Spirit of a Fighter – Chapter 73
"तेरे पापा ने उस रात कालू से कुछ कहा था।" माँ ने मेरी तरफ़ देखा। "कालू ने मुझे ये बात नहीं बताई। बस इतना कहा कि रघुवीर ने आख़िरी वक़्त में उसका हाथ पकड़ा था और कहा था — 'कालू, मेरा बेटा जब बड़ा हो, उसे मेरी मिट्टी देना। और उससे कहना कि जो मुझे मारा, उससे बदला नहीं लेना। सच लेना।'"
"सच लेना…" मैंने धीरे से दोहराया।
"हाँ।" माँ ने मेरा हाथ कसकर पकड़ा। "और कालू ने मुझसे कहा था — 'सरस्वती, अगर तूने या तेरे बेटे ने कभी भी ये बात भैरव के सामने खोली, तो मैं ज़िंदा नहीं रहूँगा। और तू भी नहीं।' इसलिए मैं चुप रही। डर के मारे। हर रोज़ डर के मारे।"
मैं उठ खड़ा हुआ। मेरी साँस तेज़ हो गई थी। आँगन में बर्तन रखे थे, चक्की की टूटी लकड़ी पड़ी थी — भैरव के आदमियों का काम। मैंने उस चक्की की तरफ़ देखा, और फिर माँ की तरफ़।
"वो अकेले थे," मेरी आवाज़ काँप रही थी। "पूरी रात कुएँ में। और कोई नहीं आया। कोई नहीं।"
"बेटा—"
"माँ, वो मेरे पापा थे!" मेरी आवाज़ टूट गई। "वो मुझे छुपकर देखते थे अखाड़े की दीवार से। मुझे पता है। कालू काका ने बताया था। वो मेरी नाक के बारे में जानते थे। वो मुझे दूर रखना चाहते थे, मेरी ही भलाई के लिए। और मैं… मैं उसी अखाड़े में जाने की ज़िद करता रहा, जहाँ उन्हें मारा गया।"
माँ उठीं। उन्होंने मेरा चेहरा अपने दोनों हाथों में लिया। उनके हाथ अब गरम थे। कैसे, पता नहीं। शायद रोने से।
"सुन मेरी बात," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो सिर्फ़ माँ की आवाज़ में होती है। "तेरे पापा अकेले मरे, ये सच है। और ये सच मुझे हर रात जगाता है। पर एक बात मत भूलना — उस रात वो अकेले थे, पर आज तू अकेला नहीं है। तेरे पीछे गुड़िया है, टिंकू है, मीरा है, और मैं हूँ। और कालू भी है — बस उसे अपनी ग़लती का बोझ उतारने का मौक़ा दे।"
मैंने अपनी आँखें पोंछीं। हथेली गीली हो गई।
"मैं काका को ढूँढने जा रहा हूँ।"
"जा," माँ ने कहा। "और सुन — उन पर मत चिल्लाना। वो भी बीस साल से उसी कुएँ में डूबे हुए हैं।"
मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा ही था कि आँगन की मिट्टी पर एक परछाईं पड़ी। मैं ठिठक गया।
दरवाज़े पर कालू काका खड़े थे।
उनका कुर्ता धूल भरा था। सफ़ेद दाढ़ी में भी धूल थी। और उनकी आँखें — जो हमेशा आधी बंद रहती थीं जैसे कोई पुरानी किताब पढ़ रहे हों — आज पूरी खुली थीं। और उनमें पानी था। बहता हुआ नहीं, बस जमा हुआ। जैसे बरसों का।
वो खड़े थे। काँप रहे थे। उनका कुबड़ा शरीर और भी छोटा लग रहा था।
"काका…" मैंने कहा।
वो अंदर आए। दो कदम। तीन। फिर मेरे सामने, आँगन की मिट्टी पर, उनके घुटने टिक गए। मैंने उन्हें रोकना चाहा, पर मेरे हाथ हवा में ही रुक गए। वो मेरे पैरों पर गिर पड़े। उनका माथा मेरे पैरों के पास मिट्टी को छू रहा था।
"मुझे माफ़ कर दे बेटा," उनकी आवाज़ काँप रही थी, फटी हुई, बूढ़ी। "मैं बीस साल से तेरे पापा की आवाज़ सुनता रहा हूँ। हर रात। कुएँ से आती है। मुझे बुलाती है। और मैं… मैं मुँह में कपड़ा ठूँसकर सो जाता था।"
मेरा सीना भर आया। मैं झुका। मैंने उनके कंधे पकड़े। उनका शरीर हड्डियों का बोरा लग रहा था, इतना हल्का।
"काका, उठिए।"
"नहीं, पहले सुन ले—"
"काका।" मैंने उन्हें ज़ोर से उठाया। वो मेरे साथ उठे, पर उनकी आँखें अब भी नीचे थीं। मैंने उनका चेहरा अपने हाथों में लिया, जैसे माँ ने मेरा लिया था। उनके गाल ठंडे थे, झुर्रियों में आँसू भरे थे। "काका, आपने मुझे पापा से ज़्यादा दिया है।"
वो रुके। मेरी तरफ़ देखा।
"आपने मुझे मिट्टी दी," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ भर आई। "वो मिट्टी जो मेरे पापा की थी। आपने मुझे बताया कि मैं किसका बेटा हूँ। आपने मुझे अखाड़े का रास्ता दिखाया। आपने मुझे सिखाया कि मिट्टी झूठ नहीं बोलती। अगर आप न होते, तो मैं आज भी उस दीवार के छेद से देखता रह जाता।"
कालू काका की आँखों से पानी बह निकला। वो मेरे सीने से लग गए। उनका शरीर हिल रहा था। मैंने उन्हें कसकर पकड़ा। मेरी आँखें भी भर आईं, और मैंने उन्हें रोका नहीं। आँगन में हम दोनों खड़े थे — एक बूढ़ा कुबड़ा मज़दूर और एक नौजवान — और हम दोनों रो रहे थे, बिना किसी शर्म के। क्योंकि कुछ आँसू शर्म के नहीं होते। वो हिसाब होते हैं। बीस साल का हिसाब, आज आँगन की मिट्टी में उतर रहा था।
माँ पास आईं। उन्होंने कालू काका के सिर पर हाथ रखा — धीरे, जैसे किसी बच्चे को आशीर्वाद दे रही हों। "अब बस, कालू भाई," वो बोलीं। "अब बस।"
कालू काका ने आँसू पोंछे। अपनी कमर सीधी की — जितनी हो सकी। और जब वो बोले, तो उनकी आवाज़ में वो धीमापन नहीं था जो हमेशा रहता था। वो आवाज़ अब साफ़ थी, जैसे किसी ने सालों की जमी धूल झाड़ दी हो।
"बेटा," वो बोले, मेरी आँखों में सीधा देखकर, "तेरे पापा ने मरने से पहले एक बात कही थी जो मैंने आज तक किसी को नहीं बताई।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उनका हाथ पकड़ा।
"वो कुएँ में थे," कालू काका की आवाज़ धीमी हो गई, जैसे वो खुद उस रात में लौट रहे हों। "मैं ऊपर सीढ़ी पर बैठा था। रात का तीसरा पहर। उनकी साँस चल रही थी, पर बस। मैंने नीचे झाँका। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। मैं रो रहा था। मैं बोला — 'रघुवीर, मैं तुझे निकालता हूँ।' पर वो बोले, 'नहीं कालू। भैरव के आदमी बाहर हैं। तू मरेगा, और मेरा बेटा भी मरेगा।'"
कालू काका ने साँस ली। उनका गला भरा हुआ था।
"फिर उन्होंने मेरा हाथ कसकर पकड़ा। बहुत कसकर। जैसे जान जा रही हो और पकड़ बाकी हो। और बोले — 'कालू, मेरे बेटे से कहना कि उसकी नाक वरदान नहीं, ज़िम्मेदारी है।'"
मैं सन्न रह गया। मेरे सूंघने की शक्ति। वो जानते थे। वो जानते थे, और उन्होंने इसे वरदान नहीं कहा — ज़िम्मेदारी कहा।
"और…" कालू काका की आवाज़ और नीचे गई। "और फिर उन्होंने आख़िरी बात कही — 'वो ज़हर जो मुझे मार गया, उसकी काट मेरे बेटे की नाक में ही है। उसे सूंघकर पहचानना होगा।'"
कमरे में सन्नाटा छा गया। माँ ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया। मैं ज़मीन पर बैठ गया — पैर सँभाल नहीं पा रहे थे। मेरे दिल में एक बात बज रही थी, बार-बार, जैसे कुएँ में पानी गिरता हो।
काट। इलाज नहीं — काट। ज़हर की काट, मेरी नाक में।
"काका," मैंने धीरे से कहा, और मेरी आवाज़ अपनी नहीं लग रही थी, "आपको क्या लगता है, उनका क्या मतलब था?"
कालू काका मेरे पास बैठ गए। उनकी हड्डियाँ बैठते वक़्त चटकीं। "मैं बीस साल से यही सोच रहा हूँ, बेटा। और आज एक बात समझ आई।" उन्होंने मेरी नाक की तरफ़ देखा, फिर मेरी आँखों में। "वो ज़हर जो तहखाने की मिट्टी में है — वो पहले कभी ज़हर नहीं था। वो दवा थी, बेटा। दवा।"
"दवा?" मैंने सिर उठाया।
"बीस साल पहले तक तहखाने की मिट्टी में जो था, वो ताकत देता था। सिर्फ़ ताकत। उम्र नहीं खाता था। पर किसी ने उसमें कुछ मिलाया। कुछ ऐसा जो उसे ज़हर बना दे।" उन्होंने अपनी अंगुली ज़मीन पर रखी। "तेरे पापा ने उस मिलावट को पहचान लिया था। और उन्होंने कहा — मेरा बेटा उसे सूंघकर पहचानेगा। यानी तेरी नाक वो काम करेगी जो बीस साल में कोई लैब नहीं कर पाई।"
मैंने आँखें बंद कीं। तहखाने की वो गंध याद आई — कड़वी, धातु जैसी, और उसके नीचे मिट्टी की गंध। मैंने सोचा कि क्या वो कड़वाहट मिट्टी की थी, या उसमें मिली किसी चीज़ की। मैंने पहले कभी ये नहीं सोचा था कि ज़हर भी किसी चीज़ से बनता है। कि उसका भी एक नुस्ख़ा होता है। और अगर नुस्ख़ा है, तो उसे उलटा भी किया जा सकता है।
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