Spirit of a Fighter – Chapter 824
"ये मैंने तुम्हारे लिए बनाई," उसने कहा। "मैंने सोचा, माँ की रोटी तो तुम रखोगे। पर तुम्हें खाने के लिए भी कुछ चाहिए।"
मैं हँसा। पहली बार कई दिनों में मेरी हँसी सच्ची थी।
"तू बड़ी हो जाएगी," मैंने कहा, "तो अखाड़े की सबसे अच्छी रसोइया बनेगी।"
"नहीं," उसने सिर हिलाया। "मैं पहलवान बनूँगी।"
"क्या?"
"हाँ। तू जब जीतेगा, तो मैं भी अखाड़े में उतरूँगी। और मैं भी वही मिट्टी में हाथ डालूँगी।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। मेरी आँखों में पानी था, पर मैं मुस्कुरा रहा था।
फिर रात हुई। हम सब तैयार हुए। मीरा ने अपना सफ़ेद कुर्ता पहना, बाल पीछे बाँधे। टिंकू ने अपनी मिठाई का डिब्बा तैयार किया — उसमें लड्डू थे, पर उनमें हरी मिर्च का पाउडर मिला हुआ था। उसने डिब्बे को लाल कपड़े में लपेटा।
"भाई," उसने मुझे अलग बुलाया। "एक बात कहनी है।"
"कह।"
"अगर आज रात कुछ हो जाए, तो… तो तू जानता है, मेरी माँ को मत बताना कि मैं तेरे साथ गया था। उसे लगता है मैं दुकान पर सोता हूँ।"
मैंने उसका कंधा थामा। "कुछ नहीं होगा। और तेरी माँ को तो हम खुद बताएँगे — कि उसका बेटा अखाड़े का सबसे बहादुर आदमी है।"
टिंकू की आँखें भर आईं। उसने मुँह फेर लिया और अपना डिब्बा उठाया।
"चल, मिर्च ठंडी न हो जाए।"
कालू काका ने हमें बंगले तक का रास्ता बताया — नहर के किनारे से, फिर पुराने पीपल के पेड़ के पास से, फिर गन्ने के खेतों के बीच से। रणवीर सिंह ने मुझे रोका, जब मैं निकल रहा था।
"वीर।"
मैं रुका।
"शेर सिंह मेरा दोस्त था।" उनकी आवाज़ धीमी थी। "और उसने मुझे कभी माफ़ नहीं किया कि मैं उसकी मौत नहीं रोक सका। अगर आज तू उस काग़ज़ को ले आए, तो… तो मैं उससे कहूँगा कि तेरा बेटा तुझसे बड़ा पहलवान है।"
"वो सुन नहीं सकते, पापा।"
"पता है।" उन्होंने सिर हिलाया। "पर फिर भी। मैं कहूँगा।"
मैंने सिर हिलाया और निकल पड़ा।
रास्ते में मीरा मेरे पास आई। हम साथ चल रहे थे, गन्ने के खेतों के बीच, और तारों की रोशनी में उसका चेहरा चाँदी जैसा लग रहा था।
"डर लग रहा है?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"मुझे भी।"
हम कुछ देर चुप चले। गन्ने के पत्ते हवा में सरसराते थे।
"वीर।"
"हूँ।"
"अगर आज रात के बाद मैं… अगर कुछ हो जाए…"
"कुछ नहीं होगा।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तू बहुत ज़्यादा बोलने लगी है। ये अच्छी बात नहीं।"
वो हँसी। धीरे से। "तुम भी।"
हम बंगले के पीछे पहुँचे। गोदाम का दरवाज़ा खुला था। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा — बस एक पल के लिए — फिर छोड़ दिया।
"मैं सामने से जाती हूँ।" उसने अपना बैग ठीक किया। "दस मिनट। उसके बाद तुम आ जाओ।"
"मीरा।"
"हाँ?"
"अगर वो कुछ भी कहे, तो तू चुप मत रहना। अगर वो धमकाए, तो चिल्ला देना। मैं सुन लूँगा।"
"मैं चिल्लाऊँगी नहीं।" उसने ठुड्डी ऊपर की। "मैं उससे बात करूँगी। और वो मेरी बात सुनेगा।"
वो गई। मैंने उसे जाते देखा — सफ़ेद कुर्ते में, सीधी चाल, कंधों में अकड़। मेरी छाती में कुछ हिला। मैंने उसे जेब में रखी आधी जली रोटी से बात करनी चाही, पर फिर चुप रह गया।
टिंकू पहुँचा — डिब्बा लिए, टोपी टेढ़ी। "भाई, मैं सामने वाले पहरेदारों के पास जाता हूँ। तू पीछे से आ।"
"ध्यान से।"
"मैं तो हमेशा ध्यान से होता हूँ।" वो हँसा। "पर आज मैं अपनी मिठाई से भी ज़्यादा ध्यान से हूँ।"
वो गया। मैंने गोदाम की दीवार से सटकर इंतज़ार किया। मेरी साँस धीमी थी, पर दिल ज़ोर से धड़क रहा था। मैंने अपनी जेब टटोली — रोटी वहीं थी। गुड़िया की मिट्टी वहीं थी। और ठाकुर का काग़ज़ भी।
दस मिनट बाद मैंने दीवार फाँदी। पीछे की खिड़की के नीचे ताखा था — छोटा, लकड़ी का, धूल से ढका। मैंने उसे खींचा। अंदर एक कपड़े में लिपटा काग़ज़ था। मैंने खोला।
बीस साल पुराना काग़ज़। ठाकुर की लिखाई। और नीचे एक और हस्ताक्षर — "रघुवीर।"
मैंने काग़ज़ पढ़ा। मेरे हाथ काँपने लगे।
ये काग़ज़ ज़हर बनाने की पर्ची नहीं थी। ये काग़ज़ था — एक सौदे का। ठाकुर ने रघुवीर से कहा था कि शेर सिंह को अखाड़े से हटाना है, और बदले में रघुवीर को अखाड़े का मालिक बना दिया जाएगा। रघुवीर ने हस्ताक्षर किए थे — पर नीचे एक लाइन जोड़ी थी: "मैं ज़हर नहीं दूँगा। मैं सिर्फ़ इलाज दूँगा। और अगर शेर सिंह मरा, तो उसका हिसाब ठाकुर के सिर।"
मैंने काग़ज़ सीने से लगाया। रघुवीर ने धोखा दिया था, पर ज़हर नहीं दिया था। ठाकुर ने उसका हाथ पकड़कर उसे फँसाया था। और यही काग़ज़ उसका सबूत होगा।
तभी पीछे से आवाज़ आई। "वीर सिंह।"
मैं पलटा। ठाकुर खिड़की के पास खड़ा था।
"तुम्हें पता था?" मैंने कहा।
"मुझे सब पता है।" उसकी आवाज़ ठंडी थी। "मुझे पता था कि तू आएगा। इसीलिए मैंने तेरी माँ को नहीं, तेरे दोस्त को भेजा।"
मेरा दिल धक्क से रह गया। "टिंकू?"
"वो मिठाई लेकर आया।" ठाकुर मुस्कुराया। "मैंने उसे अंदर बुलाया।"
मैं खिड़की से कूदकर अंदर गया। कमरे में टिंकू बैठा था — होश में, पर उसके हाथ बँधे थे। उसके सामने मिठाई का डिब्बा खुला था, और उसमें से एक लड्डू गायब था।
"भाई, माफ़ करना," टिंकू ने कहा। "मैं एक लड्डू खा गया। बहुत भूख लगी थी।"
"और मिर्च?"
"मिर्च तो ठीक थी।" टिंकू हँसा। "पर ठाकुर जी ने मेरी मिठाई में मीठा मिला दिया है।"
मैंने ठाकुर की तरफ़ देखा। वो खड़ा था, हाथ जेब में।
"तू मेरी मिठाई खा गया?" मैंने कहा।
"नहीं।" ठाकुर ने सिर हिलाया। "मैंने तेरे दोस्त को कहा कि वो अपनी मिठाई खुद खाए। और उसने खाई। क्योंकि मैंने कहा कि अगर नहीं खाएगा, तो उसकी माँ को गोली मार दूँगा।"
टिंकू का चेहरा उतर गया। "भाई, मेरी माँ…"
"तू चुप रह," मैंने कहा। "तूने कुछ गलत नहीं किया।"
मैंने ठाकुर की तरफ़ काग़ज़ बढ़ाया। "ये काग़ज़ देख।"
उसने देखा। उसका चेहरा नहीं बदला।
"ये काग़ज़ बीस साल पुराना है," उसने कहा।
"हाँ। और इसमें तेरी लिखाई है। तूने रघुवीर से कहा था कि शेर सिंह को हटाओ।"
"तो?"
"तो ये सबूत है।"
ठाकुर हँसा। "बीस साल पुराना काग़ज़? जिस पर मेरा हस्ताक्षर नहीं, बस लिखाई है? अदालत में ये कुछ नहीं है।"
"पर पंचायत में है।" पीछे से आवाज़ आई। मीरा दरवाज़े पर खड़ी थी। उसके हाथ में कॉपी थी, और उसके पीछे — पूरा गाँव। सुक्खी बुआ, कालू काका, भैरव की माँ, और सबसे आगे — रणवीर सिंह, व्हीलचेयर पर, पर उनकी आँखों में आग।
"तूने कहा था कि तू मुझे जानता है?" मैंने ठाकुर से कहा। "अब मैं तुझे जानता हूँ।"
मैंने काग़ज़ मीरा को दिया। उसने उसे ऊँचा उठाया।
"ये काग़ज़ बताता है कि ठाकुर ने शेर सिंह को मरवाने का सौदा किया था। और ये काग़ज़ बताता है कि उसने आज रात कब्र खुदवाने के लिए चार आदमी रखे हैं — जो मैंने खुद पकड़े हैं।"
वो पीछे हटा। गाँव आगे बढ़ा।
तभी मेरी नज़र टिंकू पर पड़ी। वो ज़मीन पर बैठा था, और उसके होंठ नीले पड़ रहे थे। उसके हाथ काँप रहे थे।
"टिंकू!" मैं उसके पास दौड़ा।
"भाई, मेरा पेट…" वो कराहा। "लड्डू में कुछ और था।"
मैंने उसका चेहरा थामा। उसकी साँस उखड़ रही थी। ठाकुर ने मिठाई में ज़हर मिला दिया था — मिर्च नहीं, असली ज़हर।
मैंने पलटकर ठाकुर को देखा। वो मुस्कुरा रहा था।
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