Spirit of a Fighter – Chapter 75
मैंने कटोरी सूंघी। पानी में मिट्टी घुली थी, पर उसके नीचे एक हल्की कड़वाहट थी। बहुत हल्की। जैसे किसी ने बहुत थोड़ा-सा ज़हर डालकर घोला हो। पर वो वही कड़वाहट थी।
मेरी आँखें खुल गईं। "माँ, ये वही है। पर बहुत कम। इतना कम कि कोई पी भी ले तो कुछ नहीं होगा। पर अगर ये मिट्टी में मिले, और फिर मिट्टी पानी सोखे, और फिर वो पानी पीया जाए…" मैंने कटोरी रखी। "भैरव ने पूरे अखाड़े की मिट्टी में ये मिला दिया है। हर पहलवान जो मिट्टी में पसीना बहाता है, उसकी त्वचा से ये अंदर जा रहा है।"
माँ के हाथ रुक गए। "मतलब… सिर्फ़ पानी से नहीं। मिट्टी से भी।"
"हाँ। इसीलिए लुट्टन इतना जल्दी बीमार पड़ा। उसने पानी भी पिया और मिट्टी में भी पसीना बहाया।"
माँ ने कटोरी उठाई और उसे चूल्हे की आग में उँडेल दिया। "अब मैं इसे घर में नहीं रखूँगी।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। आग में पानी गिरा तो भाप उठी — तेज़, चुभती हुई। माँ ने अपना मुँह पल्ले से ढक लिया।
"कल सुबह," मैंने कहा, और उठ गया।
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। "वीर, एक बात।"
"हाँ?"
"जब तू तहखाने में जाए, और वो मिट्टी सूंघे… और अगर तुझे कुछ ऐसा मिले जो तेरे पापा के शब्दों से जुड़ा हो…" उनकी आवाज़ भर आई। "तो उसे अपने साथ लेकर आ।"
"माँ, वो मिट्टी है—"
"मुझे पता है।" उन्होंने मेरी हथेली कसकर दबाई। "पर तेरे पापा ने कहा था — काट मेरे बेटे की नाक में है। तो जब तुझे वो काट मिले, मुझे उसे छूने दे। बस एक बार।"
मैंने सिर हिलाया। कुछ नहीं कहा। क्योंकि मेरे गले में कुछ अटका हुआ था।
रात को मैं आँगन में लेटा। गुड़िया की लाल मिट्टी की पोटली सीने पर रखी थी। आसमान में तारे दिख रहे थे — गाँव के आसमान में तारे हमेशा ज़्यादा दिखते हैं, शहर में नहीं। मैंने सोचा, मीरा शहर से आई है। उसने भी ये तारे देखे होंगे? या उसके शहर में सिर्फ़ बत्तियाँ दिखती हैं?
मुझे उसकी बात याद आई — "कल मैं कुछ लेकर आऊँगी जो मैंने बीस साल से नहीं दिखाया।" माँ के हाथ पर लिखा वो शब्द। जो अभी भी धुला नहीं है। वो किसी और के पास है।
मैंने आँखें बंद कीं। कल सुबह तहखाना। और शायद कल शाम — वो शब्द।
और तभी मुझे कुछ सूंघाई दिया। हवा में। बहुत हल्का। मीठा। जैसे गुड़ जल रहा हो। मैं उठ बैठा। आँगन के कोने में देखा। कुछ नहीं। फिर बाहर, गली की तरफ़।
गली के मोड़ पर एक लालटेन जल रही थी। छोटी। और उसके नीचे कोई खड़ा था। मैंने आँखें सिकोड़ीं। वो आदमी पतला था। चश्मा था। हाथ में फ़ाइलें थीं।
हरनाम।
वो मेरे घर की तरफ़ देख रहा था। मैंने साँस रोक ली। वो हिला नहीं। बस खड़ा रहा। फिर उसने अपनी जेब से कुछ निकाला — एक काग़ज़ — और उसे गली की मिट्टी में रख दिया। फिर पलटा और अंधेरे में चला गया। उसकी लालटेन की रोशनी दूर होती गई, फिर बुझ गई।
मैं उठा। धीरे-धीरे, दबे पाँव, गली तक गया। काग़ज़ उठाया। उसमें सिर्फ़ एक लाइन लिखी थी, उसी घुमावदार लिखाई में जो हरनाम की थी:
"कल सुबह तहखाने के रास्ते पर मत जाना। मैं तुझे बचाना चाहता हूँ।
मैंने वो काग़ज़ मुट्ठी में दबाया और सीधे माँ के पास गया।
"माँ, हरनाम हमारे घर के बाहर खड़ा था।"
उनके हाथ से चिमटा छूट गया। "क्या?"
"काग़ज़ छोड़ गया। लिखा है — कल सुबह तहखाने के रास्ते पर मत जाना। मैं तुझे बचाना चाहता हूँ।"
माँ ने काग़ज़ पढ़ा। उँगली उस लिखाई पर फिराई। "ये वही लिखाई है जो मेरे हाथ पर लिखी थी। ये हरनाम है। पर ये क्यों बचाना चाहता है तुझे? ये तो भैरव के साथ दिखता था।"
मैं उनके सामने बैठ गया। "माँ, सरस्वती ने कहा था कि पापा को ज़हर देकर कुएँ में फेंका गया था। उस रात कुएँ पर जो लोग थे…"
मैं रुक गया। क्योंकि माँ की आँखों में कुछ ऐसा तैरने लगा जो मैंने पहले नहीं देखा था। डर नहीं। कुछ और।
"मैं जानती हूँ," उन्होंने धीरे से कहा। "बीस साल से जानती हूँ।"
"क्या?"
"कालू काका रोज़ सुबह हमारे दरवाज़े के बाहर एक बर्तन में पानी रख जाते हैं। बिना कुछ कहे। बीस साल से। मैंने एक बार उनसे पूछा था क्यों — तो वो बस मुड़ गए और बोले, 'भाभी, मुझे माफ़ कर दो।' मैं समझ गई थी।"
मेरे हाथ काँपने लगे। "माँ, आपने मुझे क्यों नहीं बताया?"
"किस मुँह से बताती?" उनकी आवाज़ टूटी। "कि तेरे पापा रात भर कुएँ में तड़पते रहे और हम सब सोते रहे? कि सुबह जब वो मरे, तब किसी को पता चला? मैंने सोचा तू बड़ा हो जाए, खुद समझ जाए। पर मैं कभी नहीं चाहती थी कि तू ये सुने।"
मैं उठा। मेरे पैर मुझे खुद उठा रहे थे। "कालू काका कहाँ रहते हैं?"
"वीर, रुक—"
पर मैं निकल चुका था।
आँगन के बाहर मैंने दो कदम रखे और ठिठक गया। कालू काका खुद सामने खड़े थे। अंधेरे में, सिर्फ़ चाँद की रोशनी में। उनकी आँखें गीली थीं। वो मुझे देख रहे थे, जैसे बहुत देर से देखने की हिम्मत जोड़ रहे हों।
"काका, आप—"
वो बोले नहीं। बस धीरे-धीरे, जैसे कोई बूढ़ा पेड़ झुकता है, वो मेरे पैरों पर गिर पड़े। उनके घुटने मिट्टी से टकराए। उनके हाथ मेरे पैर पकड़े हुए काँप रहे थे।
"मुझे माफ़ कर दे बेटा," वो फूट-फूटकर रोए। "बीस साल से मैं तेरे पापा की आवाज़ सुनता रहा हूँ। रात में। कुएँ से। 'कालू, बचा ले…' और मैं अपनी चारपाई पर पड़ा रहता था। हर रात। बीस साल।"
मैं झुका और उन्हें कंधों से पकड़कर उठाने लगा। वो उठने को तैयार नहीं थे। मैंने उनके झुर्रियों भरे गालों को हाथों में लिया।
"काका, उठिए। प्लीज उठिए।"
"मुझे मत उठा," वो रोए। "मैं इस लायक नहीं—"
"काका, सुनिए।" मेरी आवाज़ भी अब काँप रही थी, पर मैं कहीं से ताकत लाकर बोला। "आपने मुझे पापा से ज़्यादा दिया है। आपने मुझे मिट्टी दी। जब मैं छोटा था, आप मुझे अखाड़े की मिट्टी में बैठाते थे, कहते थे — 'इस मिट्टी में तेरे पापा का पसीना है।' आपने मुझे वो दिया जो पापा दे पाते तो देते। प्लीज काका, उठिए।"
वो उठे। मेरी बाँहों में। और फिर हम दोनों वहीं, आँगन के बाहर, गली की मिट्टी पर खड़े-खड़े रोए। उनका सिर मेरे कंधे पर था। मेरा सिर उनके कंधे पर। माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। उन्होंने मुँह फेर लिया।
कुछ देर बाद कालू काका ने अपनी आँखें पोंछीं। उन्होंने मेरा चेहरा दोनों हाथों में पकड़ा। और तब उनकी आवाज़ में वो धीमापन नहीं था, जो अब तक था। वो सीधे खड़े हुए, कमर सीधी की, और बोले —
"बेटा, तेरे पापा ने मरने से पहले एक बात कही थी जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई। उस रात मैं कुएँ तक पहुँचा था। देर से। पहुँचकर डर गया, भाग गया। पर वो अब भी ज़िंदा थे। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और कहा — 'कालू, मेरे बेटे से कहना कि उसकी नाक वरदान नहीं, ज़िम्मेदारी है। और वो ज़हर जो मुझे मार गया, उसकी काट मेरे बेटे की नाक में ही है — उसे सूंघकर पहचानना होगा।' बस इतना कहा, और फिर उनकी पकड़ ढीली हो गई।"
॥
"बस इतना कहा, और फिर उनकी पकड़ ढीली हो गई।"
कालू काका ने ये आख़िरी लाइन कही और फिर चुप हो गए। उनकी उँगलियाँ मेरी कलाई पर थीं, ठंडी, काँपती हुई। गली में सिर्फ़ दूर किसी कुत्ते के रोने की आवाज़ आ रही थी।
"और मैं भाग गया," उन्होंने धीरे से कहा, जैसे खुद को ही सज़ा दे रहे हों। "तेरे पापा की आवाज़ पीछे छोड़कर। कुएँ से दूर। बीस साल तक उसी भागने की आवाज़ से जागता रहा।"
मैंने उनके हाथ अपनी दोनों हथेलियों में लिए। मेरी आवाज़ कहीं गहरे से निकली, जैसे मेरे पापा खुद मेरे मुँह से बोल रहे हों।
"काका, आप भागे नहीं थे। आप ज़िंदा बचे थे। और अगर आप ज़िंदा नहीं बचते, तो ये बात मुझ तक कैसे पहुँचती?"
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