Spirit of a Fighter – Chapter 811
मेरी आँखें खुल गईं। मैं काँप रहा था।
"गाड़ी वाला वहीं खड़ा था," मैंने कहा। "पीपल के नीचे। वो पसीना पोंछ रहा था। उसका पसीना सूखा है, पर जगह पर अभी भी गंध है। वो पीछे नहीं गया। वो माँ के साथ गया।"
मैंने अपनी आँखें फिर बंद कीं और उस गंध को अलग किया। दो अलग गंधें थीं। एक गाड़ी वाले की — पसीना, सब्ज़ी की बोरियाँ, बैल की रस्सी। दूसरी… दूसरी किसी और की। मीठी, भारी, जैसे कोई पुराना तेल जो हवा में घुल गया हो।
"वो दो आदमी नहीं थे," मैंने कहा। "तीन थे।"
कालू काका ने आगे कदम बढ़ाया।
"तीन?"
"हाँ। लंगड़ा, लालटेन वाला, और एक और…" मैंने आँखें खोलीं। "जिसके हाथ में लालटेन नहीं थी। जिसकी गंध सबसे ज़्यादा दूर तक जाती है। वो माँ को उठाने वालों में से नहीं था। वो पहले से वहाँ था। पीपल के नीचे। इंतज़ार कर रहा था।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें तेज़ हो गईं।
"मतलब वो आदमी जानता था कि गाड़ी कहाँ रुकेगी।"
"और वो जानता था," मैंने धीरे से कहा, "कि हम कहाँ होंगे।"
कालू काका का चेहरा बदल गया। उन्होंने अपनी कमर से लालटेन उठाई, फिर छोड़ दी।
"तो कोई हमें देख रहा है।" उनकी आवाज़ सूखी थी।
"नहीं," मैंने कहा। मेरे अंदर कुछ और हो रहा था। गुस्सा नहीं, कुछ ठंडा। "वो हमें देख नहीं रहा। वो हमें पहले से जानता है। वो जानता था कि हम कब्रिस्तान जाएँगे। क्योंकि वो वही आदमी है जिसने कल रात अखाड़े की दीवार पर वो धमकी वाली चिट्ठी लिखी थी।"
मैंने गुड़िया की तरफ़ देखा। वो अभी भी काँप रही थी।
"गुड़िया, उस खोड़े आदमी को तूने अच्छे से देखा?"
"हाँ।"
"उसके हाथ?"
गुड़िया ने आँखें मूँदकर याद किया। "उसके हाथ पर जला हुआ निशान था। बाएँ हाथ पर। और उसकी उँगली… उसकी उँगली में अंगूठी नहीं थी। उँगली ही नहीं थी। छोटी उँगली कटी हुई थी।"
कालू काका ने साँस खींची। फिर उन्होंने धीरे से कहा, "धन्नू मल्लाह।"
मैंने पलटकर देखा।
"क्या?"
"धन्नू मल्लाह," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ में कोई डर नहीं था, सिर्फ़ थकान। "वो आदमी जो खुद को जगदीश कहकर चलता था। कल रात उसने मुँह खोला था, तब उसने बताया था कि वो धन्नू है। रघुवीर और माधव का बचपन का साथी। जिसने ज़हर डालते देखकर डर से भागना चुना था।"
"पर वो हमारे साथ था," मीरा ने कहा। "उसने माधव की अंगूठी वाली शीशी निकाली थी।"
"हाँ," कालू काका ने कहा। "और वही सबसे बड़ी बात है। वो हमारे साथ क्यों आया? क्योंकि उसके पास अपना हिसाब चुकाना था। पर अब उसने माँ को उठाने में मदद क्यों की?"
मैंने सोचा। फिर मेरे पेट में ठंडी सी चीज़ हिली। "क्योंकि उसके पास अब भी कोई डर बचा है। और वो डर माधव नहीं है। क्योंकि माधव तो पकड़ा जा चुका है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "तो फिर कौन?"
"वही जो सबसे बड़ा है," मैंने कहा। "वही जिसने ठाकुर का नाम लिया था।"
टिंकू ने अचानक कहा, "वो गाड़ी वाला?" और मैंने देखा कि टिंकू ने अपनी डिब्बी उठा ली थी और उसकी तरफ़ देख रहा था।
"क्या?" मैंने पूछा।
"वो गाड़ी वाला ज़रूर कहीं छुपा होगा। गाड़ी कहाँ ले जाएगा? सब्ज़ी की गाड़ी है। सब्ज़ी मंडी चली जाएगी। पर गाड़ी वाला…"
"गाड़ी वाला पीपल के नीचे से उतरकर कहाँ गया?" मैंने पूछा।
गुड़िया ने कहा, "मुझे नहीं पता। जब मैं छत से नीचे आई, तो वो वहाँ नहीं था। बस गाड़ी के पहियों के निशान थे।"
मैंने नीचे देखा। पैरों के नीचे मिट्टी पर कोई निशान नहीं था। यहाँ कब्रिस्तान की मिट्टी सूखी है, रेतीली। उस पर धोती का कोना रगड़ने से भी कुछ नहीं बचेगा। मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
"गाड़ी वाले ने माँ को पीपल के नीचे उतारा," मैंने कहा। "वहाँ उसने क्या किया होगा? पसीना पोंछा। फिर वो अपने हाथ से पीपल के पत्ते तोड़े होंगे, या बैल को पानी पिलाया होगा।"
"तो?"
"तो उसकी गंध पीपल के नीचे होगी। उसके हाथ की मिट्टी में होगी। मैंने उसे अभी सिर्फ़ हवा में पकड़ा है। मुझे ज़मीन चाहिए।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तू मेरे साथ चलेगी?"
मीरा ने एक पल मेरी आँखों में देखा, फिर उसने कहा, "मैं तो पहले से चल रही हूँ।"
हम पीपल के नीचे पहुँचे। रात बहुत गहरी हो चुकी थी। पीपल का पेड़ इतना बड़ा था कि उसके नीचे दिन में भी ठंडी छाया रहती थी। मैंने अपने हाथ ज़मीन पर रखे और सूंघा। एक गंध पहले आई — बैल की, गोबर की, रस्सी की। फिर सब्ज़ी की — भिंडी, टमाटर का पानी। फिर पसीना। पर उस पसीने में तेज़ चीज़ थी। वही।
मैंने उस जगह को पकड़ा। पीपल की जड़ के पास। मैंने अपनी उँगलियाँ मिट्टी में गड़ाईं। मेरे हाथ नीचे गए और छोटे-छोटे कंकड़ों में उलझे। फिर मेरी उँगली किसी चीज़ से टकराई। सख़्त, गोल।
मैंने खींचा। एक छोटी सी पीतल की अंगूठी थी। मटमैली, घिसी हुई। उस पर कोई निशान नहीं था। सिर्फ़ एक छोटा-सा चिह्न — जो अब घिस गया था।
"ये माधव की अंगूठी नहीं है," मीरा ने पास आकर कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "ये थोड़ी बड़ी है। और पुरानी।"
कालू काका आगे आए। उन्होंने अंगूठी मेरे हाथ से ली। उनके हाथ काँपे। उन्होंने अंगूठी पलटी, और उसके अंदर की तरफ़ देखा। फिर उनकी आँखें भर आईं।
"ये…" उनकी आवाज़ फट गई। "ये चंदन की अंगूठी है।"
"क्या?"
"चंदन सिंह। मेरा बेटा।" कालू काका ने अंगूठी अपनी हथेली में रखी। "मैंने इसे उसके जन्मदिन पर दी थी। बीस साल पहले। उस रात वो इसे पहनकर गया था। मुझे लगा कि वो इसके साथ जला…"
"तो ये यहाँ कैसे आई?" मीरा ने पूछा।
कालू काका ने अपनी आँखें पोंछीं। "चंदन ज़िंदा है। मैंने तुम्हें बताया था ना — कल रात मुझे जली चप्पल वाला आदमी मिला था। वो चंदन था। उसने चाबी दी थी। तीन ताले वाली।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "अगर ये अंगूठी यहाँ है, तो मतलब वो यहाँ था।"
"चंदन ने माँ को उठाया?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ में डर आ गया।
"नहीं," कालू काका ने सिर हिलाया। "चंदन माँ को नहीं उठाएगा। पर वो यहाँ क्यों आया? वो पीपल के नीचे क्या कर रहा था?"
मैंने सोचा। गुड़िया ने कहा था — खोड़ा आदमी। चंदन लंबे समय से छिपा था। उसकी टाँग जली थी। वो खोड़ा था। वो मुझे मिला था। उसने मुझे चाबी दी थी।
"रुको," मैंने कहा। "गुड़िया ने कहा था कि खोड़े आदमी ने उसे छुपने का इशारा किया। फिर वो गाड़ी वाले के पास गया। और गाड़ी वाला उतरा। फिर वो दोनों माँ को मोड़ के पीछे ले गए।"
"तो चंदन माँ को बचाने आया था?" टिंकू ने पूछा।
"या वो उन्हें ले जाने आया था," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में कोई भावना नहीं थी।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "क्या मतलब?"
"मतलब यह कि हम चंदन को नहीं जानते," मीरा ने कहा। "उसने हमें चाबी दी, पर उसने हमें यह भी नहीं बताया कि वो बीस साल कहाँ था। वो भैरव का दाहिना हाथ था। उसने ही शेर सिंह के गिलास में ज़हर डाला था। हाँ, उसके हाथ काँपे थे। पर उसने डाला तो था।"
"पर उसने ठाकुर की अंगूठी वाली शीशी…"
"वो शीशी लाकर उसने अपना हिसाब चुकाया," मीरा ने कहा। "पर कल रात जब भैरव रो रहा था, तब भी वो चुप खड़ा था। उसने माँ को नहीं बचाया।"
कालू काका ने कुछ कहना चाहा, पर मीरा ने हाथ उठाया। "कालू काका, मैं आपके बेटे पर इल्ज़ाम नहीं लगा रही। मैं सिर्फ़ यह कह रही हूँ कि हमें उसे ढूँढना होगा। अगर वो माँ को बचाने आया था, तो वो हमें बताएगा कि वो कहाँ है। और अगर वो…"
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