Spirit of a Fighter – Chapter 805
सब पलटे। दरवाज़े पर भैरव खड़ा था। हाथ बँधे हुए, दो पुलिसवालों के बीच। पर उसकी आँखों में आज कुछ और था — शांति। और उस शांति में एक बात साफ़ लिखी थी, जो उसने बीस साल से किसी को नहीं कही थी।
॥
"हाँ, काफ़ी होगी।"
वो आवाज़ सुनकर भीड़ में जैसे ठंडा पानी फैल गया। लोग एक-दूसरे को देखने लगे, किसी को यकीन नहीं हो रहा था कि जो आवाज़ आई है, वो उसी मुँह से आई है जिसने बीस साल तक पूरे रामपुर को डर में रखा।
भैरव दो पुलिसवालों के बीच खड़ा था। कलाई पर जंजीर, कंधे थोड़े झुके, पर आँखें सीधी बात कर रही थीं। उसके चेहरे पर वो मीठी मुस्कान नहीं थी जो हर किसी को गुड़ की तरह चिपका लेती थी। आज उसका चेहरा सादा था, जैसे किसी ने उस पर से सारा पेंट उतार दिया हो।
माधव सिंह ने उसे देखा, और मैंने देखा कि उनके होंठ काँपे। बस एक पल। फिर उन्होंने खुद को सँभाला और वही पुरानी आवाज़ निकाली, जो पंचायत में गुड़ की तरह घुलती थी।
"मोहन," उन्होंने कहा। "बेटा, तुझे कुछ पता नहीं। ये लोग तुझे फँसा रहे हैं। तू चुप कर, मैं सँभाल लूँगा।"
भैरव हँसा। छोटी-सी हँसी, जिसमें हँसी कुछ नहीं थी।
"सँभाल लूँगा," उसने दोहराया। "बाप, तूने बीस साल में मेरे लिए एक बात कभी नहीं सँभाली। तूने बस एक काम किया — मेरे हाथ में बोतल थमाई और मुझे आगे कर दिया। जब किसी का बेटा मरता था, तो रोता कौन था? मैं। जब काग़ज़ पर हस्ताक्षर होते थे, तो नाम किसका आता था? मेरा। और तू कहाँ रहता था? तू उस कुर्सी पर बैठकर चाय पीता था, जिसकी गरमी आज तक मेरी पीठ में लगी है।"
पुलिसवालों ने उसकी बाँह पकड़ी, पर भैरव ने उन्हें रोका। उसने अपनी जेब की तरफ़ देखा।
"सर," उसने उनमें से बड़े वाले से कहा, जिसकी वर्दी पर तीन सितारे थे, "मेरी जेब में एक डायरी है। ज़रा निकालिए।"
अफ़सर ने हिचकिचाकर जेब में हाथ डाला और एक छोटी, हरी जिल्द वाली डायरी निकाली। जिल्द कहीं से जल गई थी, किनारे भूरे थे। डायरी पकड़ते ही मुझे गंध आई — पुराना काग़ज़, मिट्टी का तेल, और उसके नीचे कुछ कड़वा।
"ये हरनाम की है," भैरव ने कहा। "अठारह साल वो तेरे हिसाब के पीछे भागता रहा। हर पैसा, हर तारीख़, हर बोतल — सब इसमें है। और आख़िरी पन्ने पर उसने अपनी मौत लिख दी थी।"
अफ़सर ने डायरी खोली। भीड़ आगे बढ़ आई। मीरा मेरे बगल में आकर खड़ी हो गई, उसकी साँस धीमी थी, पर आँखें तेज़।
अफ़सर ने आख़िरी पन्ना पढ़ा। उसकी आवाज़ धीमी हो गई, जैसे किसी ने उसे ज़ोर से नहीं पढ़ने को कहा हो।
"क्या लिखा है, सर?" मीरा ने पूछा।
अफ़सर ने एक बार भैरव को देखा, फिर माधव को। उन्होंने जेब से रूमाल निकाला और माथा पोंछा।
"लिखा है," उन्होंने कहा, "कि मुझे मारने की ज़रूरत नहीं। मैं खुद मरूँगा। क्योंकि अगर मैं ज़िंदा रहा और अदालत में बोला, तो माधव सिंह का सब कुछ ख़त्म। और अगर मैं मर गया, तो वो मेरे परिवार को पाल देगा। मेरी बहन का रिश्ता उसने तय कर दिया है। मेरी माँ का इलाज उसके पैसे से चल रहा है।"
भीड़ में एक औरत रो पड़ी। मैंने पलटकर देखा — हरनाम की माँ थी, जो अब तक सबसे पीछे खड़ी थी, सिर पर दुपट्टा। वो अपने बेटे की मौत का रोना आज तक नहीं रोई थी, क्योंकि उसे बताया गया था कि बेटा "बीमारी से" गया।
अफ़सर ने पन्ना पलटा।
"और नीचे लिखा है — पीले रंग की शीशी। माधव सिंह के हाथ की बनी। मैंने एक बार उसे भैरव को देते देखा था, और उसके बाद मैंने कसम खाई कि मैं इस आदमी के लिए एक शब्द नहीं बोलूँगा। पर आज मैं बोल रहा हूँ। मुझे माफ़ कर देना, शेर सिंह भाई। तेरे बेटे को मैंने बचाया नहीं।"
मेरे अंदर कुछ टूटा। पापा का नाम आया — यहाँ, इस भीड़ के बीच, एक मरे हुए आदमी की पुरानी डायरी में, उसी हाथ से लिखा जो कभी उनके साथ खाता था।
माधव सिंह एक कदम पीछे हटे। पुलिसवाले उन्हें पकड़कर खींचने लगे, पर उन्होंने झटका देकर हाथ छुड़ाया और भैरव के सामने आ खड़े हुए। उनका चेहरा अब वो मीठा चेहरा नहीं था। दाँत दिख रहे थे।
"तू मेरे खिलाफ़ हो गया," उन्होंने कहा, आवाज़ फटी हुई। "मैंने तुझे क्या नहीं दिया? नाम, घर, रोटी, रुतबा। तू उस दिन से मेरा था जिस दिन तेरी माँ ने तुझे मेरी गोद में रखा था।"
भैरव ने उन्हें देखा। धीरे से।
"तूने मुझे नाम नहीं दिया, बाप। तूने मुझे ज़हर दिया। और नाम — मेरा असली नाम वो है जो मेरी माँ ने रखा था। मोहन। मेरी माँ के हाथ का नाम। जो तूने मुझसे छीन लिया था।"
उसकी आवाज़ आख़िरी शब्द पर रुक गई।
और फिर मैंने वो देखा जो मैंने भैरव के चेहरे पर कभी नहीं देखा था।
उसकी आँखें भर आईं। बड़ी, काली आँखें, जिनमें बीस साल से सिर्फ़ ठंडक थी — उनमें पानी आ गया। और वो पानी रुका नहीं, बह निकला, मूँछों के बीच से, ठुड्डी पर।
वो रो नहीं रहा था। वो बस खड़ा था, और आँसू अपने आप आ रहे थे, जैसे किसी बंद कुएँ से बरसात का पानी पहली बार ऊपर आया हो।
पूरी भीड़ चुप हो गई। इतनी चुप्पी कि मुझे अपनी साँस सुनाई देने लगी। सुक्खी बुआ, जो हर बात पर "अरे मैंने तो सुना है" से शुरू करती थीं, आज उनके मुँह से एक शब्द नहीं निकला। उन्होंने अपना पान का बीड़ा तक निकालना भूल दिया।
और तभी भीड़ के पीछे से किसी ने धक्का दिया।
"जगह दो," एक बूढ़ी आवाज़ आई। "मेरे बेटे के पास जाने दो।"
सब हट गए। कमला देवी आ रही थीं। सफ़ेद साड़ी, कंधे पर पुराना दुपट्टा, हाथ में लाठी। उनकी कमर झुकी हुई थी, पर चलने में ज़रा भी हिचक नहीं। जैसे बीस साल का इंतज़ार उनकी रीढ़ में भर गया हो।
वो भैरव के सामने आकर खड़ी हुईं। उसका हाथ पकड़ा। जंजीर उनकी उँगलियों के नीचे खटकी, पर उन्होंने छोड़ा नहीं।
"बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी, कोई ताना नहीं। बस थकान। "अब घर चल।"
भैरव ने उनकी तरफ़ देखा। उसका होंठ काँपा।
"माँ," वो बोला, और ये शब्द उसके मुँह से ऐसे निकला जैसे किसी ने बीस साल पुराना ताला खोला हो। "मैंने… मैंने तुझसे कभी नहीं पूछा कि तू कैसे रही। मुझे पता था तू अकेली है, और मैं तेरे पास नहीं आया, क्योंकि वो…" उसने माधव की तरफ़ देखा। "वो कहता था कि तेरे पास आया तो लोग कहेंगे कि भैरव का बस नहीं चलता।"
कमला देवी ने उसका हाथ अपनी दोनों हथेलियों में लिया।
"तुझे लोग नहीं, अपनी माँ का डर था," उन्होंने कहा। "पर मैं तेरी माँ हूँ। मैं आज भी तेरे कपड़े धोती हूँ, जो तू मेरे घर के बाहर कील पर टाँग देता है। तू सोचता है मुझे नहीं पता? हर महीने एक पोटली आती है, उसमें सब्ज़ी, तेल, दवा। किसी का नाम नहीं होता। मैं जानती हूँ कौन भेजता है।"
भैरव ने अपना सिर उनके कंधे पर रख दिया। एक बड़ा आदमी, बीस साल से जिसकी छाया से पूरा गाँव काँपता था — आज माँ के कंधे पर एक बच्चे की तरह। उसके कंधे हिल रहे थे।
भीड़ में से कोई फूट-फूटकर रो रहा था। औरतें अपनी आँखें पोंछ रही थीं। शंकर चाचा, जो अब तक अपने बेटे की छोटी हड्डी हाथ में लिए खड़े थे — उन्होंने वो हड्डी धीरे से अपनी जेब में रख दी, जैसे अब उसकी गवाही की ज़रूरत नहीं।
मैं वहीं खड़ा था, और मेरे गले में कुछ अटका हुआ था।
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