Spirit of a Fighter – Chapter 828
कालू काका अखाड़े के पिछले हिस्से में मिट्टी में लेटे थे। जब मैंने उन्हें जगाया, तो वो उठकर बैठ गए और अपनी आँखें मलीं।
"क्या समय है?" उन्होंने पूछा।
"चार बजने वाले हैं।"
"अच्छा।" उन्होंने अपनी कमर सीधी की। "आज का दिन बीस साल से इंतज़ार कर रहा है।"
वो उठे। उनकी हड्डियाँ चटकीं। वो मेरे सामने खड़े हुए। उनका कुबड़ापन आज कुछ कम लग रहा था।
"वीर," उन्होंने कहा। "आज जो होगा, उसके बाद मैं इस अखाड़े की मिट्टी में पहली बार बिना डर के लेटूँगा।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनकी हथेली खुरदरी थी, जैसे मिट्टी में सैकड़ों साल बिताए हों।
"काका, आज आप मेरे साथ चलिए।"
"चलूँगा," वो बोले। "पर बाहर। तेरे पीछे। जैसे बीस साल पहले तेरे पापा के पीछे खड़ा था।"
मीरा आई। उसने कुर्ता-सलवार पहना था, कंधे पर बैग। बाल गीले थे। उसके चेहरे पर वो सुबह वाली ताज़गी थी।
"योजना सुनो," उसने कहा। उसने ज़मीन पर एक डंडी से नक्शा बनाया। "ठाकुर का बंगला। सामने दरवाज़ा। दो पहरेदार। पीछे बाड़ी। बाड़ी के आख़िर में पुराना कुआँ, जो अब बंद है। पापा ने बताया था कि उस कुएँ से एक सुरंग जाती है गोदाम तक। गोदाम बंगले से जुड़ा है।"
"तो मैं कुएँ से जाऊँगा," मैंने कहा।
"और मैं सामने के दरवाज़े से," मीरा ने कहा।
"तू अकेली?"
"मैं अकेली नहीं जाऊँगी। मैं अपनी माँ को लेकर जाऊँगी।" उसने कहा। "अगर ठाकुर ने माँ को बंधक बनाया है, तो वो किसी औरत से बात करेगा। मेरी माँ के साथ जाने से उसे शक नहीं होगा।"
"तेरी माँ?"
"वो आज सुबह यहाँ आई थीं।" मीरा ने दीवार की तरफ़ इशारा किया। "वो बाहर इंतज़ार कर रही हैं।"
मैंने दरवाज़ा खोला। बाहर एक औरत खड़ी थी — उम्र में माँ जितनी, पर साफ़-सुथरी साड़ी, हाथ में बैग। उनके चेहरे पर वो ज़िद थी जो मीरा के चेहरे पर थी।
"नमस्ते," उन्होंने कहा। "मैं सरोज। मीरा की माँ।"
मैंने हाथ जोड़े। "आप… आप अंदर क्यों जाएँगी?"
"क्योंकि मेरे पति व्हीलचेयर पर हैं," उन्होंने कहा। "और मैं नहीं चाहती कि वो फिर किसी की वजह से चुप रहें।"
मैं उनकी तरफ़ देखता रहा। उनकी आँखों में पानी था, पर आवाज़ साफ़ थी।
तभी टिंकू ने कहा, "और मैं क्या करूँगा?"
"तू बाहर रहेगा," मैंने कहा। "कालू काका के साथ। अगर अंदर से कोई आवाज़ आए, तो तुम दोनों पीछे के दरवाज़े से घुस जाना। और अगर—" मैंने एक पल रुककर कहा, "अगर मैं एक घंटे में बाहर न आऊँ, तो तू अपनी मिठाई का डिब्बा लेकर सीधे पंचायत जाना। जो देखा, सब बताना।"
टिंकू ने गला साफ़ किया। "भाई, तू ऐसे मत बोल।"
"मैं ऐसे ही बोल रहा हूँ।"
उसने सिर हिलाया। फिर उसने अपनी टोपी उतारी और मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ये पहन ले।"
"क्यों?"
"क्योंकि जब तू जीतेगा, तो लोग कहेंगे — वो देखो, टोपी वाला। और मैं कहूँगा — वो मेरी टोपी है।"
मैंने टोपी पहनी। वो मेरे सिर पर ठीक बैठी।
मीरा मेरे पास आई। उसने मेरी कलाई पर बँधा फीता देखा, फिर मेरी तरफ़ देखा। "तैयार है?"
"तैयार हूँ।"
उसने अपना हाथ बढ़ाया और मेरे हाथ पर रखा। उसकी हथेली गरम थी। उसकी उँगलियों से तुलसी और अदरक की गंध आ रही थी।
"सुन," उसने कहा। "अगर अंदर कुछ गड़बड़ हो, तो मैं तुम्हारा नहीं, हमारा नाम बोलूँगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें साफ़ थीं। मैं मुस्कुराया। "और अगर मैं बोलूँ?"
"तो मैं दौड़कर आऊँगी।"
मैं हँसा। "तू तो कह रही थी बिना पीछे देखे भागूँगी।"
"वो तेरे कहने पर।" उसने मेरा हाथ दबाया। "अपनी मर्ज़ी से मैं पलटकर आऊँगी।"
हम दोनों हँसे। सुबह की पहली किरण आँगन में आई और मीरा के चेहरे पर पड़ी। उस पल मैंने सोचा — अगर आज मैं मर भी गया, तो ये चेहरा आख़िरी चीज़ होगी जो मैं देखूँगा। और ये बुरा सौदा नहीं है।
मैंने उसका हाथ छोड़ा। "चलो।"
हम निकले। सड़क सूनी थी। बारिश रुक गई थी, पर कीचड़ था। मैंने जान-बूझकर नंगे पैर चलना शुरू किया। मेरी चप्पल मैंने हाथ में ले ली।
"क्यों?" मीरा ने पूछा।
"कीचड़ में गंध ज़्यादा टिकती है। और मुझे आज हर कदम की गंध चाहिए।"
रास्ते में मीरा ने धीरे से कहा, "पापा ने बताया था कि ठाकुर के बंगले के पीछे वाला कुआँ बीस साल से बंद है। पर उसकी सीढ़ियाँ अब भी ठीक हैं। बस ऊपर से पत्थर रखा है।"
"तो मैं पत्थर हटाऊँगा।"
"और अंदर जाते ही, दाईं तरफ़ मुड़ना। बाईं तरफ़ दीवार है। दाईं तरफ़ सुरंग।"
"तुझे कैसे पता?"
"पापा ने बताया।" वो कुछ देर चुप रही। "उन्होंने कहा कि वो खुद उस सुरंग में गए थे। जब वो जवान थे।"
मैं रुक गया। "पापा ने कब बताया?"
"आज सुबह।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "जब मैं उनसे मिलने गई। वो रोए। पहली बार। मैंने उन्हें इतना रोते नहीं देखा था।"
मेरा गला भर आया।
"उन्होंने कहा," मीरा ने आगे कहा, "कि उन्हें माफ़ कर दूँ। मैंने कहा — पापा, आपने क्या किया? उन्होंने कहा — मैंने बीस साल चुप रहकर तुम्हें बचाया, पर उन बच्चों को नहीं बचा सका जो मेरी मिट्टी में उतरे।"
हम चलते रहे। सड़क के किनारे एक कुत्ता सो रहा था। वो हमें देखकर उठा, फिर फिर लेट गया।
"वीर," मीरा ने कहा। "पापा ने एक बात और कही।"
"क्या?"
"उन्होंने कहा कि ठाकुर के बंगले में एक कमरा है — पीछे की तरफ़, जिसकी खिड़की पर लोहे की जाली है। उस कमरे में बीस साल पहले कोई रहता था। एक औरत।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"वो औरत ठाकुर की नहीं थी," मीरा ने कहा। "वो उसकी कैद थी। और पापा ने कहा कि उस औरत का नाम वो भूल गए हैं, पर उसकी आवाज़ याद है। वो रात-रात गाती थी।"
"अब वो औरत कहाँ है?"
"पता नहीं।" मीरा ने कंधे उठाए। "पर पापा ने कहा कि वो कमरा अब भी बंद है। कोई उसमें नहीं जाता।"
मैं सोचने लगा। ठाकुर के बंगले में एक औरत बंद थी। बीस साल पहले। और अब भैरव की माँ — वो बूढ़ी औरत जो कब्रिस्तान में मिली थी — उसने कहा था कि वो भैरव की जन्म देने वाली माँ है।
क्या ये वही औरत है?
मेरे पैर रुक गए।
"क्या हुआ?" मीरा ने पूछा।
"मीरा, भैरव की माँ।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "वो बूढ़ी औरत। जिसने कहा कि शेर सिंह ने भैरव को बेटा कहकर अपनाया।"
"हाँ।"
"वो कहाँ रहती है?"
मीरा ने सोचा। "पता नहीं। वो कब्रिस्तान में मिली थी। फिर गायब हो गई।"
"वो गायब नहीं हुई।" मैंने कहा। "वो ठाकुर के पास है। क्योंकि वो ठाकुर के बंगले में बंद औरत हो सकती है। और अगर वो वहाँ है, तो वो हमें बता सकती है कि ठाकुर ने माँ को कहाँ रखा है।"
मीरा कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने धीरे से कहा, "तो योजना बदलती है।"
"नहीं।" मैंने कहा। "योजना वही रहेगी। तू सामने से जाएगी। पर मैं कुएँ से अंदर जाकर पहले उस कमरे तक जाऊँगा।"
"और अगर वहाँ कोई और हो?"
"तो मैं उसे सूंघ लूँगा।" मैंने कहा। "हर आदमी की अपनी गंध होती है। ठाकुर के आदमियों की गंध मैं जानता हूँ।"
हम फिर चले। अब सड़क ख़त्म हो रही थी। दूर ठाकुर का बंगला दिख रहा था — बड़ा, सफ़ेद, ऊँची दीवारों वाला। दीवार पर काँटे लगे थे।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। "वीर।"
"हाँ।"
"अगर तू अंदर जाकर किसी औरत से मिले, तो उससे पूछना — उसका नाम क्या है।"
"क्यों?"
"क्योंकि पापा ने कहा था कि वो औरत जब गाती थी, तो अपने बेटे का नाम गाती थी। और अगर वो नाम मैंने सुना है — कहीं, किसी काग़ज़ में — तो मुझे पता चल जाएगा कि वो कौन है।"
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