Spirit of a Fighter – Chapter 76
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ बदला। कुछ ऐसा जो बीस साल से बंद था, वो खुल रहा था।
"कल सुबह," वो बोले, और आवाज़ में अब वो धीमापन नहीं, एक ठोस चीज़ थी, "जब तू अखाड़े के गेट पर खड़ा हो, तब तेरे साथ कोई नहीं होगा। भैरव की सेना होगी। पहलवान होंगे, लुट्टन जैसे भूखे कुत्ते होंगे। पर तेरे पास वो होगा जो किसी के पास नहीं — तेरी नाक।"
माँ दरवाज़े के पास खड़ी थीं। उन्होंने अब पीछे मुड़कर देखा। उनका चेहरा शांत था, पर आँखों में वो पानी था जो बीस साल से कभी पूरा नहीं बहा था।
"कालू भाई," माँ ने कहा, और आवाज़ में किसी बड़ी चीज़ की गरमी थी, "आज रात तुम हमारे घर खाना खाओ।"
कालू काका ने मना नहीं किया। वो आँगन में बैठे, और माँ ने उनके लिए रोटी बनाई। उन्होंने खाते वक़्त एक बार भी आँख नहीं उठाई। बस खाते रहे, चुपचाप, जैसे कोई बहुत दिनों की भूख मिटा रहा हो।
गुड़िया उनके पास आई और उनके घुटने पर हाथ रखकर बैठ गई। उसने कुछ नहीं कहा। उसने बस उनका हाथ पकड़ लिया।
कालू काका ने उसके सिर पर हाथ रखा और फिर वो रोए, पर चुपचाप, बिना आवाज़ के, जैसे बूढ़े पेड़ बारिश में रोते हैं।
मैं आँगन के बाहर निकला। रात का आसमान साफ़ था। मैंने अपनी हथेली खोली और उसमें रखी मिट्टी को देखा — वो मिट्टी जो मैंने अखाड़े के गड्ढे से उठाई थी। वो अब भी गरम थी।
मैंने उसे सूँघा।
और उसी पल मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। ये सिर्फ़ मिट्टी नहीं थी। इसमें कुछ और मिला था। एक ऐसी गंध जो मैंने कहीं सुनी थी — बहुत करीब से, बहुत पहले।
ये मेरे पापा की धोती की गंध थी। वही धोती जो मैंने पिछले हफ़्ते पहनी थी। वही धोती जो आज भी मेरे संदूक में रखी है।
पर ये मिट्टी तो मैंने अखाड़े के गड्ढे से उठाई थी। तो यहाँ पापा की धोती की गंध कहाँ से आई?
मेरा दिमाग़ तेज़ी से चला। भैरव ने कल रात मज़दूरों से ये गड्ढा खुदवाया था। मतलब वो गड्ढा उसने खुद नहीं खोदा, उसने उस जगह पर खुदवाया जहाँ कुछ और था।
मैं दौड़कर अंदर गया। "काका!"
कालू काका ने रोटी का टुकड़ा नीचे रखा।
"काका, भैरव ने मिट्टी तहखाने से उठाई या गड्ढे से?"
"तहखाने से," वो बोले। "दीवार के नीचे से।"
"तो अखाड़े के बीच वाला गड्ढा? वो किसलिए?"
कालू काका का चेहरा बदला। उन्होंने रोटी छोड़ दी।
"वो गड्ढा…" उनकी आवाज़ धीमी पड़ गई। "वो मैदान का बीच है। वहाँ कभी कुछ नहीं था। वहाँ सिर्फ़ मिट्टी थी। अच्छी मिट्टी। वो मिट्टी जिसमें रणवीर सिंह और तेरे पापा ने पसीना बहाया था।"
"तो भैरव ने वहाँ गड्ढा क्यों खुदवाया?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आँखों में वो डर लौट आया जो कुछ देर पहले गया था।
"क्योंकि…" वो धीरे से बोले, "क्योंकि वो उस मिट्टी को हटाना चाहता है। वो नहीं चाहता कि उस मैदान में कोई खड़ा हो। जो मिट्टी उसने चुराई है, उससे बढ़कर उसे उस पुरानी मिट्टी से डर लगता है जिसमें तेरे पापा का पसीना है।"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। भैरव डरता था। ये बात मेरे दिल में ऐसे उतरी जैसे किसी ने अंधेरे कमरे में दीया जला दिया हो।
"काका," मैंने कहा, "कल सुबह मैं उसी पुरानी मिट्टी पर लड़ूँगा।"
कालू काका ने मेरा चेहरा देखा। फिर वो बोले, "नहीं। तू उस गड्ढे में नहीं लड़ेगा। तू उसके ऊपर लड़ेगा। उस गड्ढे को अपने पैरों से ढक देगा।"
"कैसे?"
"गड्ढा भरने का समय नहीं है। पर तेरे पैरों में जो मिट्टी लगी है — वो तेरे पापा की मिट्टी है। उसे अपने पैरों से नीचे मत गिरने देना। तू उस गड्ढे के किनारे पर खड़ा हो। और जब भैरव उसे तेरी तरफ़ धकेले, तब तू उसे वापस उसी गड्ढे में गिरा।"
माँ ने हमारी बात सुनी। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस चूल्हे पर से पानी का लोटा उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"पी ले," उन्होंने कहा। "कल सुबह तक गला नहीं सूखना चाहिए।"
मैंने पानी पिया। और उस पानी में भी मुझे कुछ अलग लगा। मीठा। जैसे माँ ने उसमें कुछ मिलाया हो। मैंने पूछा नहीं। कभी-कभी माँ की चीज़ों में सवाल नहीं पूछे जाते।
रात को मैं बिस्तर पर लेटा। छत पर वही दरार थी, वही चाँद की रोशनी उसमें से आ रही थी। पर आज वो रोशनी मुझे अलग लगी। जैसे चाँद भी मेरे साथ जाग रहा हो।
मैंने आँखें बंद कीं। नींद नहीं आई। मन में बस एक ही बात घूम रही थी — भैरव का जला निशान। वो निशान जो उसने मुझे अभी दिखाया था। वो निशान जो मेरी कलाई पर भी है।
मेरी कलाई पर वो निशान बीस साल पहले का है। मैं तब पाँच साल का था। मुझे याद है — एक रात मैं जगा, माँ रो रही थी, और मेरी कलाई पर लाल निशान था। माँ ने उस पर ठंडी मिट्टी लगाई थी और कहा था — "कुछ नहीं हुआ, सो जा।"
पर कुछ तो हुआ था। और अब लगता है वो कुछ भैरव से जुड़ा है।
मैं उठा। आँगन में गया। कालू काका चारपाई पर सो रहे थे, पर उनकी आँखें खुली थीं। वो आसमान देख रहे थे।
"काका," मैंने धीरे से कहा, और उनके पास बैठ गया। "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"भैरव की गर्दन पर एक जला निशान है। मेरी कलाई पर भी वैसा ही है। ये क्या है?"
कालू काका कुछ देर चुप रहे। फिर वो करवट लेकर मेरी तरफ़ मुड़े।
"तेरे पापा और भैरव," वो बोले, "दोनों एक ही अखाड़े के पहलवान थे। एक ही मिट्टी में लड़े। एक ही रात उन दोनों को…" वो रुके। "बीस साल पहले, जिस रात तेरे पापा को ज़हर दिया गया, उस रात भैरव भी जला था। दोनों एक ही आग में। तेरे पापा की कलाई और भैरव की गर्दन — दोनों एक ही लोहे की छड़ से छुए थे जो उस रात अखाड़े में गरम की गई थी।"
"कौन जलाया था उन्हें?"
कालू काका ने मेरी आँखों में देखा। "मैं नहीं जानता। पर एक बात जानता हूँ — उस रात अखाड़े में तीन लोग थे। तेरे पापा, भैरव… और एक तीसरा।"
"कौन?"
"वो तीसरा आज भी ज़िंदा है। और वो मुझे रोज़ सुबह दरवाज़े पर पानी रखते देखता है।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"काका, आप कह रहे हैं कि—"
"मैं कुछ नहीं कह रहा," उन्होंने मेरी बात काटी। "मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ कि कल तू भैरव से लड़ेगा, तो उससे ये मत पूछना कि उसे किसने जलाया। वो बताएगा भी, तो झूठ बोलेगा। बल्कि उससे ये पूछना — 'उस रात तीसरा कौन था?' बस इतना पूछना। और उसके चेहरे को देखना।"
मैंने सिर हिलाया। मेरे अंदर कुछ जम रहा था। डर नहीं — कुछ और। जैसे कोई पुरानी गाँठ खुल रही हो।
सुबह मैं उठा तो माँ पहले से जाग रही थीं। उन्होंने मेरे लिए हलवा बनाया था। शक्कर कम थी, पर मैंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने मेरे माथे पर तिलक लगाया और फिर मेरा चेहरा दोनों हाथों में पकड़ा।
"वीर," उन्होंने कहा, "आज तू अखाड़े में उतरेगा तो मैं वहीं रहूँगी। दीवार के पास। जहाँ तू मुझे देख सके।"
"माँ, वहाँ खतरा है—"
"खतरा तो तब भी था जब तेरे पापा उतरे थे," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो डर से नहीं, यकीन से आती है। "और मैं तब भी दीवार के पास खड़ी थी। आज भी खड़ी रहूँगी।"
गुड़िया दौड़कर आई। उसने मेरी कलाई पर नया लाल धागा बाँधा। "भैया, आज तुम जीतोगे। मुझे पता है।"
"कैसे पता?"
"क्योंकि तुम्हारी आँखों में वो बात है जो कल नहीं थी," उसने कहा, और मुझे लगा ये बारह साल की बच्ची नहीं, कोई बूढ़ी आत्मा बोल रही है।
रास्ते में टिंकू मिला। उसके हाथ में मिठाई की डिब्बी थी। उसने मुझे एक लड्डू दिया और बोला, "ये खा ले, ताकत आएगी।"
"तू नहीं आ रहा?"
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