Spirit of a Fighter – Chapter 829
"तूने कौन-सा नाम सुना है?"
"मोहन," मीरा ने कहा। "भैरव का असली नाम।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तू कह रही है कि भैरव की माँ उसे मोहन बुलाती थी?"
"वो औरत जो गाती थी, वो अपने बेटे को खो चुकी थी," मीरा ने कहा। "और उसका बेटा अब भी उसके पास नहीं है। भैरव माधव के पास बड़ा हुआ।"
मैंने सिर हिलाया। मेरे सीने में एक अजीब-सी घुटन थी। भैरव — जिसने मेरी माँ को उठाया, जिसने मुझे लाल पोटली दी, जिसने कहा "आज मैं खुद को हराने के लिए लड़ूँगा" — उसकी माँ बीस साल से ठाकुर के बंगले में बंद थी। और वो जानता भी नहीं था।
हम बंगले की पीछे वाली बाड़ी तक पहुँचे। बाड़ी में ऊँची घास थी, और कुछ पुराने पेड़। बाड़ी के आख़िर में कुआँ था — चौकोर, पत्थरों से बना। ऊपर एक बड़ा पत्थर रखा था।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया।
फिर मैंने देखा — बाड़ी के कोने में, घास के बीच, कुछ चमक रहा था। मैं वहाँ गया।
वो चमकती चीज़ एक चांदी की अंगूठी थी। छोटी, मैली, घास में दबी हुई। मैंने उसे उठाया। अंगूठी के अंदर कुछ खुदा था — "मोहन"।
मेरे हाथ काँपने लगे।
"मीरा," मैंने आवाज़ दी। "ये देख।"
वो दौड़कर आई। अंगूठी देखी। उसकी आँखें फैल गईं।
"ये यहाँ कैसे?"
"कोई यहाँ आता है।" मैंने घास को देखा। कुछ जगह दबी थी। पैरों के निशान थे — छोटे, किसी औरत के। "कोई यहाँ से कुएँ तक जाता है।"
मीरा ने अंगूठी मेरे हाथ से ली और अपनी जेब में रख दी। "मैं इसे संभालकर रखूँगी। अगर वो औरत मिले, तो ये उसे दिखाऊँगी।"
हम कुएँ के पास पहुँचे। ऊपर रखा पत्थर भारी था, पर हमने मिलकर धकेला। पत्थर सरक गया। अंदर से ठंडी हवा आई — नम, बंद, कुछ सड़ी-सी गंध वाली।
मैंने अंदर झाँका। अंधेरा था। गहरा। पर नीचे कुछ दूर पर पानी की चमक दिख रही थी।
"रस्सी?" मैंने मीरा से पूछा।
उसने अपना दुपट्टा खोला। "ये।"
"ये कमज़ोर है।"
"तो तू मज़बूत पकड़ लेना।" उसने कहा। और उसकी आवाज़ में वो बात थी जो पहले नहीं थी — डर नहीं, हिम्मत।
मैंने कुएँ के किनारे पैर रखे। मीरा ने दुपट्टे का एक सिरा पेड़ से बाँध दिया और दूसरा मुझे दिया।
"वीर।" उसने कहा।
मैं रुका। उसने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"अगर अंदर कुछ गड़बड़ हो," उसने धीरे से कहा, "तो मैं तुम्हारा नाम नहीं, हमारा नाम बोलूँगी।"
मैंने पहली बार उसकी आँखों में सीधा देखा। वो मुझसे नज़र नहीं चुरा रही थी। मैं मुस्कुराया — पता नहीं क्यों, उस वक़्त हँसी आई।
"हमारा नाम?" मैंने कहा। "अभी तो कुछ शुरू भी नहीं हुआ।"
"तो शुरू कर।" उसने कहा।
मैं दुपट्टा पकड़कर नीचे उतरने लगा। पत्थरों की दीवार हाथों से छू रही थी — ठंडी, सीलन भरी। मेरे नीचे पानी था, पर वो ज़मीन से थोड़ा ऊपर था। कुएँ की दीवार में एक जगह पत्थर हटे हुए थे — एक छेद, आदमी के जितना।
मैं उस छेद में घुसा। सुरंग शुरू हो गई। अंधेरा इतना था कि अपना हाथ भी नहीं दिख रहा था। मैं दीवार को हाथ से टटोलता हुआ चलता रहा। ज़मीन नम थी। कहीं-कहीं पानी था।
कुछ कदम चला, तो रुक गया।
सामने से साँस लेने की आवाज़ आई। धीमी। भारी। जैसे कोई बहुत थका हुआ हो। या बहुत बूढ़ा।
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मेरी माँ की जली रोटी जेब में थी। मैंने उसे दबा लिया।
"कौन है?" मैंने चिल्लाकर कहा। मेरी आवाज़ सुरंग में गूँज उठी।
कुछ पल सन्नाटा रहा। फिर वो आवाज़ आई — धीमी, फटी, जैसे सालों से किसी ने बोला न हो।
"मैं।" फिर एक लंबी साँस। "तेरी माँ नहीं। पर तेरे पापा की क़ब्र का रखवाला।"
॥
"तेरे पापा की क़ब्र का रखवाला।"
वो शब्द सुरंग में गूँजते रहे। मेरा हाथ जेब में जली रोटी पर था, और साँस रुकी हुई। सामने अंधेरे में कोई था — पर वो बोल रहा था। बोलने वाला कोई ज़िंदा आदमी था।
"आगे आ," वो आवाज़ फिर आई। "मैं तुझे खा नहीं जाऊँगा। इतनी उम्र हो गई, दाँत ही नहीं बचे।"
अजीब बात थी — उसकी बात में डर नहीं था। थकान थी। मैंने एक कदम बढ़ाया। फिर दूसरा।
अंधेरे में एक कोना थोड़ा रोशन था — ऊपर कहीं से एक पतली सी दरार से रोशनी आ रही थी। वहाँ एक आदमी बैठा था। बहुत दुबला। हड्डी-हड्डी। सफ़ेद दाढ़ी घुटनों तक, उलझी हुई। हाथ में एक पुरानी कुदाल रखी थी, जैसे कोई बच्चा अपना खिलौना पकड़े रहता है।
"बैठ," उसने कुदाल के सहारे उठते हुए कहा। "पैर दुख रहे होंगे। नंगे पैर आया है।"
मैंने देखा — मेरे पैर कीचड़ और पत्थरों से छिले हुए थे। खून की पतली लकीरें थीं।
"तू कौन है?" मैंने पूछा।
"मैंने बताया ना।" उसने कुदाल को दीवार के सहारे टिकाया। "क़ब्र का रखवाला। कब्रिस्तान में रहता हूँ। तीस साल से। हड्डियाँ इकट्ठी करता हूँ, गड्ढे भरता हूँ, कभी किसी की क़ब्र पर उगी घास नोंचता हूँ। रात को वहीं सोता हूँ।"
"और यहाँ?"
"यहाँ?" उसने एक तरफ़ देखा। सुरंग आगे जाती थी, और वहाँ से हल्की रोशनी आ रही थी। "ये सुरंग मेरे बाप ने खोदी थी। बीस साल पहले। बंगले से कब्रिस्तान तक। कहते थे — जो मुर्दों को दफ़नाता है, उसका रास्ता ज़िंदों से दूर होना चाहिए।"
"तेरे बाप?" मैंने कहा। "वो कौन थे?"
वो हँसा। हँसी में खाँसी घुली थी। "तू सीधा सवाल करता है।" फिर वो रुका, और उसकी आँखें मेरे चेहरे पर टिक गईं। "तेरे पापा भी ऐसे ही थे। सीधे सवाल।"
मेरे पेट में ठंडी सुई सी चुभी। "तू मेरे पापा को जानता है?"
"जानता है?" उसने कुदाल उठाई और उसे अपनी उँगली से सहलाया। "बेटा, मैंने ही तो उन्हें दफ़नाया था।"
सुरंग में सन्नाटा उतर गया। मैंने अपनी साँस सुनी — कितनी तेज़ चल रही थी।
"मेरे पापा," मैंने धीरे से कहा, "शेर सिंह थे।"
वो रुका। उसकी आँखें सिकुड़ीं। फिर वो धीरे से बोला, "जिसे तू पापा कहता है, उसे मैं शेर सिंह के नाम से जानता था। पर जिसे मैंने दफ़नाया, उसकी मुट्ठी में ये था।"
उसने अपनी उँगली उठाई। उस पर एक छोटी सी पीतल की अंगूठी थी। बहुत पुरानी। घिसी हुई।
"ये मेरी नहीं है," वो बोला। "ये उस वक़्त मेरे हाथ में आई थी जब मैंने उनकी उँगली सीधी की थी। मुट्ठी खोली, तो ये अंदर थी। और मैंने इसे नहीं बेचा। तीस साल से पहने हुए हूँ।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे पता था — कोई एक दिन आएगा, इस अंगूठी को पहचानेगा, और मुझसे पूछेगा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू वही है। तेरी आँखें उनकी हैं।"
मेरे गले में कुछ अटक गया। मैंने जेब से जली रोटी निकाली। उसे देखा। फिर उस बूढ़े की तरफ़ बढ़ा दिया।
वो हँसा। "क्यों? मैं भूखा नहीं हूँ।"
"मेरी माँ ने बनाई थी। मैं इसे अकेले नहीं खा सकता।"
उसने रोटी ली। हाथ में उलट-पलट कर देखी। फिर उसकी आँखें भर आईं। उसने उसे चूमा — उस जली रोटी को, जैसे कोई बच्चा अपनी माँ की गोद चूमता है।
"तेरी माँ," वो बोला, और आवाज़ भर्रा गई, "सरस्वती। तीस साल पहले वो इस बंगले के फाटक पर खड़ी थी, और मैं गड्ढा खोद रहा था। उसने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। बस एक बात कही — 'उन्हें गहरा दफ़नाना, ताकि कोई न निकाल सके।' मैंने गहरा दफ़नाया। बहुत गहरा।"
"ठाकुर के आदमी क़ब्र खोदते हैं ना?" मैंने पूछा।
उसका चेहरा कड़ा हो गया। "तू कैसे जानता है?"
"अंदाज़ा लगाया। माँ को बंदी बनाकर ठाकुर यही चाहता है — मैं मैदान छोड़ दूँ।"
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