Spirit of a Fighter – Chapter 830
वो कुदाल पर झुक गया। फिर धीरे बोला, "दो रात पहले आए थे। चार आदमी। लालटेन लेकर। मैंने उन्हें दूर से देखा — मैं उस वक़्त क़ब्र के पास सो रहा था, जैसे रोज़ सोता हूँ। वो शेर सिंह की क़ब्र पर गए। खुदाई शुरू की। फिर अचानक रुक गए।"
"क्यों?"
"क्योंकि उन्हें नीचे से एक आवाज़ आई।" उसने कुदाल से ज़मीन खुरची। "मेरी आवाज़। मैंने कहा — 'जो क़ब्र खुदवाता है, वो अपनी क़ब्र खोदता है।' वो भाग गए। बाद में मुझे पता चला कि उसी रात तेरी माँ को उठा लिया गया था।"
मेरी जीभ सूख गई। "तो माँ कहाँ है?"
"बंगले की कोठरी में।" उसने सीधा मेरी तरफ़ देखा। "मैंने उसे वहाँ देखा है। दो दिन पहले। ठाकुर ने उसे कब्रिस्तान नहीं रखा। क्योंकि उसे डर है।"
"किस बात का?"
वो उठा। धीरे-धीरे। उसकी कमर कुबड़ी थी। फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा — उसके हाथ की हड्डियाँ मेरी हथेली में चुभीं।
"क्योंकि शेर सिंह की क़ब्र के नीचे एक डिब्बा है।" उसकी आवाज़ फुसफुसाहट बन गई। "ताबीज़ का। पीतल का। बीस साल पहले उन्हें दफ़नाते वक़्त मैंने देखा था — पंडित जी ने उनकी छाती पर रखा था, फिर ताबीज़ को जमीन में उनके सिरहाने गाड़ दिया। बोले — 'जो इसे खोदेगा, उसका सच खुद फूटेगा।' ठाकुर को लगता है वो ताबीज़ उसके खिलाफ़ सबूत है। इसीलिए वो कब्र खुदवा रहा है। और इसीलिए तेरी माँ को बंगले में रखा है — ताकि कोई उसे ढूँढ न सके।"
मैंने एक लंबी साँस ली। सुरंग में हवा घुट रही थी।
"तुझे क्या मिलेगा इसमें?" मैंने पूछा। "मुझे बता रहा है, तो कुछ चाहिए होगा।"
वो मुस्कुराया। दाँत कुछ गिरे हुए थे। "मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं तो बस एक रखवाला हूँ।" उसकी आँखें भर आईं। "पर बीस साल से मैं सो नहीं पाया। रात को मैं कब्रिस्तान में लेटता हूँ, और शेर सिंह की क़ब्र मेरे पैरों के पास होती है। मुझे लगता है — वो मुझसे कुछ कहना चाहते हैं। मैं कान लगाता हूँ, गंध भी आती है, पर बात समझ में नहीं आती।" वो रुका। "अब समझ आ गई। ये बात उनकी नहीं, तेरी थी। वो चाहते थे तू यहाँ आए।"
उसने कुदाल उठाई और सुरंग के दाहिनी दीवार पर एक जगह हल्की सी मारी। पत्थर हिला। अंदर एक छोटी अलमारी थी — लकड़ी की, जर्जर।
"ये मेरा रास्ता है," उसने कहा। "यहाँ से मैं बंगले के पिछले हिस्से में आता-जाता हूँ। ठाकुर के काग़ज़ वाले कमरे के ठीक नीचे।"
"काग़ज़ वाले कमरे के नीचे?"
"हाँ।" उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "जा। पर एक बात सुन। तेरी माँ को वो बंगले में रखे हैं, पर वो कमज़ोर नहीं है। उसने मुझे देखा था, जब मैं उसकी खिड़की के नीचे से गुज़रा था। उसने मेरी तरफ़ देखकर सिर हिलाया। मुझे पहचान लिया। तीस साल बाद भी।" उसकी आवाज़ भर आई। "वो औरत पत्थर है। पत्थर भी उससे कमज़ोर है।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा। उसका हाथ काँप रहा था।
"तू क्या कहलाता है?" मैंने पूछा।
"बिसरा।" उसने कहा। "पूरा नाम बिसरा दास। पर लोग भूल गए। कोई नाम नहीं बुलाता।" वो हँसा। "यही तो मज़ा है। नाम ही ऐसा है।"
"बिसरा दास," मैंने उसका हाथ दबाकर कहा, "मैं तुझे नहीं भूलूँगा।"
उसने कोई जवाब नहीं दिया। पर उसके हाथ से कुदाल मेरी तरफ़ आई — जैसे कोई अपनी सबसे कीमती चीज़ दे रहा हो।
"रास्ते में काम आएगी," वो बोला। "हर जगह के अपने रास्ते होते हैं। तू जानता है ना?"
"क्या?"
"तेरी नाक।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "शेर सिंह भी ऐसे ही नाक से अपने दुश्मन पकड़ते थे। वो तो दूर से ही सूंघ लेते थे।"
मेरे कदम रुक गए।
"तुझे कैसे पता?"
वो हँसा। "बेटा, बीस साल से मैं क़ब्रिस्तान में रहता हूँ। वहाँ हर क़ब्र एक कहानी है। और उस कहानी को सबसे पहले मिट्टी बोलती है। तेरी नाक जो करती है, वही मेरे इस कुदाल ने किया — मिट्टी के नीचे का सच ऊपर लाया।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। फिर सुरंग में आगे बढ़ने लगा। पर मेरे कदम भारी नहीं थे। मेरे कदम हल्के थे।
सुरंग ज़्यादा चौड़ी नहीं थी, पर चलने लायक थी। मैं कुदाल से दीवारें टटोलता हुआ चला। ज़मीन कहीं सूखी थी, कहीं कीचड़। मुझे एक गंध आ रही थी — पुराने काग़ज़ की, जैसे बरसात में भीगी किताब। और उसके नीचे एक और गंध — लकड़ी की, ताज़ी लकड़ी की, जैसे कोई अभी-अभी कुछ बना रहा हो।
मैं रुका। दीवार में एक जगह रोशनी की पतली दरार थी। मैंने उसमें आँख लगाई।
कमरा था — बड़ा, ऊँची छत, फर्श पर कालीन। दीवारों पर लकड़ी की खूँटियाँ थीं, जिन पर काग़ज़ टँगे थे — नक़्शे, तारीख़ें, कुछ लिखा हुआ। एक मेज़ थी, उस पर ढेर सारी फ़ाइलें। और एक तरफ़, दीवार पर, तस्वीरें टँगी थीं।
मैंने साँस रोकी।
एक तस्वीर थी — बड़ी, पुरानी, फ्रेम में जड़ी। उसमें तीन आदमी खड़े थे। मिट्टी में। अखाड़े की मिट्टी में। तीनों की धोती लाल थी, तीनों के चेहरे पर पसीना।
बायें तरफ़ वो थे — जिन्हें मैंने एक बार अखाड़े की दीवार पर लगी पुरानी तस्वीर में देखा था। रणवीर सिंह। नौजवान, बड़ी मूँछें, सीना ताने।
बीच में — शेर सिंह। मेरे पापा। मैं उन्हें पहचान नहीं रहा था, पर मेरा दिल कह रहा था कि यही हैं। चौड़े कंधे, घुँघराले बाल, आँखें हँसती हुईं।
और दायें तरफ़ — एक तीसरा आदमी। उसका चेहरा किसी ने काट दिया था। ब्लेड से। जानबूझकर।
मेरा गला सूख गया।
मैंने दरार से हटकर कुदाल से दीवार पर मारा। पत्थर हिला। फिर एक और मार। दीवार का एक हिस्सा टूटा, और मैं कमरे में उतर आया।
कमरे में हवा भारी थी। जैसे यहाँ सालों से कोई नहीं आया। धूल परत जमी थी। मैं सीधा उस तस्वीर के पास गया।
उसे हाथ में उठाया। छूआ। फ्रेम के काँच पर धूल थी। मैंने अपनी उँगली से पोंछा।
मेरे पापा मेरे सामने थे।
मैं उन्हें देखता रहा। देखता रहा। मेरी आँखें भर आईं, पर आँसू नहीं गिरे — जैसे मेरे अंदर कुछ रोक रहा हो। मैंने उन्हें अपनी छाती से लगाया, और आवाज़ निकली — फटी हुई, टूटी हुई।
"पापा," मैंने कहा। "तुम मुझे कभी नहीं दिखे। एक बार भी नहीं। माँ कहती थी तुम चले गए। पर अब देख रहा हूँ — तुम यहाँ हो। तुम मेरे सामने हो।"
मेरे हाथ काँप रहे थे। तस्वीर का फ्रेम मेरे हाथ में हिल रहा था।
"मैं तुम्हें पहचान नहीं पाता," मैंने फुसफुसाया। "माँ ने कभी तुम्हारी तस्वीर नहीं दिखाई। कहती थी — तस्वीर देखकर बेटा कमज़ोर पड़ जाएगा। पर मैं कमज़ोर नहीं पड़ा। मैं आ गया।" मेरी आवाज़ काँप गई। "मैं तेरे पास आ गया।"
मेरे हाथ से तस्वीर फिसलने लगी। मैंने उसे सीने से लगा लिया। मेरी साँस रुकी हुई थी।
"तुम मुझे कभी नहीं दिखे," मैंने कहा, "पर आज तुम्हारी तस्वीर देखकर लग रहा है जैसे तुम मेरे सामने खड़े हो।"
कमरे में सन्नाटा था। पर मुझे लगा — कोई मेरे सिर पर हाथ रख रहा है। पापा। मैंने आँखें बंद कर लीं।
तभी कमरे के दरवाज़े की तरफ़ से आवाज़ आई। धीमी। भारी। जैसे किसी ने पैर घसीटा हो।
"तस्वीर में तीसरा आदमी मैं हूँ।"
मैं पलटा। मेरे हाथ से तस्वीर गिर गई — फ्रेम फर्श पर गिरा, काँच चटक गया।
दरवाज़े पर ठाकुर खड़ा था। बड़ा शरीर, टेढ़ी कमर, सफ़ेद मूँछें, आँखों में वो ठंडी चमक जो बंगले में देखी थी। हाथ में लाठी। और उसके पीछे दो आदमी — एक ने मेरी माँ का बाज़ू पकड़ा था, दूसरे ने दूसरा।
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