Spirit of a Fighter813 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 813

7 min read November 5, 2026

"मतलब ये कि वो इसे यहाँ छोड़कर गई है। जान-बूझकर।" मैंने रुमाल मुठ्ठी में भींचा। "माँ हमें बता रही हैं — मैं यहाँ थी। मुझे यहाँ से ले जाया गया।"

टिंकू ने चटाई उठाई। उसके नीचे मिट्टी पर कुछ खुरचा हुआ था। उँगली से। अधूरा सा।

"खूँटा," टिंकू ने पढ़ा। "यहाँ 'खूँटा' लिखा है।"

मेरे पीछे गुड़िया की रोने की आवाज़ आई। मैं पलटा। वो कालू काका का हाथ पकड़े दहलीज़ पर खड़ी थी, और उसका चेहरा लाल था।

"भैया, वो लंगड़ा आदमी… वो खूँटे जैसी लाठी से चलता था। गाड़ी वाले ने बताया था।"

कमरे में सन्नाटा छा गया। ऐसा सन्नाटा जिसमें सबकी साँसें सुनाई दे रही थीं।

"माँ ने हमें बताया है," मैंने धीरे से कहा। "वो जानती थीं कि हम आएँगे। और उन्होंने निशान छोड़ा है।"

"पर क्यों?" मीरा ने कहा। "अगर वो जानती थीं कि कोई उन्हें ले जा रहा है, तो चिल्लाई क्यों नहीं?"

"क्योंकि चिल्लाने से गुड़िया को खतरा था," मैंने कहा। "वो हमेशा मेरी बहन को पहले बचाती हैं। हमेशा।"

मेरी आँखें जलने लगीं। मैंने रुमाल अपनी जेब में रखा।

टिंकू बाहर गया। मैंने उसे सुना — सुरंग के मुँह पर वो किसी से बात कर रहा था। फिर वो वापस आया, और उसके पीछे गाड़ी वाला — बूढ़ा, झुकी कमर, हाथ में पुरानी छड़ी।

"बैठो," टिंकू ने उसे चटाई पर बैठाया। "बाबा, चाय पी लो। हाथ काँप रहे हैं।"

गाड़ी वाले ने कटोरी थामी। उसके हाथ सच में काँप रहे थे। टिंकू ने उसके आगे घुटने टेके, और धीरे से पूछा, "बाबा, उस वक़्त और क्या याद है? कोई गंध? कोई आवाज़?"

गाड़ी वाले ने आँखें बंद कीं। "एक आदमी की साँस भारी थी। जैसे उसे चलने में तकलीफ़ हो। और उसके कपड़ों से…" उसने नाक सिकोड़ी। "नीम के तेल की बू आ रही थी। और तंबाकू की। पान खाता है, वो।"

"और दूसरा?" टिंकू ने पूछा।

"दूसरा चुप था। बस माँ जी को पकड़े हुए था। और उसने मुझे देखकर कहा — 'ठाकुर का हुक्म है। ज़्यादा मत पूछो।'"

रुमाल की गंध और गाड़ी वाले की बात — दोनों एक हो गईं। नीम का तेल। तंबाकू।

और तभी मेरे दिमाग़ में कुछ चमका।

कल रात। अखाड़े की दीवार। मैंने वहाँ एक आदमी को देखा था, लालटेन की रोशनी में। उसने चिट्ठी लिखी थी। और लिखते वक़्त वो बार-बार रुककर अपनी जेब से कुछ निकालकर मुँह में डालता था। पान। और उसके कंधे पर एक थैला था जिससे बू आ रही थी।

मैं रास्ते की मिट्टी पर घुटनों के बल बैठ गया। माथा झुकाया। आँखें बंद कीं। सूंघा — गीली मिट्टी, पुरानी दीवार, और उसके नीचे, बहुत हल्का — नीम का तेल। और तंबाकू।

मैं उठा। मेरा शरीर काँप रहा था, पर आवाज़ साफ़ थी।

"ये गंध मुझे पता है। ये उसी आदमी की है जो कल रात अखाड़े की दीवार पर चिट्ठी लिख रहा था।"

सब चुप हो गए।

"और वो अभी भी गाँव में है।"

॥

वो गंध मेरे नाक में बस गई थी, और मेरे पैर खुद ही उसकी तरफ़ खिंचने लगे। मैं सुरंग के मुँह से बाहर निकला, तो रात की हवा ने मुँह पर थप्पड़ जैसा मारा। ठंडी थी, और उसमें नमी थी।

"कहाँ जा रहे हो?" मीरा ने पीछे से पूछा। उसकी आवाज़ में वो झिड़की थी जो अब मैं पहचानने लगा था — डर के ऊपर चढ़ाई गई झिड़की।

"पीछे मत आओ," मैंने कहा, और मुझे खुद अपनी आवाज़ में कुछ कड़वा लगा। "मैं पहले देख लूँ।"

"वीर सिंह।" वो मेरे आगे आ गई। "तूमने मुझे अभी-अभी बताया कि वो आदमी गाँव में है, और अब खुद अकेले उसके पीछे जा रहे हो? ये कौन-सी अक्ल है?"

टिंकू बीच में आया। "दोनों चुप।" उसने अपनी टोपी ठीक की। "मैं चलता हूँ ना साथ। तीन जने हैं तो तीन तरफ़ से देख लेंगे। और वैसे भी —" उसने अपनी जेब से कुछ निकाला, "— मेरे पास रोटी है। भूखे आदमी की अक्ल कम चलती है।"

मीरा ने उसे घूरा। "तू हर जगह खाना कहाँ से ले आता है?"

"मैडम, ये मेरा हुनर है।" टिंकू मुस्कुराया। "बाकी सब तो बाद में सीख लूँगा।"

मेरे पैर मुझे खींच रहे थे। गंध हल्की हो रही थी, जैसे कोई चलता-चलता धूल में पैरों के निशान छोड़ रहा हो। मैं सुरंग से बाहर, नीम के पेड़ों की तरफ़ बढ़ा। अखाड़े के पीछे का रास्ता है, जो गाँव के बाहर निकलता है। मिट्टी सूखी थी, पर उसमें कहीं-कहीं गीले धब्बे थे — पैरों के निशान, बहुत साफ़ नहीं, पर इतने तो थे कि पता चले कि कोई भागते हुए नहीं, संभलकर चला है।

"रुको," मैंने कहा। मैं झुका। ज़मीन पर घुटने टेके। "यहाँ कुछ गिरा है।"

मीरा और टिंकू पास आए। ज़मीन पर पान की एक गीली पीक थी, और उसके पास ही तंबाकू के कुछ टुकड़े।

"पान," टिंकू ने कहा। "सुक्खी बुआ का पान। वो इसके बिना रह नहीं सकती।"

मेरे दिल में एक झटका लगा। "सुक्खी बुआ?"

"हाँ।" टिंकू ने अपनी टोपी पीछे की। "उन्होंने आज सुबह मुझे गोदाम के पास घूमते देखा था। मैंने कहा रास्ता भूल गया था। उन्होंने मुझे कुछ कहा नहीं, बस पान चबाते हुए देखती रहीं।"

मैं खड़ा हुआ। गंध पकड़कर आगे बढ़ा। नीम का पेड़ अब दिखने लगा था — बहुत पुराना, फैली जड़ें, और उसकी छाया में कुछ चमक रहा था।

वो चमक पीतल की लालटेन थी।

मैंने मीरा का हाथ पकड़ा। "चुप।"

हम पेड़ के पीछे से होकर गए। मुझे अपनी साँसें सुनाई दे रही थीं, और मीरा के हाथ की गर्मी। टिंकू हमारे पीछे था, ऐसे चल रहा था जैसे उसने ज़िंदगी में कभी इतनी चुप्पी नहीं की हो।

पेड़ के उस पार, ज़मीन पर एक पुरानी चटाई बिछी थी, और उस पर बैठी थी सुक्खी बुआ। एक हाथ में पान का बीड़ा, दूसरे में पीतल की लालटेन। उनकी चमकीली साड़ी रात में भी चमक रही थी। वो बड़बड़ा रही थीं, शायद अपने आप से।

मैं सीधा उनके सामने गया।

"बुआ।"

वो उछल पड़ीं। बीड़ा उनके हाथ से गिरा। "अरे राम! तू… तू इतनी रात को यहाँ? डरा क्यों दिया बेटा?"

"बुआ, ये लालटेन तुम्हारे पास कहाँ से आई?"

उन्होंने लालटेन अपनी साड़ी के पल्लू से ढकने की कोशिश की। "क्या… क्या लालटेन? ये तो मेरी है। पुरानी है।"

"बुआ," मीरा आगे आई, और उसकी आवाज़ में अब वो कोर्ट वाली तेज़ी थी। "ये लालटेन भैरव के कमरे से है। मैंने इसे सैकड़ों बार देखा है। इसके पीतल पर मोर बना है। अब सच बोलिए।"

सुक्खी बुआ का चेहरा बदला। उनके होंठ काँपे। फिर उन्होंने लालटेन मिट्टी पर रख दी, और अपना मुँह फेर लिया।

"मुझे माफ़ कर दो बेटा," वो बोलीं, आवाज़ धीमी। "मैं तो बस… मैं सो रही थी। मेरी नींद खुली, तो आवाज़ आई। बैलगाड़ी की। और फिर कोई रो रहा था।"

"कौन रो रहा था?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ फटी हुई आई।

"तेरी माँ।" सुक्खी बुआ ने आँखें नीची कर लीं। "मैं दौड़कर बाहर आई। तो देखा — एक लंगड़ा आदमी, हाथ में खूँटे जैसी लाठी। और दूसरा, जिसने मुँह पर कपड़ा बाँधा हुआ था। और तेरी माँ को वो दोनों बैलगाड़ी पर बिठा रहे थे।"

"और गुड़िया?" ये टिंकू ने पूछा। उसकी आवाज़ में वो हँसी नहीं थी।

"गुड़िया कहाँ थी?" सुक्खी बुआ ने सवाल को मेरी तरफ़ घुमाया, जैसे जवाब वो मुझसे माँग रही हों। "जब मैं पहुँची, तो गाड़ी में सिर्फ़ तेरी माँ थी। गुड़िया नहीं थी।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मैंने पेड़ का तना पकड़ा।

"वो झूठ बोली," मैंने कहा। "गुड़िया ने कहा था कि उसे भी ले जा रहे हैं। वो कसम खाकर बोली थी।"

"तो शायद गुड़िया बाद में आई," मीरा ने कहा। "या उसे कहीं छोड़ दिया।"

"कहाँ छोड़ा?" टिंकू ने पूछा, और उसकी आवाज़ में अब घबराहट थी। "बुआ, बोलो ना। उन्होंने कुछ कहा? कहीं जाने को?"

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