Spirit of a Fighter – Chapter 815
मैंने लालटेन की लौ नीची की। गोदाम की दीवार सामने थी — ऊँची, टूटी-फूटी, और उसके पीछे से रोशनी की एक पतली लकीर आ रही थी। किसी ने दरवाज़ा थोड़ा सा खुला छोड़ दिया था।
मैंने मीरा और टिंकू को इशारा किया। हम दीवार के साथ-साथ सरके। दरवाज़े के पास पहुँचे, और मैंने अंदर झाँका।
अंदर, एक लालटेन जल रही थी। और उसके नीचे, ज़मीन पर, एक बड़ी सी लोहे की अलमारी पड़ी थी — खुली। और उसके अंदर से काग़ज़ों की गंध आ रही थी। काग़ज़, मिट्टी, और… और वो मीठी गंध।
और तभी मैंने वो आवाज़ सुनी।
मेरी माँ की आवाज़।
"बेटा, यहाँ मत आ।"
॥
"बेटा, यहाँ मत आ।"
वो आवाज़ मेरे कान में घुसी और सीधे मेरे पेट में उतर गई। मैंने दरवाज़े की चौखट पकड़ ली। मेरी उँगलियाँ लोहे पर जम गईं।
टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी हथेली में पसीना था, और हल्दी की गंध।
"भाई, ये माँ की आवाज़ है।"
"है," मैंने कहा। "पर माँ हो, ये पक्का नहीं।"
मैंने आँखें बंद कीं। अंदर से खीर की गंध आ रही थी। पान की। और उसके नीचे, बहुत नीचे, मिट्टी के तेल की। तीन गंधें, तीन आदमी। कोई चौथा भी था, पर उसकी गंध मुझे पहचानी नहीं लगी — फीकी, जैसे बरसों पुरानी अलमारी में बंद कपड़े।
"अंदर अंधेरा है," मीरा ने धीरे से कहा। "और आवाज़ हमें अंदर बुला रही है।"
"यही तो खेल है," मैंने कहा। "अंदर जाओ, तो दरवाज़ा बंद।"
और तभी पीछे से पैरों की आहट आई। तेज़, फूलती हुई, जैसे कोई बूढ़ा आदमी अपनी पूरी ताकत लगाकर दौड़ रहा हो।
हम पलटे। कालू काका थे। उनकी सफ़ेद दाढ़ी में धूल थी, और उनके हाथ में वो लोहे का डंडा था जिससे वो रोज़ अखाड़े का फाटक खोलते थे। वो सीधे मेरे पास आए और मेरे कंधे पर हाथ रख दिया। उनकी साँस ऐसी चल रही थी जैसे कोई फटी हुई मशक हो।
"चार आदमी," वो बोले, और शब्द उनके मुँह से टूटकर गिरे। "गोदाम के पीछे। दो दरवाज़े पर, दो पीछे खिड़की के नीचे।"
"और लंगड़ा?"
कालू काका ने मेरी आँखों में देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर वो रो नहीं रहे थे।
"लंगड़ा अंदर है। वो बार-बार बोल रहा है — 'माँ को नहीं। बेटी को लेकर आओ। बेटी को।'"
मेरा खून ठंडा हो गया, फिर एक झटके में उबल पड़ा। बेटी। मीरा। वो माँ को चारा बनाकर मीरा को माँग रहे थे। और मैं जानता था क्यों। ठाकुर ने मुकाबला रद्द नहीं करवाया था। उसने मुझसे नाम वापस लेने का सौदा रचा था — और सौदे की कीमत मीरा थी।
"उन्हें पता है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ मेरी अपनी नहीं लगी। "उन्हें पता है कि मैं आऊँगा, और मैं अकेला नहीं आऊँगा।"
"तो क्या करें?" टिंकू ने पूछा। उसकी आवाज़ में वो डर था जो बचपन से उसके साथ है — वो डर जो अंधेरे कमरे में दीया जलाकर भी नहीं जाता।
मीरा ने अपना बैग खोला। उसने अंदर से एक छोटी-सी थैली निकाली। कपड़े की, हरी। उसे खोलते ही मीठी गंध फैल गई — खीर की, पर उसमें कुछ और मिला था। कुछ भारी।
"ये क्या है?" मैंने पूछा।
"रामलाल के लिए बनाया था," उसने कहा। "उसकी नींद नहीं आती थी। सोने की गोलियाँ — आयुर्वेद वाली। तीन-चार घंटे की नींद, बिना नुकसान।"
टिंकू ने थैली सूंघी, और उसका चेहरा बदल गया।
"तो मतलब…" उसने धीरे से कहा। "…मुझे ये मिठाई में डालनी है?"
"तुझे कुछ नहीं डालना," मीरा ने कहा। "तू बस मिठाई बाँटेगा। बाकी गोलियाँ मैं खुद डालूँगी।"
टिंकू ने एक लंबी साँस ली। उसने अपनी टोपी उतारी, उसे झाड़ा, और फिर से पहनी। उसके हाथ काँप रहे थे, पर उसकी आवाज़ में वो पुरानी मिठास लौट आई थी।
"भाई," वो बोला, "मैं तो मिठाई बेचने वाला हूँ। जासूस नहीं।"
"तू मेरा दोस्त है," मैंने कहा। "बाकी सब बाद में।"
वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराया। और फिर उसने अपनी कमर से वो टोकरी उतारी जो वो हमेशा साथ रखता था — छोटी, टीन की, ढक्कन वाली, जिस पर उसकी माँ ने अपने हाथ से "टिंकू मिष्ठान भंडार" लिखा था।
"आज एक बार तो मेरी मिठाई काम आए," उसने कहा। और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा था जो डर से बड़ा था।
मीरा ने गोलियाँ निकालीं। छोटी, गोल, भूरी। उसने उन्हें चार लड्डुओं में घोंप दिया, एक-एक को। फिर उन चारों को टोकरी में सबसे ऊपर रख दिया, और बाकी लड्डुओं से उन्हें ढक दिया।
"चार पहरेदार," उसने कहा। "चार लड्डू।"
"अगर किसी ने दो खा लिए?" टिंकू ने पूछा।
"तो दो पहरेदार सोएँगे और दो जागेंगे," मीरा ने कहा। "इसलिए टिंकू, तू एक-एक को अलग-अलग खिलाना। और ध्यान रखना — जो ऊपर वाले हैं, वही खिलाना।"
टिंकू ने टोकरी उठाई। फिर वो मेरे पास आया और मेरे कान में बोला, "भाई, अगर मैं निकल गया, तो मेरी माँ से कह देना कि मैंने कसरत कल से ही शुरू कर दी थी।"
मेरा गला भर आया। मैंने उसका कंधा पकड़ा।
"तू निकलेगा," मैंने कहा। "और कल तेरी दुकान पर सबसे पहले मैं आऊँगा।"
टिंकू हँसा। फिर वो पलटा और गोदाम के सामने वाली गली में चला गया, टोकरी उठाए, टोपी ठीक करता हुआ। उसकी चाल में वो लचक थी जो वो दुकान पर ग्राहकों को दिखाता है।
हम दीवार के पीछे रुके। मैंने लालटेन बुझा दी। अब सिर्फ़ चाँदनी थी, और मेरे कान।
टिंकू की आवाज़ आई, ऊँची और मीठी।
"अरे भैया! जाग रहे हो? अच्छा ही हुआ।"
मैंने दीवार के कोने से झाँका। दो आदमी दरवाज़े पर खड़े थे। एक मोटा, एक लंबा। दोनों के हाथ में लाठी थी।
"कौन है?" मोटे ने कहा।
"मैं टिंकू, भैया। टिंकू मिष्ठान भंडार वाला। अखाड़े के पास।"
"इतनी रात को क्या कर रहा है?"
"भैया, बात ऐसी है," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो मिठास घुल गई जो सिर्फ़ उसके पास है, "कल से मेरी दुकान का उद्घाटन है। नया बोर्ड लगवाया है। सोचा, आज रात पहली मिठाई किसी को खिला दूँ। शुभ होगा।"
"बकवास," लंबे ने कहा। "भाग यहाँ से।"
"अरे, एक लड्डू तो खा लो," टिंकू ने कहा। वो आगे बढ़ा। "मुफ़्त है। मुफ़्त में भी मना कर रहे हो? देखो, कितना ताज़ा है।"
मैंने देखा, मोटे की नज़र टोकरी पर गई। उसका हाथ लाठी से हटकर टोकरी की तरफ़ बढ़ा।
"बस एक," उसने कहा। "और भाग जा।"
उसने लड्डू उठाया, ऊपर वाला। मीरा के हिसाब से। मैंने साँस रोक ली।
मोटे ने लड्डू मुँह में डाला। उसने चबाया। उसके चेहरे पर भाव बदले — पहले शक, फिर हैरानी, फिर वो बच्चों जैसी खुशी जो मिठाई खाते वक़्त आती है।
"अरे वाह," उसने कहा। "ये तो… ये तो बहुत बढ़िया है।"
"मैंने कहा था ना," टिंकू हँसा। "लो भैया, तुम भी लो।" उसने लंबे की तरफ़ टोकरी बढ़ाई।
लंबे ने एक नज़र मोटे को देखा। मोटा पहले से दूसरे लड्डू की तरफ़ देख रहा था।
"हाँ, दे दे," मोटे ने कहा।
लंबे ने लड्डू लिया और खाया। उसकी आँखें भी बंद हो गईं।
"भाई, ये तो कमाल है," वो बोला।
"तो और लो," टिंकू ने कहा।
और फिर वो हुआ जो मैंने सोचा था। दोनों ने एक और-एक लड्डू उठाया, पर इस बार उन्होंने टोकरी में नीचे हाथ डाला। और मीरा ने सिर्फ़ ऊपर वाले चार में गोलियाँ डाली थीं।
पर मेरी चिंता बेकार थी। मोटे ने दूसरा लड्डू भी खाया, और उसके बाद उसने अपनी आँखें मलीं और कहा, "मुझे नींद आ रही है।"
"मुझे भी," लंबे ने कहा। उसकी आवाज़ लड़खड़ाई।
वो दीवार से टेक लगाकर बैठ गए। मोटे का सिर झुक गया। लंबे की लाठी हाथ से छूटकर गिरी और मिट्टी में खटखट हुई।
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