Spirit of a Fighter – Chapter 825
"अगर तूने टिंकू को कुछ हुआ," मैंने कहा, "तो मैं तुझे ज़िंदा नहीं छोड़ूँगा।"
"तू अभी भी सोचता है कि तू मुझे हरा सकता है?" ठाकुर ने कहा। "तेरा दोस्त मर रहा है, तू मेरे बंगले में घुस आया, और तेरे हाथ में एक बीस साल पुराना काग़ज़ है। तेरे पास कुछ नहीं है।"
"तो फिर ये क्या है?" मैंने अपनी जेब से आधी जली रोटी निकाली। "ये माँ की रोटी है। माँ ने इसे चूल्हे पर छोड़ा था। ताकि मैं समझ जाऊँ कि वो ज़िंदा है।"
फिर मैंने गुड़िया की मिट्टी निकाली। "ये अखाड़े की मिट्टी है। जो कहती है कि जो इसमें पसीना डालेगा, वो जीतेगा।"
फिर मैंने काग़ज़ निकाला। "और ये तेरा लिखा हुआ काग़ज़ है। जो कहता है कि तूने खून का सौदा किया था।"
मैंने तीनों चीज़ें ऊपर उठाईं। "ये तीन चीज़ें हैं। रोटी, मिट्टी, और सच। और तेरे पास कुछ नहीं है।"
ठाकुर का चेहरा पहली बार बदला।
मीरा ने टिंकू की नब्ज़ पकड़ी। "उसे ज़हर दिया गया है। इसे तुरंत अस्पताल ले जाना होगा।"
"मैं ले जाऊँगा।" कालू काका आगे आए। "मेरी बैलगाड़ी बाहर है।"
मैंने टिंकू को उठाया। वो भारी नहीं था — हड्डियों का ढाँचा, जैसे हमेशा से था। उसने मेरा हाथ पकड़ा।
"भाई," वो फुसफुसाया। "मेरी मिठाई… मेरी मिठाई में मिर्च नहीं थी।"
"पता है।"
"तो… तो मैं तेरी मदद नहीं कर पाया।"
"तूने मेरी जान बचाई।" मैंने कहा। "अगर तू अंदर न आता, तो ठाकुर मुझे खिड़की पर ही गोली मार देता।"
वो मुस्कुराया। उसके होंठ नीले थे, पर मुस्कान वही थी।
"अगर मैं ठीक हो गया," उसने कहा, "तो कल तेरी जीत पर मिठाई बनाऊँगा। असली वाली।"
"बनाएगा।" मैंने उसे बैलगाड़ी पर लिटाया। "और मैं तेरी मिठाई खाऊँगा। पूरा डिब्बा।"
गाँव ने ठाकुर को घेर लिया। पुलिस आ चुकी थी — मीरा ने पहले ही बुला ली थी। ठाकुर जब जाते वक़्त गाड़ी में बैठा, तो उसने एक बार पीछे मुड़कर देखा।
"वीर सिंह," उसने कहा। "तू मुझे हरा नहीं पाया। तू बस बच गया।"
"नहीं।" मैंने कहा। "मैं जीता हूँ। क्योंकि मेरे पास जो है, वो तेरे पास नहीं।"
उसने कुछ नहीं कहा। गाड़ी चली गई।
मैं बैलगाड़ी के पास गया, जहाँ टिंकू लेटा था। रणवीर सिंह और मीरा पास खड़े थे।
"अब?" मीरा ने पूछा।
"अब मैं घर जाऊँगा।" मैंने कहा। "माँ की रोटी रखी है। और गुड़िया का इंतज़ार कर रहा है।"
मैं घर पहुँचा, तो आँगन में चूल्हा जल रहा था। गुड़िया बैठी थी, आटा गूँध रही थी। उसके हाथ छोटे थे, पर मेहनत से चल रहे थे।
"भैया!" वो उठी। "टिंकू भैया कैसे हैं?"
"ठीक हो जाएँगे।" मैंने कहा। "डॉक्टर ने कहा कि ज़हर ज़्यादा नहीं गया था।"
वो रो पड़ी। मैंने उसे गले लगाया।
फिर मैं आँगन के कोने में गया। मैंने जेब से आधी जली रोटी निकाली और उसे चूल्हे की आग में रख दिया। वो जलने लगी।
"भैया, वो क्यों जला रहे हो?"
"क्योंकि अब माँ आ जाएगी। और माँ की रोटी जली नहीं रहनी चाहिए।"
रात के ग्यारह बजे थे। गुड़िया सो गई थी। मैं आँगन में बैठा था, हाथ में काग़ज़ और मिट्टी की पोटली। मेरी आँखें भारी थीं, पर नींद नहीं आ रही थी।
तभी दरवाज़े पर पत्थर पड़ा। एक। फिर दूसरा।
मैं उठा। दरवाज़ा खोला। बाहर कोई नहीं था। ज़मीन पर एक लिफ़ाफ़ा पड़ा था।
मैंने उसे उठाया और खोला। अंदर सरस्वती की चोटी का फीता था — लाल रंग का, जो उन्होंने हमेशा बाँधा था। फीता मेरे हाथ में आते ही मेरी साँस रुक गई।
साथ में एक चिट्ठी थी। मैंने पढ़ा।
"कल सुबह मुकाबले से पहले अपना नाम वापस ले। वरना अगली चीज़ तेरी माँ की चोटी होगी।"
और नीचे लिखा था — "तू मुझे जानता है, वीर।"
मैंने चिट्ठी को मुट्ठी में कस लिया। मेरे हाथ काँप रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकली। मैंने फीता को जेब में रखा — उसी जेब में जहाँ रोटी थी।
फिर मैंने गुड़िया की तरफ़ देखा, जो सो रही थी। उसकी साँसें ठीक चल रही थीं।
मैंने आसमान की तरफ़ देखा। तारे थे, पर बादल आ रहे थे। सुबह तक बारिश होगी।
मैंने फीते को सीने से लगाया। माँ का फीता। माँ का ही कोई आदमी ये लाया था। माँ के ही किसी ने ये भेजा था।
मैंने चिट्ठी को जेब में रखा और उसी वक़्त समझ गया — कल मैदान में जो लड़ेगा, वो सिर्फ़ जग्गा नहीं होगा। वो कोई और होगा।
कोई ऐसा जो माँ के बारे में सब जानता है।
मैंने गुड़िया की चारपाई के पास जाकर उसकी थैली उठाई — वही जिसमें अखाड़े की मिट्टी थी। पोटली अंदर से खाली थी। मिट्टी गायब थी।
और उसकी जगह एक छोटी पीली शीशी रखी थी। वही शीशी जो माँ ने चूल्हे में जलाई थी।
मैंने शीशी हाथ में ली। उस पर एक काग़ज़ चिपका था, जिस पर माँ की लिखाई थी — "बेटा, ये असली है। और जो तुझे मिली, वो नक़ली। मैंने जो जलाई थी, वो नक़ली थी। असली मैंने बचाकर रखी थी।
मैं शीशी लेकर बैठ गया। हाथ में पीली शीशी, और सीने में एक आग। माँ ने जो जलाई, वो नक़ली थी। मतलब माँ जानती थी कि कोई उनकी शीशी के पीछे है। माँ ने मुझे बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डाली, और मुझे एक शब्द भी नहीं बताया।
मैंने काग़ज़ को पूरा खोला। नीचे एक लाइन और थी, छोटी सी, काँपती लिखाई में — "और बेटा, अगर मैं न आऊँ, तो मत रुकना। तेरे पास तेरी मिट्टी है। मिट्टी कभी झूठ नहीं बोलती।"
मेरी आँखें भर आईं। मैंने शीशी को कमरे की ताक पर रख दिया, ठीक उसी जगह जहाँ माँ की तस्वीर थी। तस्वीर में माँ हँस रही थीं, चोटी बाँधे हुए।
"माँ," मैंने धीरे से कहा। "तू मुझे बता देती। मैं तेरे साथ खड़ा होता।"
जवाब में सिर्फ़ झींगुर बोले।
सुबह होते-होते पूरा घर जाग गया। रणवीर सिंह आए, मीरा आई, और टिंकू को बैलगाड़ी में लिटाकर ले आए — उसकी आँखें खुली थीं, होंठों पर रंग लौट रहा था।
"भाई," टिंकू ने कहा, "मैं ठीक हूँ। बस एक बात पूछनी है।"
"पूछ।"
"वो चिट्ठी… मैंने सुनी। तू क्या करेगा?"
मैंने सबको बैठाया। और फिर मैंने वो फीता मेज़ पर रखा। मीरा का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"ये सरस्वती का फीता है," वो फुसफुसाई। "ये कैसे…"
"कोई जानता है माँ को। कोई ऐसा, जो माँ के करीब था।" मैंने कहा। "और वो चाहता है कि मैं डर जाऊँ।"
रणवीर सिंह ने फीता उठाया, गौर से देखा, और फिर वापस रख दिया।
"वीर," वो बोले, "मैं तुझे एक बात बताता हूँ। तेरी माँ ने एक बार मुझसे कहा था — 'रणवीर, जिस दिन मेरा बेटा अखाड़े में उतरे, उस दिन मेरी चोटी का फीता उसके हाथ में होना चाहिए।'" उन्होंने मेरी आँखों में देखा। "मैंने पूछा था क्यों। वो बोली थीं — 'क्योंकि फीता बँधा होता है। और बँधी चीज़ छूटती नहीं।'"
मेरा गला भर आया। मैंने फीता उठाया और अपनी कलाई पर बाँध लिया।
"तो अब योजना सुनो," मीरा ने कहा। "मैं पहले जाऊँगी। ठाकुर मुझे रणवीर की बेटी मानकर अंदर आने देगा।"
"नहीं।" मैंने कहा। "तू अकेली नहीं जाएगी।"
"मैं अकेली नहीं जाऊँगी," वो हँसी। "मैं तेरी माँ को लेकर आऊँगी।"
टिंकू ने हाथ उठाया, जैसे स्कूल में बच्चा करता है। "मैं क्या करूँ?"
"तू मिठाई बना," मैंने कहा। "क्योंकि आज तेरी मिठाई में नींद नहीं, मिर्च डालनी है।"
पूरा आँगन हँसा। कई दिनों बाद। गुड़िया की हँसी सबसे ऊँची थी, और टिंकू की शिकायत सबसे लंबी — "मिर्च! मेरी मिठाई में! भाई, तूने मेरा धंधा ख़त्म कर दिया।"
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