Spirit of a Fighter – Chapter 816
टिंकू ने टोकरी पकड़ी और उनके बीच से निकल गया, चुपचाप। फिर वो हमारी तरफ़ मुड़ा और उसने अपना अँगूठा ऊपर किया, और उसकी आँखों में वो चमक थी जो मैंने सिर्फ़ उस रात देखी थी जब उसने पहली बार खीर बनाई थी।
अब चार में से दो गए। पीछे वाले दो बाकी थे। मैंने मीरा को इशारा किया और हम गोदाम की पीछे वाली खिड़की की तरफ़ बढ़े।
पर तभी एक आवाज़ आई। अंदर से। लंगड़े की आवाज़, मोटी और खुरदरी।
"रसोइया।"
मैं ठिठक गया।
"अंदर आ जा, रसोइए। मुझे भूख लगी है। तेरी मिठाई खानी है।"
मैंने पलटकर देखा। टिंकू खिड़की के सामने खड़ा था, टोकरी हाथ में, और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।
"मैं तो…" टिंकू ने धीरे से कहा। "…अंदर आने वाला नहीं था।"
"पर मैं तेरा इंतज़ार कर रहा था," लंगड़े की आवाज़ आई। "बाहर आ जा। वरना मैं तेरे उन दो सोए दोस्तों की गर्दन काट दूँगा।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ सख़्त थी।
"वो बाहर आ सकता है," उसने धीरे से कहा। "और तब हम सब सामने होंगे।"
मैंने टिंकू को देखा। वो टोकरी उठाए खिड़की के सामने खड़ा था, और उसके होंठ हिल रहे थे, जैसे वो कुछ बोलना चाहता है पर नहीं बोल पा रहा।
और फिर उसने एक काम किया जो मुझे आज तक याद है। उसने टोकरी अपने सीने से लगाई, एक लंबी साँस ली, और फिर खिड़की के पास गया।
"अरे भैया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास फिर लौट आई थी, वो मिठास जिसे वो खुद नहीं जानता कि वो कहाँ से लाता है, "मैं तो तुम्हारे लिए ही लाया था।"
वो खिड़की के पास पहुँचा। मैंने देखा, अंदर से एक हाथ आया। बड़ा, मोटा, काली बाँह। उसने टोकरी पकड़ी और अंदर खींच ली।
टिंकू रुका। उसका हाथ टोकरी के साथ अंदर चला गया, और फिर अंदर से एक झटका आया, और वो खिड़की के साथ चिपक गया।
"आ जा अंदर," लंगड़े की आवाज़ आई। "मैं तो तेरे आने का इंतज़ार कर रहा था, रसोइए।"
मैंने देखा, टिंकू का गला पकड़ा जा रहा था। काली बाँह उसे अंदर खींच रही थी।
और तभी मेरे हाथ ने कुछ किया जो मेरे दिमाग़ ने सोचा भी नहीं था। मैंने झुककर ज़मीन से एक ईंट उठाई। वो ईंट जो गोदाम की टूटी दीवार से गिरी थी। भारी, लाल, किनारे से टूटी।
मैंने खिड़की की तरफ़ छलाँग लगाई और मेरी आवाज़ मेरे गले से निकली, ऊँची और कड़क।
"उसे छोड़ दे, वरना अगली मिठाई तेरे मुँह में जाएगी।"
वो हाथ रुक गया। टिंकू का गला छूटा और वो खिड़की से नीचे गिरा, घुटनों के बल, खाँसता हुआ।
खिड़की से एक चेहरा बाहर आया। आधा चेहरा। एक आँख, एक गाल, एक होंठ जो हँस रहा था।
"तो आ गया तू," लंगड़े ने कहा। उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो कुएँ के पानी में होती है। "मैं तो तुझे गोदाम के कमरे में घुसने का इंतज़ार कर रहा था। पर चलेगा। बाहर भी अच्छा है।"
उसका चेहरा वापस अंधेरे में गया। और फिर दरवाज़े की तरफ़ से आवाज़ आई — पायल की, ज़ंजीर की, और लकड़ी के पैर की।
दरवाज़ा खुला।
वो बाहर आया। लंगड़ा। बड़ा, चौड़ा, एक पैर सीधा और एक बाँका। उसके हाथ में वो टोकरी थी, और उसके पीछे अंधेरे में मेरी माँ की आवाज़ फिर आई, इस बार काँपती हुई।
"बेटा, भाग जा। ये बहन-भाई हैं। ये तुझे बचने नहीं देंगे।"
मैंने ईंट कसकर पकड़ी। मेरे पीछे मीरा ने अपनी जगह ली, और कालू काका ने अपना लोहे का डंडा उठाया।
लंगड़े ने टोकरी खोली, एक लड्डू उठाया, और उसे देखने लगा। फिर उसने उसे मुँह में डाल दिया और चबाते हुए बोला, "वाह, रसोइए। तेरी मिठाई में ज़हर भी है और स्वाद भी।"
और तभी अंदर से मेरी माँ की आवाज़ फिर आई, पर इस बार वो अलग थी। इस बार उसमें वो चीख नहीं थी, वो गुस्सा था जो सिर्फ़ मेरी माँ के पास है।
"लंगड़े, तू भूल गया कि तेरे भाई ने तुझे क्यों भेजा था। तू उसे मारने नहीं आया था। तू उसे लाने आया था।"
लंगड़ा रुक गया। उसके जबड़े कस गए। उसने पलटकर अंधेरे की तरफ़ देखा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा आया जो हँसी नहीं थी।
"चुप कर, बुढ़िया।"
"तू चुप कर," माँ की आवाज़ आई। "अगर तूने मेरे बेटे को छुआ, तो तेरा भाई तुझे कभी माफ़ नहीं करेगा। तू जानता है वो क्या करता है माफ़ न करने वालों का।"
लंगड़े ने एक कदम पीछे रखा। और उसी पल, मैंने ईंट नहीं फेंकी। मैंने ईंट ज़मीन पर रख दी।
"तू ठाकुर का भाई है?" मैंने पूछा।
लंगड़े ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँख में वो हिसाब चल रहा था जो लड़ाई से पहले चलता है।
"मैं उसका हाथ हूँ," उसने कहा। "जो वो नहीं कर सकता, मैं करता हूँ।"
"तो तू मुझे मारने नहीं आया," मैंने कहा। "तू मुझे सौदा करने आया है।"
लंगड़े का चेहरा बदला। कुछ देर वो चुप रहा, फिर उसके होंठ मुड़े और वो बोला, "होशियार है। ठीक है, तो सुन ले। भाई कहता है — मुकाबले से नाम वापस ले। और ये बुढ़िया और ये लड़की, दोनों चली जाएँगी अपने घर। साफ़-सुथरा सौदा है।"
मीरा मेरे पास आई। उसने मेरे कान में कहा, "वो झूठ बोल रहा है। ठाकुर कभी कोई ज़िंदा चीज़ वापस नहीं भेजता।"
मैंने उसे हाथ से रोका। लंगड़े को देखा।
"मुकाबला परसों है," मैंने कहा। "और तेरा भाई जानता है कि मैं जीतूँगा। इसलिए वो मुझसे डरकर ये सौदा कर रहा है।"
लंगड़े की आँखें सिकुड़ीं।
"अपनी माँ को ध्यान से देख," उसने कहा। "वो सुंदर नहीं रही।"
मेरा दिल धक् से बैठ गया, पर मैंने अपनी आवाज़ नहीं डगमगाई। "मेरी माँ की सुंदरता उसकी आँखों में है," मैंने कहा। "और तेरे भाई की आँखें इस वक़्त कहीं और हैं।"
लंगड़ा हँसा। पर ये हँसी पहली जैसी नहीं थी। इसमें झिझक थी।
"बहादुर लड़का है।" उसने टोकरी उठाई और उसे उलट दिया। लड्डू मिट्टी में बिखर गए। "ये तेरी है।" उसने टोकरी मेरी तरफ़ उछाली। "अब सुन। भाई ने कहा था — अगर लड़का न माने, तो उसके सामने ही बुढ़िया को उठा ले जाना। और उसके सामने ही लड़की को घसीट ले जाना।"
उसने दरवाज़े की तरफ़ इशारा किया। अंदर से दो आदमी और निकले। दोनों के हाथ में लोहे की छड़ें।
मैंने मीरा को अपने पीछे किया और कालू काका को अपने बगल में। टिंकू उठकर खड़ा हुआ, उसका गला लाल था, पर उसने अपनी टोपी उठाई और फिर से पहनी।
"भाई," उसने धीरे से कहा, "टोकरी में दो लड्डू बचे हैं। नीचे वाले।"
"उनमें ज़हर है?"
"नहीं। वो असली हैं।"
मुझे हँसी आई। एक लड़ाई से पहले, और मेरी हँसी छूट गई।
"तो फेंक दे," मैंने कहा। "और देख, कौन पहले भागता है।"
टिंकू ने टोकरी से दो लड्डू निकाले और उन्हें उन दो आदमियों की तरफ़ फेंका। लड्डू उनके सामने मिट्टी में गिरे। दोनों एक पल के लिए रुके, और उनकी नज़र लड्डू पर गई।
बस वही पल मुझे चाहिए था।
मैं आगे बढ़ा। मेरे पैर नंगे थे और मिट्टी ठंडी थी। मैंने पहले आदमी की छड़ पकड़ी, उसे मोड़ा, और उसका कोहनी घुमाकर उसे अपने ही साथी की तरफ़ धकेल दिया। दोनों लड़खड़ाए।
लंगड़ा पीछे हटा। उसने अपनी छड़ उठाई, पर उसका बाँका पैर रेत में धँस गया और वो डगमगाया।
"तू लंगड़ा है," मैंने कहा, और उसे देखा। "पर तेरे भाई ने तुझे ये काम दिया। क्यों?"
लंगड़े के चेहरे पर पसीना था। उसने छड़ फेंकी और पलटकर भागा।
"बुढ़िया को लेकर आ," वो चिल्लाया।
पर दरवाज़े पर कालू काका खड़े थे, डंडा लिए। उनकी आवाज़ में वो पुरानी गरज थी जो बरसों से नहीं सुनी गई थी।
"अंदर आना है तो मुझे पार करना पड़ेगा, लंगड़े। और मैंने तेरे भाई को भी नहीं छोड़ा था।"
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