Spirit of a Fighter – Chapter 827
"तो मैं आगे बढ़ूँगी।" उसने कहा। "बिना पीछे देखे।"
उसकी आवाज़ में कुछ था जो मेरे सीने में गरम सुई की तरह चुभा। मैंने नज़र हटा ली। मैंने कटोरी उठाई और उसे धोने के लिए उठ खड़ा हुआ।
"वीर।"
मैं रुका।
"तू मुझे कुछ बताना चाहता है।"
मैं पलटा। "क्या?"
"तेरे चेहरे पर लिखा है।" वो उठी। "जब से मैं आई हूँ, तू मेरी तरफ़ देख नहीं रहा। बस चिट्ठी, फीता, शीशी। कुछ है जो तू छिपा रहा है।"
मेरा गला सूखा। मैंने हाथ में कटोरी कसकर पकड़ी। "कुछ नहीं।"
"झूठ।"
"मीरा—"
"माँ ने तेरे कान में क्या कहा था?" उसने पूछा। "जब वो मिलीं, जब सबके सामने उन्होंने कहा कि ये बात सिर्फ़ रघुवीर जानते थे — तब उन्होंने तेरे कान में क्या कहा?"
मैंने कटोरी रख दी। मेरे हाथ अब काँप रहे थे। यही बात थी। यही वो बात थी जो मैं किसी को नहीं बता पा रहा था। जो रात-रात मेरे सीने पर पत्थर की तरह रखी थी।
"मीरा, ये बात—"
"मैं तेरी साथी हूँ," उसने कहा। "साथी से कुछ नहीं छिपाते।"
"ये बात किसी को नहीं बतानी।" मेरी आवाज़ निकली, पर फटी हुई। "माँ ने कहा था — अगर ये बात बाहर आई, तो पूरा गाँव बदल जाएगा।"
"तो गाँव बदल जाए।" मीरा मेरे सामने आई। "क्या गाँव इससे ज़्यादा बदल सकता है जितना बीस साल में बदला? कितने बेटे मरे, वीर? कितनी माँ रोईं? तेरा पापा मरा, मेरे पापा की हालत देख, कालू काका का बेटा जलकर मरा, रामलाल का बेटा—"
"बस कर।" मैंने कहा।
वो चुप हो गई।
मैं आँगन की दीवार से टेक लगाकर बैठ गया। मेरे घुटने कमज़ोर थे। मैंने अपना सिर हाथों में रख लिया।
"माँ ने कहा," मैंने धीरे से कहा," कि शेर सिंह मेरे पापा नहीं थे।"
मीरा हिली नहीं।
"शेर सिंह मेरे पापा नहीं थे," मैंने दोहराया, और इस बार आवाज़ फूट गई। "रघुवीर मेरे पापा थे। रघुवीर — माधव का बेटा। माधव सिंह का।"
मीरा ने कोई आवाज़ नहीं की।
"माँ ने कहा कि रघुवीर और वो… बीस साल पहले, एक बार। जब शेर सिंह शहर गए थे। और वो वापस आए, तो माँ ने कुछ नहीं कहा। क्योंकि वो जानती थीं कि शेर सिंह उसे मार डालेंगे। और फिर मैं पैदा हुआ।"
मैंने सिर उठाया। मीरा का चेहरा सफ़ेद था। चाँदनी में उसका चेहरा पत्थर जैसा लग रहा था।
"मैं माधव सिंह का पोता हूँ," मैंने कहा। "उसी माधव का जिसने बीस साल तक पहलवानों को ज़हर पिलाया। जिसने मेरे पापा को मरवाया। जो अब जेल में है।"
मैंने अपनी मुट्ठी देखी। "यही माँ ने मेरे कान में कहा। यही वो बात है जो रघुवीर जानते थे। और यही बात अगर बाहर आई, तो गाँव कहेगा — देखो, ज़हर का बेटा ज़हर का पोता।"
मीरा ने मेरे सामने घुटने टेके। उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसके हाथ ठंडे थे, पर उसकी पकड़ मज़बूत थी।
"वीर।"
मैंने उसकी तरफ़ नहीं देखा।
"वीर, मेरी तरफ़ देख।"
मैंने देखा।
"माधव सिंह तेरा खून है," उसने कहा। "पर तेरा खून तेरा कर्म नहीं है। तूने अपना ज़हर खुद बोया है? तूने किसी को बोतल पिलाई? तूने किसी को मारा?"
"नहीं।"
"तो फिर ये बात क्यों तुझे अंदर से खा रही है?"
"क्योंकि मैंने सोचा—" मेरा गला रुंधा। "क्योंकि मैंने सोचा कि मैं… मैं अगर उसका खून हूँ, तो मेरे अंदर भी वो ज़हर होगा। जो उसने किया, वो मैं भी कर सकता हूँ।"
"बेवकूफ़।" मीरा ने कहा। सीधा, तेज़, बिना नरमी। "तूने ग्यारह पहलवानों को बचाया। तूने माँ को बचाया। तूने टिंकू को बचाया। तूने जग्गा को बचाया। तूने मेरी जान बचाई। अगर तेरे अंदर ज़हर होता, तो तू कब का उसे पी गया होता।"
उसने मेरा हाथ छोड़ा और मेरे सीने पर उँगली रखी। "ये खून नहीं है। ये मिट्टी है। और मिट्टी वही होती है जो उसमें पसीना डालता है।"
मेरी आँखें भर आईं। मैंने सिर नीचे किया। मीरा ने मेरा सिर उठाया, अपने हाथों में लिया और माथे पर माथा रखा।
"तू अकेले नहीं हो," वो बोली। "बहुत दिनों से नहीं।"
हम दोनों वैसे ही बैठे रहे। बारिश शुरू हो गई — पहले बूँदें छत पर, फिर आँगन की मिट्टी पर। गीली मिट्टी की गंध उठी। मेरी आँखें बंद हो गईं।
फिर मैंने धीरे से कहा, "मीरा, कल अगर मैं हार गया—"
"तू नहीं हारेगा।"
"अगर हार गया—"
"तो भी तू जीता हुआ लड़ेगा।" उसने मेरा हाथ दबाया। "और अगर कोई तुझे छूने की कोशिश करे, तो वो मुझे पहले छूएगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके बालों में बारिश की बूँदें टँगी थीं। उसके होंठ काँप रहे थे, पर आँखें शांत थीं।
मैं पहली बार उसकी आँखों में डूबा। बिना झिझक। बिना छिपाने के।
"मीरा," मैंने कहा।
"हाँ।"
"अगर कल कुछ गड़बड़ हो, अगर तू अंदर फँस जाए, तो मेरा नाम नहीं लेना।"
"तो क्या लेना?"
"हमारा नाम।" मैंने कहा। "जब तू चिल्लाए, तो लोग ये न समझें कि कोई मज़दूर फँसा है। लोग समझें कि हम दोनों हैं।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसके होंठ हिले, और वो मुस्कुराई। धीरे से, जैसे कोई फूल खिलता है। "हमारा नाम," उसने दोहराया। "ये कैसा नाम है?"
मैं हँसा। और पहली बार, पूरे दिल से हँसा। "पता नहीं। पर ये अच्छा लगता है।"
वो हँसी। उसकी हँसी बारिश में घुल गई।
फिर हम चुप हो गए। सिर्फ़ बारिश। और दूर कहीं, नीम के पेड़ पर, एक उल्लू बोला।
मैंने उससे कहा, "तू जा। सो जा। कल सुबह जल्दी उठना है।"
"तू सोएगा?"
"मैं यहीं बैठूँगा।"
"फिर मैं भी यहीं बैठूँगी।"
"मीरा—"
"बहस मत कर।" उसने दीवार से टेक लगाई। "मैं सो नहीं सकती। और तू अकेला बैठेगा, तो तेरे दिमाग़ में वही बातें घूमेंगी। चुपचाप बैठ।"
मैंने कुछ नहीं कहा। हम दोनों बैठे रहे। आँगन में बारिश हो रही थी। माँ की जली रोटी मेरी जेब में थी, गुड़िया की छोटी रोटी उसके साथ, और फीता मेरी कलाई पर।
सुबह तीन बजे माँ की बनाई दाल की गंध आई। मैंने आँखें खोलीं। मैं दीवार से टेक लगाए सो गया था। मीरा मेरे कंधे पर सिर रखकर सो रही थी। उसकी साँसें धीमी थीं।
गंध कहाँ से आ रही थी? मैं उठा। चूल्हा ठंडा था। पर दाल की गंध हवा में तैर रही थी — हल्दी, जीरा, और थोड़ी-सी मेथी।
मैंने गंध पकड़ी। वो गंध मेरे ही कपड़ों से आ रही थी। माँ ने जब आख़िरी बार मुझे गले लगाया था — तहखाने में, पीतल का ढक्कन पकड़े — तब उनका हाथ मेरे कंधे पर था। उनकी उँगलियों की गंध मेरी बनियान में बस गई थी।
मैंने बनियान को नाक से लगाया। मेरी आँखें फिर भर आईं। अजीब बात थी — मैंने कभी नहीं सोचा था कि माँ की गंध से मुझे इतनी तसल्ली मिलेगी।
मीरा की आँखें खुलीं। उसने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर अपना सिर उठाया और अपने बाल ठीक किए।
"क्या हुआ?" उसने पूछा।
"माँ की गंध।"
"कहाँ?"
"मुझमें।" मैंने बनियान की तरफ़ देखा। "ये काफ़ी है।"
वो कुछ देर मुझे देखती रही। फिर उठी और अपना बैग उठाया। "मैं कपड़े बदल लूँ, तब तक तू टिंकू और कालू काका को जगा।"
मैं उठा। मेरे जोड़ों में दर्द था, पर पहले जैसा नहीं। शरीर हल्का लग रहा था।
टिंकू अपनी दुकान में सो रहा था। मैंने उसे जगाया। वो एकदम उठ बैठा। "क्या? क्या हुआ? किसने मारा? कहाँ?"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "आज का दिन है।"
"आज?" उसने आँखें मली। "आज! मुकाबला!" वो उछल पड़ा। "मैं तैयार हूँ। मेरी मिठाई तैयार है।"
"मिर्च वाली?"
"हाँ, दो डिब्बे।" वो हँसा। "एक मिर्च वाली, एक मीठी। कौन किसको खिलाऊँ, तू बताएगा।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno