Spirit of a Fighter77 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 77

7 min read November 5, 2026

"मैं पीछे से आऊँगा," उसने कहा। "दीवार के उस छेद से जहाँ से तू बचपन में कुश्ती देखता था। अगर तू जीता, तो मैं उसी छेद से चिल्लाऊँगा।"

मैं हँसा। पहली बार कई दिनों में मेरी हँसी सच्ची थी। "और अगर मैं हार गया?"

"तो मैं उसी छेद से रोऊँगा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में हँसी नहीं थी। "पर मुझे पता है तू नहीं हारेगा। क्योंकि तेरे पास वो है जो भैरव के पास नहीं — तेरे पास अपनी मिट्टी है।"

अखाड़े का गेट खुला था। मैंने अंदर कदम रखा।

मैदान में कम से कम सौ आदमी खड़े थे। पहलवान, गाँव वाले, बाज़ार के दुकानदार, सुक्खी बुआ अपने पान के बीड़े के साथ सबसे आगे। मैदान के बीच वो गड्ढा था, जैसे कोई खुला मुँह। और उसके ठीक पार भैरव सिंह खड़ा था, लाल धोती में, सोने की चेन चमक रही थी।

वो मुस्कुराया। उसकी मुस्कान में कुछ नहीं बदला था — वही मिठास, वही ज़हर।

"आ गया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ पूरे मैदान में गूँजी। "मैंने कहा था न, तीन दिन बाद एक ही आदमी खड़ा होगा। और वो तू नहीं होगा।"

"पर मैं खड़ा हूँ," मैंने कहा। "आपकी नज़र में शायद कोई और होगा। पर मिट्टी की नज़र में, मैं हूँ।"

भैरव हँसा। फिर उसने पीछे से एक गिलास उठाया। पानी का गिलास। वही गिलास, वही रस्म।

"पी ले," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो पुरानी मिठास थी। "तेरे पापा ने भी पी थी।"

मैंने गिलास नहीं लिया। मैंने अपनी जेब से वो शीशी निकाली — मीरा की शीशी। वो शीशी जो मैंने कल रात मीरा से ली थी, जो उसने रणवीर सिंह की दवा की अलमारी से निकाली थी। जिस पर बीस साल पुरानी तारीख खुदी थी।

मैंने वो शीशी भैरव की नाक के नीचे लहराई।

"ये आपकी ही शीशी है, सर," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो ठंडक थी जो मैंने कभी महसूस नहीं की थी। "बीस साल पुरानी। इस पर तारीख भी लिखी है। वही तारीख जिस दिन मेरे पापा मरे थे।"

भैरव के हाथ से गिलास छूटा। वो गिरा, और उसके टुकड़े मिट्टी में बिखर गए। पानी मिट्टी में फैल गया, और मैंने देखा — जहाँ वो पानी गिरा, वहाँ की मिट्टी ने एक झुर्री सी खींच ली। जैसे जल गई हो।

पूरा मैदान चुप था। सुक्खी बुआ का पान गिर गया। एक पहलवान ने पीछे हटकर अपनी धोती पकड़ ली।

मैंने शीशी भैरव के सामने रखी और कहा, "ये ज़हर मेरे पापा को मार गया। पर आपको मार नहीं पाया — क्योंकि आपने इसे पीना बंद नहीं किया। बस हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा पीते रहे। आप खुद अपनी मौत की तरफ़ चल रहे हो, सर।"

भैरव की आँखें ठंडी हो गईं। वो मेरी तरफ़ एक कदम बढ़ा। फिर रुका। वो धीरे से फुसफुसाया, और सिर्फ़ मैंने सुना, "तूने अपनी कब्र खुद खोदी है।"

और फिर कुछ हुआ जो मैंने सोचा नहीं था।

भैरव ज़ोर से हँसने लगा। वो हँसा, और उसकी हँसी पूरे मैदान में फैल गई। पहलवानों ने एक-दूसरे को देखा। किसी ने कुछ नहीं कहा। भैरव की हँसी में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना — जैसे कोई बहुत दिनों से रो रहा हो, और अब हँसी में फूट रहा हो।

"शाबाश!" उसने कहा, और उसकी आवाज़ गूँजी। "शाबाश! तूने वो कर दिखाया जो बीस साल में कोई नहीं कर सका। कोई नहीं!"

सब चुप थे। भैरव ने धीरे-धीरे ताली बजाई। एक। दो। तीन। उसकी ताली अकेली थी, पर वो सबसे तेज़ आवाज़ थी।

"बीस साल," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब मीठी नहीं थी। कड़वी थी। "बीस साल मैंने इन पहलवानों को पानी पिलाया। कोई नहीं पूछा। कोई नहीं बोला। सब पीते रहे। सब मरते रहे। और कोई नहीं आया जो ये शीशी मेरी नाक के नीचे लहराए।"

वो रुका। उसने अपनी कमीज़ का कॉलर खोला। उसकी गर्दन पर वो जला निशान दिखा — बड़ा, पुराना, पक्का। ठीक वैसा ही जैसा मेरी कलाई पर।

मैदान में सन्नाटा छा गया। लोगों ने साँस रोक ली।

"अब समझा?" भैरव ने धीरे से कहा। "ये निशान हम दोनों का एक ही है। और इसका मतलब तू अभी नहीं समझेगा। पर जिस दिन समझेगा, उस दिन तू मुझसे नफ़रत नहीं कर पाएगा।"

मेरी आँखें उसकी गर्दन पर टिक गईं। वो निशान। वो मेरी कलाई पर था। मैंने अपनी आस्तीन ऊपर की और अपनी कलाई उसके सामने रखी।

"ये निशान मेरी कलाई पर बीस साल से है," मैंने कहा। "मुझे याद है। मैं पाँच साल का था। रात थी। माँ रो रही थी। और मेरी कलाई जल रही थी।"

भैरव ने मेरी कलाई देखी। उसके चेहरे पर कुछ बदला। पहली बार उसकी आँखों में वो ठंडक नहीं थी। कुछ और था। दर्द? नहीं। पछतावा? शायद।

"तू पाँच साल का था," भैरव ने धीरे से कहा, "और उस रात तू कुएँ के पास खेल रहा था। तेरे पापा उस रात मुझसे लड़ने आए थे। और तू…" वो रुका। "तू आग में आ गया था। मैंने तुझे बचाया था।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

"क्या?"

"तेरे पापा ने मुझे छड़ से मारा," भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो सब था जो बीस साल से बंद था। "और छड़ मेरी गर्दन पर लगी। मैं गिरा। तेरे पापा ने सोचा मैं मर गया। वो तेरी तरफ़ भागे। और मैंने… मैंने उठकर उन पर ज़हर फेंका। वो ज़हर तेरे पापा पर गिरा। और तू पास खड़ा था। तेरी कलाई पर भी गिरा।"

मेरा दिमाग़ सुन्न हो गया। मैंने सिर्फ़ इतना कहा, "तो आपने मुझे बचाया?"

"मैंने तुझे अपनी गोद में उठाया," भैरव ने कहा, और अब उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। "और तेरी कलाई पर ठंडी मिट्टी लगाई। फिर तुझे तेरी माँ के पास छोड़ दिया। और भाग गया।"

मैं वहीं खड़ा रह गया। मेरे हाथों में ठंडक थी। मेरी कलाई पर वो निशान अब पहले से भारी लग रहा था।

भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें अब ठंडी नहीं थीं। गीली थीं।

"पर मैं बीस साल से ये नहीं कह सका," वो बोला। "क्योंकि जिसने मुझे ज़हर देना सिखाया, उसने मेरी जान बचाई थी। और वो तीसरा आदमी…" वो रुका। "वो तीसरा आदमी अभी भी इस अखाड़े में आता है। रोज़। और तू उसे जानता है।"

मेरे कानों में कालू काका की आवाज़ गूँजी — "उस रात तीन लोग थे। तेरे पापा, भैरव… और एक तीसरा।"

मैंने भैरव की आँखों में देखा। और उसकी आँखों में मुझे वो सवाल दिखा जो वो खुद बीस साल से पूछ रहा था।

"कौन?" मैंने पूछा। "वो तीसरा कौन है?"

भैरव ने अपना सिर हिलाया। "ये मैं नहीं बताऊँगा," उसने कहा। "ये तू खुद पहचानेगा। बस एक बात याद रख — जिसके पास सबसे ज़्यादा सबूत हों, वही सबसे बड़ा मुजरिम होता है।"

वो पलटा। और जाते-जाते रुका। उसने कंधे के ऊपर से कहा, "और वीर सिंह — तू आज लड़ेगा? या ये सब सुनकर तेरे हाथ काँप रहे हैं?"

मैंने अपनी मुट्ठी कसी। मेरी कलाई पर वो निशान गरम लगा। जैसे मेरे पापा का हाथ मेरी कलाई पकड़े हुए हो।

"मैं लड़ूँगा," मैंने कहा। "पर एक बात पहले — ये बताइए, मेरे पापा ने उस रात आपको क्यों मारा था?"

भैरव रुका। उसकी पीठ मेरी तरफ़ थी। वो कुछ देर चुप खड़ा रहा। फिर वो धीरे से बोला, और उसकी आवाज़ में वो बात थी जो सिर्फ़ मरे हुए लोग बोल सकते हैं —

"क्योंकि तेरे पापा ने मुझे उस तीसरे आदमी की असली शक्ल दिखा दी थी। और मैंने उसे मानने से इनकार कर दिया था।"

वो चला गया। मैदान में सिर्फ़ मैं बचा, गड्ढा, और सौ जोड़ी आँखें।

मैंने मिट्टी को अपने पैरों तले महसूस किया। वो अब भी गरम थी। और उस गरमी में मुझे एक नई आवाज़ सुनाई दी — मेरे पापा की आवाज़, जो मुझसे कह रही थी, "अब तेरी बारी है, बेटा।"

मैं गड्ढे के किनारे पर खड़ा हुआ। मेरे सामने भैरव की सेना थी। मेरे पीछे मेरी माँ दीवार के पास खड़ी थीं। और मेरे भीतर, कहीं गहरे में, मेरे पापा की मिट्टी धड़क रही थी।

मैंने अपनी धोती कसी। और मैंने अपनी आवाज़ में वो सब डालकर कहा जो बीस साल से जमा था —

"अब शुरू करें?"

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