Spirit of a Fighter – Chapter 812
वो रुक गई।
"अगर वो क्या?" मैंने पूछा।
"अगर वो उनके साथ है, तो वो कभी नहीं बताएगा।"
मैं चुप हो गया। मेरे अंदर कुछ ठंडा हो रहा था। मैंने मीरा की तरफ़ नहीं देखा। मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। उनका चेहरा पहले जैसा था — थका, झुर्रीदार। पर उनकी आँखों में कुछ और था। कुछ जो मैंने पहले नहीं देखा था।
"कालू काका," मैंने धीरे से कहा, "आपको कैसे पता कि ये अंगूठी चंदन की है?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। "मैंने इसे बनवाया था।"
"किससे?"
"लोहार से। लोहार ने अंदर नाम खोदा था। 'चंदन'। देखो।"
उन्होंने अंगूठी मेरी तरफ़ बढ़ाई। मैंने उसे पलटा। अंदर की तरफ़, छोटे-छोटे अक्षरों में। 'चंदन'। पर अक्षर घिसे हुए थे, जैसे किसी ने उन्हें मिटाने की कोशिश की हो।
"अक्षर घिसे हैं," मीरा ने कहा, और वो भी देख रही थी। "कोई इसे पहनता रहा है।"
"या कोई इसे छुपाना चाहता था," मैंने कहा।
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में सवाल था।
"अगर चंदन इसे पहनता, तो अक्षर इतने घिसे क्यों होते?" मैंने कहा। "उँगली पर पहनी अंगूठी के अक्षर उँगली से रगड़कर घिसते हैं। पर ये अंदर से घिसे हैं। मतलब इसे किसी ने जेब में रखा, या किसी कपड़े में बाँधकर रखा। कोई इसे पहन नहीं रहा था। कोई इसे छुपा रहा था।"
कालू काका ने धीरे से कहा, "तो फिर ये यहाँ…"
"ये यहाँ गिरी नहीं," मैंने कहा। "ये यहाँ रखी गई। जानबूझकर।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "किसने?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। फिर मैंने पीपल के पीछे की तरफ़ देखा। वहाँ झाड़ियाँ थीं। और उनके पीछे, एक टूटी दीवार।
"किसी ने हमें यहाँ बुलाया है," मैंने कहा। "किसी ने ये अंगूठी यहाँ रखी ताकि हमें पता चले कि चंदन यहाँ था। और किसी ने हमें यह भी बताया कि चंदन माँ को ले गया।"
"पर क्यों?" टिंकू ने पूछा।
मैंने अपनी आँखें बंद कीं। गंध। मैंने गहरी साँस ली। पसीना, सब्ज़ी, बैल। और उसके नीचे… फिर वही। तंबाकू और नीम। और कुछ और। जो मैंने पहले नहीं पकड़ा था। मीठी सी, जैसे छत पर सूख रही मिर्च।
मैंने आँखें खोलीं।
"वो यहीं है," मैंने कहा।
"कौन?"
"जिसका हाथ जला है। धन्नू।"
मैंने टूटी दीवार की तरफ़ इशारा किया। "वो वहीं छुपा है। और वो हमें देख रहा है।"
टिंकू ने डिब्बी उठाई और आगे बढ़ा।
"टिंकू, रुक!"
पर वो रुक नहीं रहा था। वो दीवार की तरफ़ बढ़ रहा था, और मैं उसके पीछे। मीरा ने कालू काका का हाथ पकड़ा। गुड़िया ने मेरी कमीज़ पकड़ी।
"भैया, मत जा।"
"गुड़िया, तू यहीं रुक। कालू काका, इसे पकड़े रहना।"
हम दीवार के पास पहुँचे। टिंकू ने दीवार के ऊपर से झाँका। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया — खाली है।
पर मैंने अपनी नाक उठाई। गंध दीवार के पीछे से आ रही थी। हल्की, जैसे कोई जल्दी में गुज़रा हो।
"वो भाग गया," मैंने कहा।
"या वो हमें बुला रहा है," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ और था। डर नहीं। जैसे उसे पता हो कि आगे क्या है।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। "चल।"
हम दीवार के पीछे पहुँचे। वहाँ एक टूटी सीढ़ी थी जो नीचे जाती थी। नीचे अंधेरा था। पर मैंने सूंघा — मिट्टी का तेल, और लोहे की चीज़। और उसके नीचे, बहुत हल्का, माँ की गंध। हल्दी, चक्की की आटे की, और उनके हाथों की।
"माँ यहाँ से गुज़री हैं," मैंने कहा। मेरी आवाज़ फट गई।
"कब?" मीरा ने पूछा।
"अभी।" मैंने सीढ़ी की तरफ़ देखा। "पर वो रुकी नहीं। उन्हें नीचे ले जाया गया।"
मैंने पहला कदम नीचे रखा। टिंकू ने मेरा कंधा पकड़ा।
"वीर, रुक।"
"क्या?"
"मैं तेरे साथ हूँ। पर एक बात कहनी है।" उसने मेरी आँखों में देखा। "अगर वहाँ कुछ ऐसा है जो हमें नहीं लेना चाहिए, तो मैं तुझे खींचकर बाहर ले आऊँगा। चाहे तू मुझे मार दे।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। फिर मैंने सिर हिलाया।
"और वीर," उसने धीरे से कहा, "तेरी माँ ठीक है। मुझे पता है।"
"कैसे?"
"क्योंकि अगर वो उन्हें मारना चाहते, तो गाड़ी नहीं भेजते। वो उन्हें ज़िंदा चाहते हैं। और जो ज़िंदा चाहते हैं, उनके पास कोई न कोई माँग होती है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। टिंकू की आँखों में वो हँसी नहीं थी जो हमेशा रहती थी। उसकी आँखें साफ़ थीं। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखा।
"तू मेरे साथ चल," मैंने कहा। "और मैं तुझे कुछ नहीं होने दूँगा।"
"मैं अपनी परवाह नहीं करता," टिंकू ने कहा। "मैं तेरी परवाह करता हूँ।"
मीरा पीछे से आई। उसने मेरी कलाई पकड़ी। "मैं पहले जाऊँगी।"
"मीरा…"
"मैं आयुर्वेद की पढ़ाई कर रही हूँ। अगर अंदर कोई ज़ख़्मी है, तो मैं काम आऊँगी। और अगर कोई ज़हर है, तो मैं उसे पहले पहचानूँगी।" उसने मेरी आँखों में देखा। "तू मेरी रक्षा मत कर। मैं तेरे साथ लड़ूँगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरे अंदर कुछ हिला। मैंने उसे रोका नहीं।
हम सीढ़ियों से नीचे उतरे। अंधेरा था। टिंकू ने अपनी जेब से मोमबत्ती निकाली। "मिठाई की दुकान से लाया था," उसने फुसफुसाकर कहा। "सोचा था, अगर रात में जागना पड़े तो काम आएगी।"
मोमबत्ती जली। दीवारों पर पुरानी लिपाई थी। नीचे की मिट्टी गीली थी। और हवा में वो गंध थी — मिट्टी का तेल, लोहा, और माँ की हल्दी।
हम आगे बढ़े। सुरंग सीधी नहीं थी। वो मुड़ रही थी। और हर मोड़ पर मैं रुकता था और सूंघता था। कभी गंध तेज़ होती, कभी धीमी। पर एक बात साफ़ थी — माँ यहाँ से गुज़री थीं। और वो अकेली नहीं थीं।
"वीर," मीरा ने धीरे से कहा। "यहाँ कुछ और भी है।"
"क्या?"
"मिट्टी। देख।" उसने दीवार की तरफ़ इशारा किया। "यहाँ लाल मिट्टी है।"
मैंने देखा। दीवार की तरफ़ लाल मिट्टी थी। वो मिट्टी अखाड़े की मिट्टी थी।
"यहाँ किसी ने अखाड़े की मिट्टी लाकर रखी है," मीरा ने कहा।
"क्यों?"
"शायद इसलिए कि यहाँ कोई है जो मिट्टी में लेटना चाहता था।"
मैंने आगे देखा। सुरंग खत्म हो रही थी। आगे एक कमरा था। उसकी रोशनी सुरंग में आ रही थी। पीली, कंपकंपाती।
मैंने टिंकू की मोमबत्ती बुझाई। हम अंधेरे में रुके।
"माँ?"
रोशनी काँप रही थी, जैसे किसी के हाथ में लालटेन हो और वो हाथ डर से काँप रहा हो।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी कलाई दबाई — एक बार, बस एक बार। फिर छोड़ दी। जैसे कह रही हो, अब तेरी बारी।
हम कमरे की दहलीज़ पर पहुँचे। मैंने झाँका।
कमरा खाली था। फ़र्श पर एक चटाई बिछी थी। चटाई के पास एक मिट्टी का घड़ा था, और उस घड़े के ऊपर एक कटोरी रखी थी — जिसमें बासी रोटी के टुकड़े थे। और चटाई के ठीक बीच में, एक रुमाल।
मेरा दिल धक से रह गया।
वो रुमाल मेरी माँ का था। लाल किनारी वाला। जो उन्होंने पिछले साल मेले से खरीदा था, और जिसे वो हमेशा अपनी कमर में बाँधती थीं।
मैं कमरे में घुसा। घुटने टेके। रुमाल उठाया।
उसमें से गंध आई। हल्दी, आटा, और… और उसके नीचे कुछ और। कुछ कड़वा। जो मैंने पहले भी सूंघा था।
नीम का तेल। और तंबाकू।
"वीर?" मीरा ने पुकारा। "क्या हुआ?"
"ये उसका रुमाल है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ रुँधी थी। "वो इसे कभी नहीं छोड़ती। कभी नहीं।"
"तो इसका मतलब?"
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