा, "शरीर अंदर से सूखने लगता है। पहले पसीना बंद होता है। फिर भूख। फिर नींद। आदमी का शरीर सूखता जाता है, जैसे पेड़ जिसकी जड़ काट दी गई हो।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा पत्थर जैसा था।

"कितना वक़्त?" मैंने पूछा।

"हर शरीर अलग है," अभय ने कहा। "कोई चार महीने में, कोई साल में। पर एक बात पक्की है —" वो रुका। "जो इसे एक बार पी ले, वो पूरी तरह ठीक नहीं हो सकता। बस रुक सकता है।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

मैंने अपनी मुट्ठी देखी। मेरे पापा ने ये पिया था। जगदीश पापा ने भी। और रणवीर सिंह ने भी।

"इलाज?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ धीमी थी।

"कोई दवा नहीं," अभय ने कहा। "क्योंकि ये ज़हर नहीं है, मीरा। ये… ये शरीर के अंदर का समय है। इसे कोई दवा पीछे नहीं खींच सकती।"

मीरा उठी। उसने काग़ज़ उठाया और खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गई।

अभय ने मेरी तरफ़ देखा। "तुम्हें कुछ और चाहिए?"

"नहीं," मैंने कहा। "धन्यवाद।"

वो गया। दरवाज़ा बंद हुआ।

मैं मीरा के पास गया। वो खिड़की से बाहर देख रही थी। बाहर सड़क पर लोग चल रहे थे। कोई रिक्शा, कोई बस।

"मीरा।"

"मेरे पापा ने ये पिया," उसने कहा। उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। "बीस साल पहले। जब वो जीते थे। मुझे याद है — वो उस रात घर आए थे और मुझे गोद में उठाया था। मैं छोटी थी। मैंने उनके हाथ पकड़े थे और उन्होंने मुझे ऊपर उठाया था। और उनकी आवाज़ में…" वो रुकी। "उनकी आवाज़ में वो गरमी थी। जैसे उनके सीने में आग जल रही हो। मैंने सोचा था — पापा जीत के खुश हैं।"

वो मुड़ी। उसकी आँखों में पानी था।

"वो जीत के खुश नहीं थे, वीर। वो ज़हर के नशे में थे।"

और फिर वो कुर्सी पर बैठ गई। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने काग़ज़ अपनी गोद में रखा और उस पर झुक गई।

मैं कुछ नहीं बोला।

क्योंकि मैं जानता था — इस पल में कोई शब्द काम नहीं आता। बस खड़े रहना होता है।

मैं उसके पास खड़ा रहा।

और तभी मैंने देखा — एक आँसू उसकी आँख से निकला और सीधे काग़ज़ पर गिरा। पानी की एक बूँद, सफ़ेद काग़ज़ पर फैल गई। और वो काग़ज़ जिस पर लिखा था कि कैसे एक आदमी अंदर से सूखता है — उस पर एक आँसू गिरा था।

मेरा गला भर आया।

मैंने धीरे से हाथ बढ़ाया। उसके कंधे पर रखा। उसने मेरा हाथ नहीं हटाया।

हम दोनों चुप बैठे रहे।

कुछ देर बाद उसने अपनी आँखें पोंछीं। सीधी बैठी। और काग़ज़ मोड़कर अपने बैग में रख दिया।

"अब मैं जानती हूँ," उसने धीरे से कहा। जैसे खुद से बोल रही हो। "पापा, अब मैं जानती हूँ तुम्हारे पैर कैसे गए।"

और तभी उसके बैग में फ़ोन बजा।

एक मैसेज था। अनजान नंबर से।

उसने पढ़ा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"क्या है?" मैंने पूछा।

उसने फ़ोन मेरी तरफ़ बढ़ाया।

स्क्रीन पर लिखा था — "उस गिलास को वापस रख दो, जहाँ से उठाया था।"

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।

"ये नंबर किसका है?" मैंने पूछा।

"नहीं पता।" उसने फ़ोन अपने पास लिया। "पर वीर — जिस आदमी ने ये मैसेज भेजा है, वो जानता है कि मैंने गिलास उठाया था। वो जानता है कि मैं यहाँ हूँ।"

मैं खिड़की के पास गया। नीचे सड़क पर देखा। लोग, रिक्शा, बस। कोई खास नहीं।

"मीरा।"

"हाँ?"

"क्या तेरे पिता के अलावा कोई और जानता था कि तू आज लैब आ रही है?"

वो कुछ देर चुप रही। फिर बोली, "सिर्फ़ अभय को पता था। और…" वो रुकी।

"और?"

"और मैंने आज सुबह कॉलेज के बाहर एक आदमी को देखा था। वो दूर खड़ा था। मैंने सोचा कोई राहगीर है।"

"कैसा दिखता था?"

"लंबा। पतला। चश्मा।"

मेरी साँस रुक गई।

"चश्मा?"

"हाँ। और हाथ में फ़ाइल थी।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसकी आँखें फैल गईं।

हम दोनों ने एक साथ वही नाम सोचा।

हरनाम।

पर हरनाम तो भैरव का आदमी है। तो फिर उसने मीरा को बचाने वाला मैसेज क्यों भेजा? या ये मैसेज भैरव का है, और हरनाम सिर्फ़ पहुँचाने वाला?

मैंने मीरा का हाथ पकड़ा।

"गिलास दे," मैंने कहा। "हम इसे वापस रखेंगे।"

"क्या?"

"अगर हम इसे वापस नहीं रखते, तो वो समझ जाएगा कि हमने जाँच कर ली। और फिर वो सबूत मिटा देगा।" मैंने उसकी आँखों में देखा। "हम गिलास वापस रखेंगे। पर उससे पहले — रिपोर्ट की तीन कॉपी बनेंगी। एक तेरे पास, एक मेरे पास, और एक…" मैंने सोचा। "एक उस आदमी के पास जो भैरव से नहीं डरता।"

"कौन?"

"पंचायत का लंबा। हरिया चाचा। वो बीस साल से भैरव की शक्ल नहीं देखना चाहता।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर उसने पहली बार उस दिन मुस्कुराया। छोटी-सी मुस्कान।

"तुम गाँव के हो," उसने कहा। "पर तुम्हारा दिमाग़ शहर के वकील जैसा चलता है।"

"मैंने कहीं पढ़ा नहीं," मैंने कहा। "बस जब पेट खाली हो और जान खतरे में हो, तब दिमाग़ अपने आप चलने लगता है।"

वो हँसी। एक छोटी हँसी।

हमने रिपोर्ट की तीन कॉपी बनवाई। अभय ने मदद की, और इस बार उसने मेरी तरफ़ देखकर सिर हिलाया — वो वाली नज़र नहीं थी। मीरा ने गिलास रुमाल में लपेटकर बैग में रखा।

फिर हम निकले।

सड़क पर चलते वक़्त मैंने पूछा, "तू गिलास वापस कैसे रखेगी? भैरव का कमरा बंद रहता है।"

"चाबी मेरे पास है," उसने कहा। "मैंने कल रात बदली थी। हरनाम के ड्रॉअर से।"

मैं रुक गया।

"तूने हरनाम की चाबी बदली?"

"हाँ।" उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में वो ज़िद थी जो मुझे अब पहचानी लगती थी। "सबूत के बिना आरोप नहीं। और आरोप के बिना चुप्पी नहीं।"

मैं हँसा। पहली बार उस दिन।

"तू अजीब लड़की है," मैंने कहा।

"और तू अजीब लड़का है," उसने जवाब दिया। "गाँव में रहकर अखाड़े के मैनेजर से लड़ने वाला।"

हम चलते रहे। दोपहर ढल रही थी। नहर के पुल पर पहुँचे तो मीरा रुकी।

"वीर।"

"हाँ?"

"आज जो मैंने लैब में सोचा…" उसने नहर की तरफ़ देखा। "मैंने सोचा कि अगर पापा ने ये पिया था, तो वो बीस साल से मर रहे हैं। हर दिन थोड़ा-थोड़ा। और मैं उनके पास थी, और मुझे पता नहीं चला।"

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