Spirit of a Fighter – Chapter 78
"अब शुरू करें?" — मेरी आवाज़ मैदान में गूँजी, पर कोई जवाब नहीं आया।
भैरव की सेना खड़ी थी। पचास-साठ आदमी। हाथों में लाठियाँ, आँखों में वो डर जो हारे हुए आदमी की आँखों में होता है। भैरव जा चुका था, पर उसकी बातें हवा में लटक रही थीं।
मैंने गड्ढे में पैर रखा। मिट्टी अब भी गरम थी। पैर के तलवे से वो गरमी सीधी सीने तक गई, और मुझे लगा जैसे कोई मेरा हाथ पकड़कर कह रहा हो — "डर मत।"
तभी पीछे से आवाज़ आई।
"रुक जा, बेटा।"
मैं पलटा। माँ दीवार के पास खड़ी थीं। उनके हाथ जुड़े हुए थे और होंठ हिल रहे थे। उनके पीछे गुड़िया खड़ी थी, आँखें बड़ी, दोनों हाथों में कॉपी दबाए।
"आज नहीं," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ में वो कंपन था जो मैंने पहली बार सुना। "आज मत लड़।"
"माँ—"
"सुन ले।" वो दो कदम आगे आईं। "भैरव ने तुझे बताया कि उसने तुझे आग से बचाया। ये बात वो ऐसे ही नहीं बोला। वो तुझे उलझा रहा है। तेरे दिल में शक डाल रहा है। जो आदमी अपने दुश्मन को ये सोचने पर मजबूर कर दे कि वो उसका एहसानमंद है — वो आधी लड़ाई वहीं जीत जाता है।"
मैं चुप खड़ा रहा। मेरी मुट्ठी ढीली पड़ गई।
"पर माँ, वो तीसरा आदमी—"
"तीसरा आदमी मिल जाएगा," माँ ने कहा। "पर आज तेरे हाथ काँप रहे हैं। और काँपते हाथ से लड़ा मुकाबला सिर्फ़ एक चीज़ देता है — मौत।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी नहीं था। सिर्फ़ वो पुरानी चीज़ थी जो मैंने बीस साल से देखी थी — सब्र। बहुत ज़्यादा सब्र।
"कल सुबह," मैंने कहा।
माँ ने सिर हिलाया। "कल सुबह।"
गुड़िया दौड़कर आई और मेरे हाथ में कुछ दबा गई। मैंने देखा — मिट्टी की छोटी-सी गोली थी, हथेली में गरम।
"अखाड़े के गड्ढे से," उसने फुसफुसाया। "जब सब जा रहे थे, मैंने चुपके से उठा ली।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
घर पहुँचकर मैं सीधा चारपाई पर गिरा। शरीर में हड्डी तक दर्द था। पर आँख नहीं लगी। छत को देखता रहा, और भैरव की वो आख़िरी बात दिमाग़ में घूमती रही — "जिसके पास सबसे ज़्यादा सबूत हों, वही सबसे बड़ा मुजरिम होता है।"
मेरे दिमाग़ में एक चेहरा उभरा। हरनाम। वो आदमी जो हर मौत को "बीमारी" में बदल देता था। जिसके पास हर काग़ज़ था। जिसके पास वो हरी कवर वाली कॉपी थी।
पर फिर मैंने सोचा — हरनाम तो बस मोहरा है। वो भैरव से डरता है। जिसके पास सबसे ज़्यादा सबूत हैं…
मेरी आँख खुली। मैं उठकर बैठ गया।
नहीं। ये सोचना अभी जल्दबाज़ी है।
मैं फिर लेट गया। और इस बार नींद आ गई।
सुबह मैं उठा तो आँगन में चक्की की आवाज़ नहीं थी।
मेरा कलेजा धक् से रह गया। मैं दौड़कर बाहर गया — माँ आँगन में बैठी थीं, चक्की के पास, पर चक्की बंद थी। वो अपने हाथों को गोद में रखे देख रही थीं।
"माँ?"
"आज चक्की नहीं चलेगी," उन्होंने कहा। और फिर मुस्कुराईं। "आज मेरा बेटा लड़ेगा।"
मैं उनके पास बैठ गया। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी हथेली खुरदरी थी, चक्की के लकड़ी के हत्थे जैसी।
"कल रात मैंने सोचा," वो बोलीं, "कि बीस साल से मैं इस आँगन में बैठी हूँ। चक्की चलाती हूँ। दाल में नमक कम डालती हूँ। और इंतज़ार करती हूँ।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "आज इंतज़ार ख़त्म।"
"माँ, मैं हार भी सकता हूँ।"
"हार सकता है," उन्होंने कहा। "पर लड़ेगा। ये दो अलग बातें हैं।"
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
गुड़िया दौड़कर गई और लौटी — उसके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा था, जिस पर कोई नाम नहीं लिखा था।
मैंने खोला। अंदर एक काग़ज़ था, जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था — "आज अखाड़ा नहीं। आज शहर की लैब। सुबह ग्यारह बजे। तेरी मदद चाहिए। — मीरा"
नीचे एक छोटी लाइन थी — "गिलास मेरे पास है।"
मैंने काग़ज़ माँ को दिखाया। उन्होंने पढ़ा, फिर मेरी तरफ़ देखा।
"जा," उन्होंने कहा। "ये लड़की अकेली लड़ रही है। उसके साथ खड़ा हो।"
"पर अखाड़ा—"
"अखाड़ा तेरा पीछा नहीं करेगा," माँ ने कहा। "भैरव ने कल रात खुद कहा — तू पहले अपनी माँ को बचाता है या अपनी लड़की को। उसने सोचा तू उलझ जाएगा। पर तू उलझेगा नहीं। तू दोनों को बचाएगा। और उसके लिए सबूत चाहिए।"
मैंने सिर हिलाया।
गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा। "भैया, मैं भी चलूँगी?"
"नहीं।"
"पर मैंने कहा था—"
"तू घर पर रहेगी।" मैंने उसके कंधे पकड़े। "और माँ को अकेला नहीं छोड़ेगी। समझी?"
उसने होंठ सिकोड़े, पर सिर हिला दिया।
मैं नहाने गया। पानी डालते वक़्त मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने आँखें बंद करके सोचा — वीर सिंह, तू मज़दूर है। तेरे हाथ चक्की चलाने और ईंट ढोने के आदी हैं। ये काँपना क्या?
पर हाथ नहीं रुके।
मैंने कपड़े पहने। धोती नहीं — साधारण कुर्ता-पजामा। और मैं निकल पड़ा।
रास्ते में टिंकू मिला। वो अपनी दुकान के बाहर खड़ा था, हाथ में मिठाई की डिब्बी लिए।
"भाई, सुबह-सुबह किधर?"
"शहर।"
उसने डिब्बी मेरी तरफ़ बढ़ाई। "रास्ते के लिए।"
"टिंकू, अभी नहीं—"
"ले ले।" उसने ज़ोर देकर मेरे हाथ में थमा दी। "भूखे आदमी का दिमाग़ नहीं चलता, सिर्फ़ पेट चलता है। और तेरे दिमाग़ की आज बहुत ज़रूरत है।"
मैंने डिब्बी खोली। अंदर लड्डू थे। एक मुँह में रखा। मीठा था। और उस मिठास में अचानक मेरे हाथ रुक गए।
"टिंकू।"
"हाँ?"
"अगर आज कुछ हो जाए—"
"चुप।" उसने मेरी बात काट दी। उसकी आवाज़ में वो हँसी नहीं थी जो हमेशा रहती थी। "आज कुछ नहीं होगा। और तू शाम को लौटकर मुझे बताएगा कि क्या हुआ। मैं तब तक खीर बनाऊँगा।"
"खीर?"
"हाँ। और इस बार मैं उसमें नमक नहीं डालूँगा।" वो हँसा, पर उसकी आँखें गीली थीं।
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा और चल पड़ा।
शहर तक का रास्ता लंबा था। नहर के किनारे-किनारे जाना था, फिर पुल पार करके सड़क। मैं चलता रहा। मेरे पैरों में ज़ोर था, पर मन में एक ही बात — मीरा ने गिलास उठा लिया। भैरव के कमरे से। अगर भैरव को पता चल गया…
मैंने कदम तेज़ किए।
लैब तक पहुँचते-पहुँचते दोपहर हो गई थी। सफ़ेद दीवारों वाली इमारत, जिसके बाहर बड़े अक्षरों में लिखा था — "जिला विज्ञान केंद्र"। मैंने गेट पर खड़े चौकीदार को अपना नाम बताया। वो मुझे अंदर ले गया, तीसरी मंज़िल पर एक कमरे के बाहर रुक गया।
दरवाज़ा खुला। मीरा अंदर थी।
सफ़ेद कोट पहने हुए। बाल पीछे बँधे। हाथों में दस्ताने। और उसके सामने मेज़ पर… वो गिलास। रुमाल में लिपटा।
वो मेरी तरफ़ पलटी। उसके चेहरे पर थकान थी, पर आँखों में वो चमक थी जो मैंने पहली बार नहीं देखी थी।
"आ गए," उसने कहा।
"तू ठीक है?"
"मैं ठीक हूँ।" उसने अपना हाथ उठाया। उसकी उँगली पर पट्टी बँधी थी। "बस चाबी घुमाते वक़्त काँच का टुकड़ा लग गया।"
मेरा दिल धक् से रह गया। "भैरव को पता चला?"
"नहीं। मैं सुबह चार बजे गई थी। पीछे के रास्ते से। जब सब सो रहे थे।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "बैठो।"
मैं कुर्सी पर बैठ गया। मेरी नज़र उस पट्टी पर टिकी थी।
तभी अंदर से एक लड़का आया। पतला, बड़े चश्मे वाला, हाथों में फ़ाइल।
"ये मेरा सहपाठी है," मीरा ने कहा। "अभय। लैब में काम करता है।"
अभय ने चश्मा ठीक किया और मेरी तरफ़ देखा। फिर मीरा की तरफ़।
"मीरा, तुमने मुझे बताया नहीं था कि इसमें कोई और भी शामिल है।"
"अब जान लो," मीरा ने कहा। "ये वो है जिसने गिलास पहचाना।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno