Spirit of a Fighter – Chapter 823
कालू काका आगे आए। उनकी सफ़ेद दाढ़ी धूल से भरी थी। "बेटा, ये ठाकुर की चाल है। वो चाहता है कि तू कब्र की तरफ़ भागे, और मैदान खाली छूट जाए।"
"मैं जानता हूँ।" मैंने जेब से वो काग़ज़ निकाला, जिस पर ठाकुर की लिखाई थी। "इसीलिए हम उसी की चाल में उसे फँसाएँगे।"
मैंने सबको गोल में बुलाया। माँ की बूढ़ी माँ, यानी भैरव की जन्म देने वाली माँ, बैलगाड़ी से उतर आईं और हमारे बीच बैठ गईं। कालू काका अपनी लाठी पर झुके खड़े थे। रणवीर सिंह की कुर्सी सबसे आगे थी। मीरा मेरे बगल में बैठी, घुटनों पर कॉपी रखे। टिंकू दूर खड़ा था, पर उसके कान सब सुन रहे थे।
"सुनो," मैंने कहा। "मैदान में मुकाबला सुबह होगा। पर ठाकुर चाहता है कि मैं वहाँ न पहुँचूँ। इसलिए वो आज रात कब्र पर हमला कर रहा है — डराने के लिए।"
"तो हम कब्र पर पहरा दें?" टिंकू ने कहा।
"नहीं।" मैंने सिर हिलाया। "अगर हम कब्र पर गए, तो ठीक वही होगा जो वो चाहता है। हमें उसके बंगले पर जाना है। आज रात।"
सन्नाटा छा गया। रणवीर सिंह ने पहले मेरी तरफ़ देखा, फिर मीरा की तरफ़।
"तू पागल हो गया है," उन्होंने कहा। पर उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। कुछ और था। शायद वो चिंगारी जो बीस साल से बुझी पड़ी थी।
"नहीं, पापा।" मीरा उठ खड़ी हुई। "वो सही कह रहा है। ठाकुर अपने बंगले पर आज रात अकेला होगा — क्योंकि उसके सारे आदमी कब्र पर होंगे। अगर हमें उसके कमरे से कुछ चाहिए, तो आज से अच्छा मौक़ा नहीं मिलेगा।"
"क्या चाहिए?" कालू काका ने पूछा।
"वो काग़ज़," मैंने कहा। "जो बीस साल पहले ठाकुर ने लिखा था — 'सब कुछ मिट्टी में मिल जाएगा।' ये काग़ज़ उसने किसी को दिया होगा — किसी आदमी को, जिसने पापा को ज़हर दिया। अगर हमें वो दूसरा काग़ज़ मिल जाए, तो ठाकुर के पास बचने का कोई रास्ता नहीं बचेगा।"
मीरा ने कॉपी खोली। "मैंने पंचायत के पुराने रिकॉर्ड देखे हैं। बीस साल पहले ठाकुर ने अखाड़े के पैसों का हिसाब रखने के लिए एक आदमी रखा था — हरनाम। पर हरनाम से पहले एक और था। उसका नाम रिकॉर्ड में नहीं है, बस एक लाइन है — 'हिसाब-किताब ठाकुर के भरोसे'।"
"मतलब उस आदमी का नाम कहीं नहीं है," रणवीर सिंह ने कहा।
"नाम नहीं है, पर उसका काम है।" मीरा ने पन्ना पलटा। "ये देखिए — उस साल अखाड़े के खाते में एक बड़ी रकम दर्ज है, जो 'दवा और इलाज' के नाम पर निकली थी। पर उस साल अखाड़े में कोई बीमार नहीं था। सिर्फ़ एक आदमी मरा था — शेर सिंह।"
मेरी छाती में कुछ जम गया। "मतलब वो पैसा ज़हर बनाने में लगा था।"
"हाँ।" मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "और वो पैसा ठाकुर के बंगले से निकला था। मतलब काग़ज़ बंगले में है।"
रणवीर सिंह ने अपनी मुट्ठी कुर्सी पर मारी। "तो फिर देर किस बात की? मैं चलता हूँ।"
"नहीं।" मैंने कहा। "आप नहीं जाएँगे।"
उनका चेहरा तमतमा गया। "तू मुझे रोक रहा है?"
"हाँ।" मैंने उनकी आँखों में देखा। "क्योंकि अगर आप बंगले पर गए और पकड़े गए, तो ठाकुर कहेगा कि रणवीर सिंह चोरी करने आया था। और फिर मीरा पर भी इल्ज़ाम आएगा। आप मैदान में रहिए। आप वहाँ रहेंगे तो ठाकुर को लगेगा कि सब कुछ ठीक है।"
रणवीर सिंह कुछ बोलने ही वाले थे कि मीरा ने उनका हाथ थाम लिया।
"पापा, वो सही कह रहा है। आप वहीं रहिए। मैं जाऊँगी।"
"तू?" रणवीर सिंह की आवाज़ फट गई।
"हाँ, मैं।" मीरा ने अपना बैग उठाया। "ठाकुर मुझे 'रणवीर की बेटी' मानता है। अगर मैं अंदर जाऊँगी, तो वो मुझे रोकेगा नहीं। वो सोचेगा कि मैं उससे माफ़ी माँगने आई हूँ, या पापा के लिए कुछ माँगने आई हूँ।"
"और मैं?" मैंने कहा। "मैं कहाँ रहूँगा?"
मीरा मुस्कुराई। वो मुस्कान जो पहले कभी नहीं देखी थी — थोड़ी शरारती, थोड़ी गंभीर। "तुम मेरे पीछे आओगे। बंगले के पीछे एक पुराना गोदाम है, वहीं से तुम अंदर आना। ठाकुर के कमरे की खिड़की उसी तरफ़ खुलती है।"
"तुम्हें कैसे पता?" कालू काका ने पूछा।
मीरा ने कॉपी का आख़िरी पन्ना दिखाया। "क्योंकि बीस साल पहले जब ठाकुर ने बंगला बनवाया था, तो उसका नक्शा पंचायत में जमा हुआ था। और नक्शे में लिखा है — पीछे की खिड़की के नीचे एक गुप्त ताखा है।"
हम सब चुप हो गए। फिर टिंकू बोला, "और मैं? मैं क्या करूँ?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा उतरा हुआ था। जैसे कोई बच्चा मेले में गया हो और झूला उसके हाथ से छूट गया हो।
"तू मिठाई बनाएगा," मैंने कहा।
"मिठाई?" उसका मुँह खुला रह गया। "भाई, ये वक़्त मिठाई बनाने का है?"
"हाँ।" मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा। "पर आज तेरी मिठाई में शक्कर नहीं, मिर्च डालनी है। तू ठाकुर के आदमियों के लिए मिठाई का डिब्बा लेकर जाएगा — कहेगा कि मुकाबले से पहले ठाकुर के लिए तोहफ़ा है। जब वो खाएँगे, तो उनका मुँह जल जाएगा और हमें वक़्त मिल जाएगा।"
टिंकू की आँखें फैल गईं। फिर वो ज़ोर से हँसा। "अरे वाह! मेरी मिठाई आज काम आएगी! पर भाई, एक बात — मिर्च कितनी डालूँ?"
"इतनी कि वो पानी के लिए तड़पें, पर बेहोश न हों।"
"समझ गया।" उसने टोपी पहनी। "मैं अभी चूल्हा जलाता हूँ।"
पूरा आँगन हँसी से गूँज उठा। कालू काका की आँखों में पानी आ गया, पर वो हँस रहे थे। भैरव की माँ भी मुस्कुराईं। रणवीर सिंह के चेहरे पर पहली बार कुछ नरमी आई।
"तू अजीब लड़का है, वीर सिंह," उन्होंने कहा। "मुकाबले से पहले लड़ाई की तैयारी में मिठाई।"
"पापा, मिठाई से बड़ी कोई ताकत नहीं।" मैंने कहा। "टिंकू की मिठाई ने आज तक जिसे खाया, वो भूखा नहीं रहा। आज वो हमारा हथियार है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से कहा, "तुम बदल गए हो, वीर।"
"कैसे?"
"पहले तुम अकेले लड़ते थे। अब तुम सबको साथ लेकर चल रहे हो।"
मैं कुछ कहने ही वाला था कि गुड़िया दौड़ती हुई आई। उसके हाथ में एक छोटी पोटली थी — अखाड़े की लाल मिट्टी से भरी।
"भैया," उसने कहा, साँस फूल रही थी। "ये मैंने तुम्हारे लिए रखी थी। कल से। जब तुम नहर पार गए थे, तब मैंने सोचा कि तुम लौटोगे तो थका होगा। इसलिए ये…"
मैंने पोटली ली और उसे सीने से लगा लिया। गुड़िया दुबली थी, उसकी हड्डियाँ मेरी छाती से टकराईं। उसके बालों में स्कूल की कॉपी की गंध थी, और हाथों में मिट्टी की।
"तू मेरी सबसे अच्छी बहन है," मैंने कहा।
"मैं तो एक ही हूँ," वो हँसी।
मैंने पोटली खोली। लाल मिट्टी। असली। अखाड़े की। मैंने उसे सूँघा — उसमें पसीने की गंध थी, टूटी ईंटों की, और उस पुरानी परत की जो कालू काका ने बिछाई थी। पर उसमें कुछ और भी था। कुछ जो मैंने पहले नहीं सूँघा था।
मैं उसी वक़्त आँगन के कोने में गया, जहाँ चूल्हा था। वो बुझा हुआ था। राख ठंडी थी। और उस राख के बीच, आधी जली रोटी पड़ी थी — वही रोटी जो माँ ने जानबूझकर छोड़ी थी।
मैंने उसे उठाया। वो सूखी थी, काली पड़ चुकी थी। पर उस पर माँ के हाथ के निशान थे — उँगलियों के तीन हल्के दबाव।
मेरा गला भर आया। मैंने उसे जेब में रखा।
"ये माँ की रोटी है," मैंने धीरे से कहा, किसी से नहीं, खुद से। "मैं इसे तब तक रखूँगा जब तक माँ वापस न आए।"
गुड़िया मेरे पास आई। उसने अपनी जेब से कुछ निकाला — एक छोटी सी रोटी, जो उसने खुद बनाई थी, गोल और मोटी, थोड़ी जली हुई।
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