Spirit of a Fighter807 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 807

7 min read November 5, 2026

"मिठाई रहने दे।" टिंकू ने अपना माथा खुजाया। "मैंने सोचा था आज जीत के बाद खिलाऊँगा। पर आज हार का दिन है नहीं, भाई। आज ऐसा दिन है जो न जीत का है, न हार का। तू इसे क्या कहेगा?"

"पता नहीं," मैंने कहा। "पर मैं तेरे साथ हूँ, मीरा। ये तू जान ले — मैं तेरे पापा के सामने हुई बात से नहीं डर रहा। मुझे डर इस बात से है कि अगर माँ ने सच बताया और मैं सुनने के लिए तैयार नहीं हुआ, तो मैं वो बेटा नहीं जो वो पाल रही है।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपना बैग कंधे पर सीधा किया, एक गहरी साँस ली, और बोली —

"तो चल। मैं भी चलूँगी। तेरी माँ से मेरा भी सवाल है। मेरे पापा के पैरों की बात भैरव ने आधी कही और अधिकारी की गाड़ी में बैठ गया। अब ये सवाल तेरी माँ के पास है।"

हम तीनों मुड़े। पीछे से कालू काका की आवाज़ आई।

"रुको," उन्होंने कहा, और उनका कुबड़ा शरीर ठंडी हवा में काँप रहा था। "मैं भी चलूँगा। क्योंकि जो बात आज माधव ने कही, वो मैंने बीस साल पहले सुनी थी। और आज तक नहीं बोली।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखें डबडबाई हुई थीं।

"काका," मैंने धीरे से कहा। "आपने सुनी थी? मेरी माँ के बारे में?"

कालू काका ने अपना सिर झुकाया। और फिर उन्होंने वो कहा जो मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन हिला गया।

"तेरी माँ उस रात कुएँ पर आई थी, बेटा। मैंने उसे देखा था। वो भीगी हुई थी, और उसके हाथ में एक पीतल का ढक्कन था। उसने कुएँ में झाँका। और जब उसने अंदर देखा, तो उसने एक शब्द नहीं कहा। बस अपने मुँह पर हाथ रखा, और वहीं बैठ गई।"

मेरा दम रुक गया।

"और उसके बाद?" मैंने पूछा।

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो डर था जो बीस साल में नहीं गया।

"उसके बाद," उन्होंने कहा, "तेरी माँ ने वही किया जो मैं नहीं कर पाया। वो उठी, और अखाड़े के दरवाज़े की तरफ़ चली गई। और मैंने उसे भैरव से बात करते देखा। उस रात, कुएँ के पास। और जो बात वो भैरव से कह रही थी, वो मैंने सुनी।"

वो रुके। उनका गला भर गया था।

"क्या कहा था माँ ने?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ फट रही थी।

कालू काका ने धीरे से कहा — "तेरी माँ ने भैरव से कहा था — 'तूने मेरे पति को नहीं मारा। उसे मैंने मारा। मैंने उसे उस रात अखाड़े भेजा, जब मुझे पता था कि वहाँ ज़हर है।'"

मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। जैसे किसी ने मेरे सीने में बर्फ़ का टुकड़ा रख दिया हो।

"और भैरव ने क्या कहा?" मैंने पूछा।

कालू काका ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

"भैरव ने कुछ नहीं कहा। वो बस खड़ा रहा। और फिर तेरी माँ ने उसके हाथ से एक शीशी ली, और अपने आँचल में छिपा ली। और बोली — 'ये शीशी मैं अपने बेटे के लिए रख रही हूँ। जिस दिन ये बड़ा होगा, ये इसे खुद पहचानेगा। और जिस दिन ये पहचानेगा, उस दिन तेरा सच ख़त्म।'"

मैं वहीं खड़ा था, और मेरे सामने माँ का चेहरा आ रहा था — चूल्हे के पास बैठी, आधी जली रोटी छोड़ती हुई, हल्दी का टीका लगाती हुई, "भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है" कहती हुई।

मेरी माँ। जो चक्की चलाती है। जो कभी किसी से नहीं लड़ी।

वो उस रात कुएँ पर थी। और उसने मेरे पापा को जान-बूझकर भेजा था।

क्यों?

मीरा ने मेरा हाथ फिर पकड़ा। इस बार मैंने नहीं छुड़ाया।

"वीर," उसने कहा, "ये सच आधा है। कालू काका ने तेरी माँ का आधा हिस्सा बताया है। पूरा सच तेरी माँ के पास है। और मैं तुझे अकेले नहीं जाने दूँगी।"

टिंकू ने अपना डिब्बा उठाया, और हमारे आगे चल दिया।

"मैं रास्ता जानता हूँ," उसने कहा। "और सुक्खी बुआ को भी बताना पड़ेगा, वरना वो पूरे गाँव में कह देगी कि वीर माँ से लड़ने गया था।"

पीछे से सुक्खी बुआ की आवाज़ आई — "अरे मैं तो यही कह रही थी!"

हम चले। मैदान पीछे छूट गया। रास्ते में नीम के पेड़ की छाया पड़ रही थी, और मेरे नंगे पैरों में मिट्टी भर रही थी।

और मेरे दिल में एक ही सवाल धड़क रहा था — जो औरत मुझे सुबह चार बजे उठने की आदत डालती है, जो कहती है कि सच बोलने से पहले दो बार सोचो — उसी औरत ने उस रात ऐसा क्या देखा था कि उसने अपने पति को मौत की तरफ़ भेज दिया?

और जब मैं घर पहुँचा, और आँगन का दरवाज़ा खोला, तो माँ चक्की पर बैठी थीं। चक्की चल रही थी, वैसे ही जैसे रोज़ चलती है। जैसे आज कुछ हुआ ही न हो।

पर आज उनका पल्ला गीला था। और मैंने कभी नहीं कहा था — माँ पल्ले से आँसू पोंछती हैं।

॥

माँ चक्की पर बैठी थीं, पर चक्की नहीं चल रही थी। उनके हाथ उसके हैंडल पर टिके थे, बस टिके थे। मैंने देखा कि आटे की तह उनके घुटनों पर जमी थी और नीचे की मिट्टी पर एक लकीर बनी थी — जैसे कोई उँगली से खींचकर बनाई हो।

गुड़िया आँगन में खड़ी थी, स्कूल का बैग अभी भी कंधे पर था। उसने मुझे देखा, मीरा को देखा, और कुछ बोले बिना अंदर चली गई।

मैं माँ के सामने खड़ा हो गया। पीछे मीरा थी, टिंकू दरवाज़े पर, कालू काका बाहर बरामदे में।

"माँ।"

उन्होंने सिर नहीं उठाया।

"माँ, मुझे कुछ पूछना है।"

"पूछ।" उनकी आवाज़ सूखी थी, जैसे चूल्हे की राख।

मेरा गला सूख गया। जो सवाल दिमाग़ में लेकर आया था, वो ज़ुबान पर आते ही अपना वज़न बदल गया।

"उस रात," मैंने कहा, "पापा की मौत के वक़्त… तुम भी वहाँ थीं?"

उनके हाथ से रोटी गिर गई। वो रोटी जो वो अभी चूल्हे पर रखने वाली थीं — गीली, बेलन से बेली हुई, और वो मिट्टी पर गिरी तो उस पर धूल लग गई।

माँ ने उस रोटी को उठाया नहीं। उन्होंने अपने हाथ अपनी जाँघों पर रखे और देर तक बैठी रहीं। मुझे लगा वो कुछ बोलेंगी। फिर मुझे लगा वो नहीं बोलेंगी।

फिर वो उठीं, दीवार के सहारे चलकर आँगन की चौखट पर बैठ गईं, और उन्होंने सामने नीम के पेड़ को देखा।

"हाँ," वो बोलीं। "मैं वहाँ थी।"

आँगन में सन्नाटा उतर गया। इतना गहरा कि मुझे अपनी साँस की आवाज़ सुनाई दे रही थी।

"मैं तुम्हारे पापा को बचाने आई थी," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो काँपन था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना। "रात को किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी। काग़ज़ का टुकड़ा था — 'आज रात अखाड़े में खेल होगा।' मैं समझ गई। मैंने तुरंत चप्पल पहनी और चल दी। रास्ते में मेरे पैरों से चप्पल उतर गई, पर मैं रुकी नहीं।"

वो रुकीं। गुड़िया अंदर से बाहर आकर दीवार के साथ बैठ गई थी, उसकी गोद में बैग था और वो बस देख रही थी।

"मैं जब पहुँची," माँ ने कहा, "तब भैरव तुम्हारे पापा के हाथ में गिलास पकड़ा चुका था। और तुम्हारे पापा उसे पी रहे थे। मैंने चीखकर कहा — 'रुक जाओ!' और मैं दौड़ी। मैंने गिलास छीनने के लिए हाथ बढ़ाया।"

उन्होंने अपना हाथ उठाया, जैसे अभी भी कुछ छीन रही हों। उनकी उँगलियाँ हवा में काँप रही थीं।

"पर गिलास खाली हो चुका था। आधा नीचे गिरा था, आधा उनके गले में था।"

माँ की आँखों से पानी निकला, पर वो रोई नहीं। वो ऐसे गिर रहा था जैसे किसी टपकती छत से बूँदें गिरती हैं — बिना आवाज़।

"तुम्हारे पापा ज़मीन पर बैठ गए। मैंने उनका सिर अपनी गोद में रखा। मैंने उनका चेहरा देखा। उनके होंठ हिल रहे थे। मैंने कान उनके मुँह के पास रखा।"

"क्या कहा था उन्होंने?" मेरी आवाज़ फट गई थी।

माँ ने मेरी तरफ़ पहली बार देखा। उनकी आँखों में वो सब था जो वो बीस साल से पी रही थीं।

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