Spirit of a Fighter74 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 74

7 min read November 5, 2026

"काका," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में अब कुछ ठंडा जम रहा था, "अगर ये ज़हर किसी चीज़ को मिलाकर बना है, तो उस चीज़ की काट भी होगी।"

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो पुरानी रहस्यमयी बात लौट आई थी, पर इस बार उसमें डर नहीं था। कुछ और था। उम्मीद।

"होगी," वो बोले। "पर वो हमें खुद ढूँढनी पड़ेगी। और उसके लिए…" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, "उसके लिए तुझे अपनी नाक पर पूरा भरोसा करना होगा। एक बार भी शक किया, तो गंध खो जाएगी।"

माँ ने तभी कुछ कहा। उनकी आवाज़ शांत थी, पर उसमें वो ताकत थी जो रोने के बाद आती है। "कालू भाई, तहखाने की मिट्टी के साथ क्या हुआ, वो तो बताओ। साफ़-साफ़। बीस साल का हिसाब है, आज पूरा हो जाए।"

कालू काका ने माँ की तरफ़ देखा। फिर ज़मीन पर। "सरस्वती, तहखाने की मिट्टी में असली ताकत है। वो ताकत सैकड़ों साल पुरानी है। साधु-संत वहाँ साधना करते थे। उनकी तपस्या मिट्टी में उतर गई। पर वो मिट्टी सिर्फ़ उसी को ताकत देती है जिसका मन साफ़ हो। लालची के लिए वो सिर्फ़ मिट्टी है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "भैरव ने उसमें ज़हर घोला, क्योंकि उसे साफ़ मन वाला पहलवान नहीं चाहिए था। उसे गुलाम चाहिए थे। मिट्टी जब ताकत नहीं देती, तो ज़हर दे। और ज़हर ताकत देता है — पर कीमत लेकर। उम्र की कीमत।"

"और मेरे पापा ने वो ज़हर पी लिया?" मैंने पूछा। "जानते हुए?"

कालू काका ने सिर हिलाया। "वो जानते थे कि पानी में कुछ मिला है। पर उन्होंने पिया। क्योंकि उस दिन अपने सामने भैरव खड़ा था और अखाड़े में सब देख रहे थे। मना करते तो भैरव कहता — 'देखो, रघुवीर डर गया।' और तेरे पापा डर को अपनी मिट्टी पर हावी नहीं होने देते।" उनकी आवाज़ भारी हो गई। "उन्होंने पूरा गिलास पिया। और फिर लड़े। और जीते। जीत के बाद वो मैदान में गिरे। बेहोश। और भैरव ने कहा — 'थकान है, आराम करने दो।' और उसी रात…"

वो रुक गए। कुछ नहीं बोले। ज़रूरत नहीं थी।

मैं उठा। मेरे अंदर कुछ हो रहा था। गुस्सा नहीं — गुस्सा तो पहले से था। कुछ और। एक साफ़ ठंडक, जैसे नहर का पानी सिर पर डाला गया हो। "काका, मुझे तहखाने का रास्ता दोबारा दिखाइए। आज रात।"

"आज रात?" माँ की आवाज़ में घबराहट आई।

"माँ, मैंने अभी तक तहखाने की मिट्टी को सिर्फ़ सूंघा है। कभी पूरा परखा नहीं। अगर मुझे पहचानना है कि उसमें क्या मिलाया गया है, तो मुझे उसे गीली मिट्टी के साथ, ज़मीन के अंदर परखना होगा। उस तहखाने की मिट्टी में जाकर।"

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। लंबा। गहरा। फिर वो बोले, "आज रात नहीं। कल सुबह। सूरज निकलने से पहले। तहखाने में रात में भैरव के आदमी रहते हैं — उसने बीस साल से उस जगह पर पहरा बिठाया है। सुबह के झुटपुटे में वो ढीले पड़ जाते हैं।"

"कल सुबह," मैंने दोहराया।

"पर एक शर्त है," कालू काका ने कहा। "तू अकेले नहीं जाएगा। मैं साथ चलूँगा।"

"काका, आप—"

"मैं बूढ़ा हूँ, अंधा नहीं।" उनकी आवाज़ में पहली बार कोई झटका आया — जैसे सालों बाद कोई अपनी आवाज़ को फिर से पहचान रहा हो। "मैं बीस साल से उस तहखाने के बाहर खड़ा हूँ, अंदर नहीं जा सका। आज अंदर जाऊँगा। तेरे पापा से मुँह छुपाते रहे, आज एक बार उनका हाथ पकड़ूँगा — उसी मिट्टी से।"

माँ ने कुछ कहना चाहा। पर फिर चुप हो गईं। उन्होंने अपनी साड़ी का पल्ला ठीक किया, और मेरी तरफ़ देखकर बोलीं, "जब जाना, मेरे हाथ का पानी पीकर जाना।"

कालू काका उठे। उन्होंने अपने कुर्ते की धूल झाड़ी। और जाने लगे तो मैंने उन्हें रोका।

"काका, एक बात।"

"बोल।"

"जब आप मेरे पापा को कुएँ में देख रहे थे… आपने भैरव को भी देखा था?"

कालू काका ठिठके। उन्होंने पलटकर नहीं देखा। बस दरवाज़े की तरफ़ मुँह किए बोले, "देखा था। भैरव, लुट्टन का बाप, और एक तीसरा आदमी था। वो मुँह छुपाए था। पर मैंने उसकी आवाज़ सुनी थी।"

मेरा दिल एक धड़कन रुक गया। "आवाज़?"

"हाँ।" कालू काका ने दरवाज़े की चौखट पकड़ी। "और वो आवाज़ मुझे आज भी याद है। वो अखाड़े की आवाज़ नहीं थी। वो किसी पढ़े-लिखे आदमी की आवाज़ थी। जो घुमा-फिराकर बोलता है।"

मैं खड़ा रह गया। मेरे सामने एक नाम तैरने लगा। हरनाम। ठेकेदार हरनाम। जो अखाड़े का हिसाब रखता है। जो मौतों को बीमारी में बदलकर लिखता है।

कालू काका चले गए। उनकी छड़ी की आवाज़ आँगन की मिट्टी पर रुक-रुक कर आती रही, फिर दूर हो गई।

माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। "क्या सोच रहा है?"

"हरनाम," मैंने कहा। "माँ, हरनाम के पास एक हरी कवर वाली कॉपी है। मुंशीजी ने बताया था। उसमें बीस साल का पूरा हिसाब है।" मैंने उनकी तरफ़ देखा। "अगर उस रात हरनाम वहाँ था, तो वो सिर्फ़ हिसाब नहीं रखता। वो साज़िश का हिस्सा है। और उस कॉपी में सिर्फ़ पैसों का हिसाब नहीं है। उसमें वो भी लिखा होगा जो भैरव नहीं लिखता — किस रात क्या हुआ।"

माँ ने धीरे से कहा, "तो तू कल सुबह तहखाने से पहले… या बाद…"

"तहखाने से पहले नहीं," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में अब एक साफ़ योजना की लय थी। "क्योंकि अगर मैं आज रात हरनाम के काग़ज़ों के पास पहुँचा और पकड़ा गया, तो भैरव सब मिटा देगा। तहखाना पहले। मिट्टी पहले। जब मुझे पता चलेगा कि ज़हर में क्या मिलाया गया है, तब मैं हरनाम के सामने जाऊँगा — और उसकी अपनी कॉपी से उसे डराऊँगा।"

माँ ने मेरा चेहरा देखा। लंबा। फिर उन्होंने कहा, "तेरे पापा भी ऐसे ही सोचते थे। पहले मिट्टी, फिर बात।"

मैंने सिर नीचा किया। मेरी आँखें फिर भर आईं, पर इस बार आँसू नहीं आए। सिर्फ़ गरमी आई।

"माँ, आज रात मुझे कुछ करना है।"

"क्या?"

"मुझे अपनी नाक पर भरोसा करना सीखना है। बिना शक। काका ने कहा, एक बार शक किया तो गंध खो जाएगी।" मैंने अपनी हथेली देखी, जिस पर गुड़िया की आटे वाली गोली रखी थी। "मैं आज रात आँगन में बैठूँगा। आँखें बंद करके। और हर चीज़ सूंघूँगा — मिट्टी, चूल्हे की राख, माँ की हल्दी, गुड़िया की कॉपी की स्याही। जब तक हर गंध साफ़ न हो जाए।"

माँ मुस्कुराईं। पहली बार आज सुबह। "तो आज रात रसोई में बैठना। मैं तुझे हर मसाला सूंघाऊँगी।"

शाम को गुड़िया स्कूल से लौटी। उसने बस्ता रखा और सीधे मेरे पास आई। "भैया, माँ ने बताया काका आए थे।"

"हाँ।"

"और वो रोए?"

मैंने सिर हिलाया।

गुड़िया ने अपनी जेब से कुछ निकाला — एक छोटी-सी पोटली, लाल कपड़े में बँधी। "ये मैंने आज स्कूल में बनाई। इसमें अखाड़े की मिट्टी है — वो जो मैंने पिछली बार लाई थी। मैंने सोचा, कल तू तहखाने जाएगा, तो ये साथ रखना।"

मैंने पोटली खोली। लाल मिट्टी। मैंने उसे सूंघा। गरम थी, जैसे किसी ने अभी हाथ में गूंधी हो।

"गुड़िया," मैंने कहा, "तू बारह साल की है, पर तेरी अक्ल मेरी उम्र से बड़ी है।"

उसने घमंड से ठुड्डी उठाई। "मुझे पता है।"

रात को मैं रसोई में बैठा। माँ ने हर डिब्बी खोली — हल्दी, जीरा, धनिया, काली मिर्च, सोंठ, लौंग। मैंने आँखें बंद कीं और एक-एक करके सूंघा। पहले तो सब एक जैसा लगा। फिर धीरे-धीरे फ़र्क़ आने लगा — हल्दी में मिट्टी जैसी गरमी, जीरे में तेज़ झुनझुनी, काली मिर्च में आग, सोंठ में सूखी गरमी।

"अब ये," माँ ने एक छोटी कटोरी आगे बढ़ाई। "ये पानी है जो मैंने आज सुबह अखाड़े की दीवार से लगी मिट्टी पर डाला था। तूने कहा था भैरव ने वहाँ कुछ फैलाया है।"

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