Spirit of a Fighter806 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 806

7 min read November 5, 2026

मैंने भैरव से नफ़रत की थी। उससे मेरे पापा की मौत का हिसाब माँगा था। उसकी बोतल, उसका ज़हर, उसके मरे हुए आदमी — सब मेरे सामने थे। पर आज उसे देखकर मुझे नफ़रत नहीं आई। कुछ और आया। कुछ ऐसा जिसे मैं नाम नहीं देना चाहता था, क्योंकि नाम देने से वो कमज़ोर लगने लगता।

मीरा ने मेरी कलाई छुई। बस उँगलियों का सिरा। और मैंने अपनी मुट्ठी ढीली कर दी जो मैंने कब से कस रखी थी। मुझे पता भी नहीं था कि मैं मुट्ठी कसे खड़ा हूँ।

पुलिसवाले भैरव की तरफ़ बढ़े। कमला देवी ने उन्हें देखा और अपनी लाठी उनकी तरफ़ कर दी।

"एक मिनट," उन्होंने कहा। "मैं अपने बेटे से दो शब्द बोल लूँ।"

अफ़सर ने हामी भरी। बूढ़ी माँ के सामने कोई क्या बोलता।

कमला देवी ने भैरव का चेहरा अपनी तरफ़ किया, दोनों हाथों से, जैसे पूरे बीस साल की दूरी को हाथों में लेकर माप रही हों।

"सुन," उन्होंने कहा। "जो हुआ, हुआ। अब तुझे जेल जाना हो तो जा। पर एक बात याद रख — तेरा नाम मोहन है। सुना? मोहन। वो नाम जिसे तूने सबके सामने छोड़ दिया था, आज उसी नाम से तूने अपने बाप को गिराया। ये छोटी बात नहीं है।"

भैरव ने सिर हिलाया। बोल नहीं पाया।

माधव सिंह ने ये सब देखा। उनका चेहरा बदल रहा था — कभी गुस्सा, कभी डर, कभी कुछ और जो मुझे पहचाना-सा लगा। जैसे कोई आदमी अचानक देख रहा हो कि जो चीज़ उसने खुद बनाई थी, वो उससे दूर जा रही है।

"मोहन," उन्होंने फिर कहा, इस बार आवाज़ में कोई मिठास नहीं थी, सिर्फ़ कोशिश। "मोहन, मेरी बात सुन। मैंने जो किया, सोच-समझकर किया। तू छोटा था। तुझे पता नहीं, इस अखाड़े में रहने के लिए क्या करना पड़ता है। मैंने तुझे बचाया। मैंने तुझे ऊपर उठाया।"

भैरव ने अपना सिर माँ के कंधे से उठाया। उसने आँसू पोंछे, और मैंने देखा कि उसकी आँखें फिर वैसी हो गईं — ठंडी। पर इस बार ठंडक में कुछ और था। जैसे कुएँ का पानी जो बरसों बाद बाहर आया और देखा कि दुनिया बदल गई।

"बाप," उसने कहा, और ये शब्द अब कड़वा नहीं था, थका हुआ था। "तूने मुझे बचाया नहीं। तूने मुझे चुना, उसी तरह जैसे कोई औज़ार चुनता है। बोतल में ज़हर भरने के लिए। और मैं मान गया, क्योंकि मैं सोचता था कि तू मेरा बाप है। पर आज मेरी माँ ने मेरा नाम लिया, और मुझे पता चला कि बाप वो होता है जो नाम देता है, बोतल नहीं।"

माधव सिंह ने एक कदम आगे बढ़ाया, फिर रुक गए। पुलिसवाले उनके दोनों तरफ़ थे।

"तू ये सब बोल रहा है," उन्होंने कहा, "पर तू भूल रहा है कि उन अठारह में से कितनों के हाथ में बोतल तूने खुद थमाई थी। तूने ज़हर दिया। तूने ही दिया। मैंने तो बस हुक्म दिया था।"

भीड़ में सन्नाटा और गहरा हो गया। ये बात सच थी, और सब जानते थे। भैरव भी जानता था।

वो काँपा। बस एक बार, जैसे ठंडी हवा लगी हो।

"सच है," उसने कहा। "मैंने दिया। और इसीलिए मैं आज खुद गवाही देने आया हूँ। मुझे भी सज़ा मिलेगी, बाप। पर तेरे साथ। अकेले तू नहीं जाएगा। ये मेरा आख़िरी हिसाब है।"

उसने अफ़सर की तरफ़ देखा।

"सर, मैं सब कबूल करता हूँ। बोतलें मेरे हाथ से बनीं, पर पर्ची उसके हाथ की थी। रघुवीर की अलमारी से जो पीला काग़ज़ मिला था, वो उसकी लिखाई है। मेरे पास उसकी नक़ल है। और रणवीर सिंह के पैर… उनके पैरों की सच्चाई भी उसी काग़ज़ में लिखी है।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। रणवीर सिंह का नाम आते ही उसने अपना बैग कसकर पकड़ लिया।

"कौन-सी सच्चाई?" मीरा ने पूछा, और उसकी आवाज़ पहली बार काँपी।

भैरव ने उसकी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — शर्म। वो नज़रें नीची कर गया।

"मैडम," उसने कहा, "ये बात मैं आज नहीं बोलूँगा। ये बात तेरे पापा के मुँह से निकलनी चाहिए। मैंने उनसे बीस साल पहले वादा किया था। आज मैं टूट गया, पर उनका वादा नहीं तोड़ूँगा।"

मीरा कुछ कहने ही वाली थी कि पीछे से रणवीर सिंह की व्हीलचेयर आई। दो आदमी उसे धकेल रहे थे। रणवीर सिंह का चेहरा पत्थर जैसा था, पर उनकी आँखें भैरव पर टिकी थीं।

"बोल दे, मोहन," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ फूल रही थी, पर साफ़ थी। "आज सब सुन लेंगे। मैंने बीस साल ढोया है, अब नहीं ढोऊँगा।"

भैरव ने उनकी तरफ़ देखा। कुछ पल। फिर उसने धीरे से कहा —

"तेरे पैर मैंने नहीं तोड़े थे, रणवीर। तेरे पैरों ने तुझे छोड़ दिया था, उस रात, जब तूने अपने खुद के सामने आँखें नीची कर लीं।"

मैदान में जैसे किसी ने पत्थर गिरा दिया। लोग एक-दूसरे को देखने लगे। रणवीर सिंह की व्हीलचेयर के पहिये रुक गए, जैसे धक्का देने वाले के हाथ ठंडे हो गए।

बस पल भर। और फिर सबसे आगे खड़े सुक्खी बुआ ने अपनी आवाज़ फिर पाई — "अरे ये क्या बोल गया!"

पर भैरव पलट चुका था। पुलिस उसे ले जा रही थी।

माधव सिंह को भी खींचा जा रहा था। वो गाड़ी की तरफ़ बढ़ रहे थे। पर जैसे ही उन्हें गाड़ी की सीढ़ी पर चढ़ाया गया, वो अचानक रुक गए। उन्होंने अपना सिर घुमाया, और उनकी आँखें सीधे मुझे ढूँढ रही थीं।

"वीर," उन्होंने कहा।

मैं आगे नहीं बढ़ा। पर मैंने अपनी नज़र नहीं हटाई।

"वीर, एक बात सुन ले।" उनकी आवाज़ अब मीठी नहीं थी, बस थकी हुई थी। "तेरे पापा ने मरते वक़्त एक नाम लिया था। मैं उस वक़्त कमरे में था। मैंने सुना था।"

मेरा गला सूख गया।

"कौन-सा नाम?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ मुझे अपनी नहीं लगी।

माधव सिंह हँसे। वो हँसी जैसी बीमारी होती है, जो आदमी को अपने आप से दूर कर देती है।

"मैंने सोचा था वो मेरा नाम ले रहे हैं," उन्होंने कहा। "पर वो मेरा नाम नहीं था, वीर। वो तेरी माँ का नाम था। सरस्वती।"

मेरे पैर जम गए।

"वो उस रात वहाँ थी," माधव ने कहा, और पुलिस ने उसे गाड़ी में धकेल दिया। "पूछ अपनी माँ से। उस रात वो भी वहाँ थी।"

गाड़ी का दरवाज़ा बंद हुआ। इंजन चला। भैरव को दूसरी गाड़ी में बैठाया गया, कमला देवी उसके साथ बैठ गईं, और उन्होंने बाहर झाँककर किसी को देखा तक नहीं।

गाड़ियाँ चली गईं, और पीछे धूल उड़ती रही।

मैं वहीं खड़ा रह गया। पूरा मैदान मेरे चारों तरफ़ था — भीड़, मीरा, टिंकू, कालू काका, रणवीर सिंह की व्हीलचेयर — पर मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। सिर्फ़ एक नाम गूँज रहा था। सरस्वती।

माँ उस रात वहाँ थी।

मेरी माँ, जो रोज़ चार बजे चक्की चलाती है, जो हल्दी का टीका लगाती है, जो कहती है "भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है" — वो उस रात वहाँ थी, जब मेरे पापा कुएँ के पास मरे पड़े थे?

और उसने मुझे आज तक नहीं बताया?

मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।

"वीर," उसने धीरे से कहा। "तेरा चेहरा…"

मैंने अपना हाथ छुड़ाया। नरमी से, झटके से नहीं। पर छुड़ाया।

"मुझे माँ से बात करनी है," मैंने कहा।

"अभी? वीर, सोच-समझकर…"

"मीरा।" मैंने उसकी तरफ़ देखा। "आज माधव ने गिरफ़्तार होते वक़्त भी मेरे सीने में एक काँटा छोड़ दिया। वो जानता था कि ये काँटा मुझे सबसे ज़्यादा चुभेगा। इसलिए उसने ये बात कही। वो चाहता है कि मैं घर जाऊँ और माँ से झगड़ा करूँ। ताकि जो सच मैं खोज रहा हूँ, वो मेरे ही घर में टूट जाए।"

टिंकू ने अपना डिब्बा वहीं रख दिया और मेरे पास आया।

"भाई," उसने कहा, "मैं तेरे साथ चलूँगा।"

"तू मिठाई लेकर आया था," मैंने कहा।

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