Spirit of a Fighter – Chapter 804
उसने माधव की तरफ़ देखा।
"माधव सिंह, आप गिरफ़्तार हैं।"
भीड़ में जो आवाज़ उठी, वो किसी एक की नहीं थी। वो पूरे गाँव की थी — बीस साल की चुप्पी का एक साथ टूटना।
माधव ने अपने काग़ज़ों का बंडल गिरा दिया। वो काग़ज़ ज़मीन पर बिखर गए, और हवा उन्हें उड़ाकर भीड़ के पैरों तक ले गई। एक औरत ने एक काग़ज़ उठाया और पढ़कर रो पड़ी।
और मैं वहीं खड़ा था। मेरी माँ मेरे सामने थीं, और उनके हाथों में वो डिब्बा था जिसमें बीस साल का दर्द बंद था।
मैंने उनकी तरफ़ हाथ बढ़ाया। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा।
"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँप रही थी। "आपने इतने साल…"
"भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है, बेटा," उन्होंने कहा, और उनकी आँखों में पानी था। "मैंने तेरे पापा से वादा किया था। आज वो पूरा हुआ।"
गुड़िया मेरी तरफ़ दौड़ी और मेरे पेट से लिपट गई। उसका रोना मेरे कपड़ों में धँस गया।
और पीछे, भैरव अब भी खड़ा था। पुलिसवाले उसके दोनों तरफ़ थे। पर उसकी नज़र माधव पर थी, जिसे अब दूसरे पुलिसवाले पकड़कर ले जा रहे थे।
माधव ने जाते-जाते एक बार पलटकर देखा। उनकी आँखें भैरव से मिलीं।
"मैंने तुझे अपना नाम दिया था," माधव ने धीरे से कहा।
"तुमने मुझे अपना ज़हर दिया था," भैरव ने जवाब दिया। "नाम नहीं।"
और माधव चले गए।
भैरव ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो शांति अब भी थी, पर उसके नीचे कुछ और भी था — थकान, बहुत पुरानी थकान।
"वीर सिंह," उसने कहा, "मैंने तेरे पापा को मारा। मैं उसका गुनाहगार हूँ। पर आज से पहले, एक बात सुन ले।"
वो रुका।
"तेरे पापा ने मरते वक़्त मेरा हाथ पकड़ा था। और उन्होंने कहा था — 'मोहन, तू बुरा नहीं है। तेरे हाथ काँप रहे थे।'"
मेरी साँस रुक गई।
"बीस साल मैंने यही सोचा," भैरव ने कहा। "कि जो आदमी मेरे हाथ काँपते देखकर भी मुझे बुरा नहीं कहता, वो कैसा आदमी था। और आज मुझे जवाब मिला। वो तेरे पापा थे।"
वो मुस्कुराया — पहली बार सच में मुस्कुराया, बिना किसी चाल के।
"अब मैं जाता हूँ। पर एक बात याद रखना। मेरे बाप का ज़हर खत्म नहीं हुआ है। वो सिर्फ़ बोतलों में नहीं था। वो उन काग़ज़ों में है, उन हस्ताक्षरों में है, और उन लोगों में है जो आज भी उसके नाम पर ज़िंदा हैं। तूने आज एक बोतल तोड़ी है। अभी बहुत सी बोतलें बाकी हैं।"
पुलिसवाले उसे ले चले। और भैरव जाते-जाते एक बार भी पीछे नहीं मुड़ा।
भीड़ धीरे-धीरे छँटने लगी। औरतें अपने बेटों की तस्वीरें लिए लौट रही थीं, बूढ़े अपनी लाठियाँ टेक रहे थे। सुक्खी बुआ सबसे आगे थीं, किसी को कुछ बता रही थीं, हाथ हिला रही थीं।
मैं चबूतरे की सीढ़ी पर बैठ गया। मेरे पैर नहीं सँभल रहे थे।
मीरा मेरे पास बैठी। उसने कुछ नहीं कहा। बस अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा, और उसके हाथ में वो गर्मी थी जो मेरे अंदर के ठंडेपन को पिघला रही थी।
टिंकू ने अपनी टोपी उतारी और उसे सीने से लगाया। "भाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ भर्राई हुई थी, "आज मैंने तेरे लिए कुछ नहीं बनाया। पर कल पक्का बनाऊँगा। और इस बार नमक नहीं डालूँगा।"
मेरे मुँह से हँसी निकली — थकी हुई, टूटी हुई, पर हँसी।
और तभी कालू काका मेरे सामने आए। उन्होंने लालटेन मेरे पास रखी।
"वीर," उन्होंने कहा, "मैं जानता हूँ कि मैंने तेरा भरोसा तोड़ा है। पर एक बात कहनी है।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"तेरे पापा ने उस रात मुझसे कहा था — 'कालू, मेरे बेटे को बता देना कि मैंने बोतल नहीं पी। मैंने सिर्फ़ अपने भाई का हाथ पकड़ा था।'"
मेरी आँखें भर आईं।
मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। उनकी लालटेन अब भी जल रही थी, हालाँकि बाहर दिन चढ़ आया था। आदत से मजबूर, शायद। या फिर उन्हें लगा कि अँधेरा अभी पूरा नहीं गया।
"काका," मैंने कहा, "आप उस रात वहाँ थे?"
उन्होंने सिर हिलाया। धीरे। जैसे कोई बोझ उठा रहे हों।
"मैं कुएँ के पास था। पानी भरने गया था। और मैंने देखा — ठाकुर साहब अपने भाई को खींच रहे थे। मोहन भैया का हाथ उनकी कमीज़ में फँसा था।" उनकी आवाज़ रुकी। "मैं भाग गया। मैं डर गया, बेटा। और वो डर बीस साल मेरे साथ रहा। हर रात मुझे वो हाथ दिखते थे।"
मैं कुछ नहीं बोला। गुस्सा आया, पर उस गुस्से में करुणा भी थी। कालू काका ने बीस साल अपने ही सीने में कैद काटी थी।
मीरा ने उनका हाथ थामा। "काका, आपकी गवाही काग़ज़ पर आनी चाहिए। आज ही।"
वो हाँ कह ही रहे थे कि पंचायत दफ्तर का चपरासी साँस फूलता हुआ आया। उसके हाथ में एक लिफ़ाफ़ा था, मुहर लगा हुआ।
"वीर सिंह?" उसने भीड़ में मुझे ढूँढा। "ये कल रात आया था। डाक से।"
मीरा ने लिफ़ाफ़ा फाड़ा। उसमें एक काग़ज़ था, और काग़ज़ पर माधव सिंह के हस्ताक्षर। मैंने पढ़ा — "वीर सिंह पर हरनाम की हत्या का आरोप। पुलिस जाँच तक मुकाबले से प्रतिबंध।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। माधव सिंह अभी गिरफ़्तार हुए हैं, और उनका काग़ज़ मुझे पहले ही मिल चुका है? कल रात का? मतलब उन्हें पता था। उन्होंने पहले ही तैयारी कर रखी थी।
"ये झूठ है," मीरा ने काग़ज़ पकड़कर कहा। उसकी आवाज़ में वो ठंडापन था जो मुझे अच्छी तरह पहचानता था। "हरनाम भैरव के ज़हर से मरा था। हमारे पास लैब रिपोर्ट है।"
पीछे से माधव सिंह की आवाज़ आई — पुलिसवाले उन्हें गाड़ी तक ले जा रहे थे, पर वो रुक गए। मुस्कुरा रहे थे, वही पुरानी मीठी मुस्कान।
"रिपोर्ट तुम्हारी है, बेटी," उन्होंने कहा। "तुम्हारी गवाही कौन मानेगा? तुम तो उस लड़के के साथ रहती हो।"
मेरे अंदर जोर का झटका लगा। सबके सामने। मैंने देखा, कुछ लोगों की नज़रें झुक गईं। शक का एक छोटा बीज — माधव ने बो दिया था, और वो मेरे सीने में चुभने लगा।
मैं बोलने ही वाला था कि मीरा आगे बढ़ गई।
"मेरी गवाही नहीं मानेंगे?" उसकी आवाज़ ऊँची हो गई, साफ़, जैसे अखाड़े की मिट्टी पर पहला दाँव। "तो रामदीन की मानेंगे? जो बीस साल से ज़िंदा था — और जिसे आपने कल रात कुएँ में फेंका?"
माधव की मुस्कान जैसे किसी ने पोंछ दी।
"रामदीन नहीं मरा," मीरा ने कहा, और भीड़ में सन्नाटा छा गया। "वो कुएँ में गिरा ज़रूर, पर उसकी फली हुई पसली आपके चेहरे की तरह ज़िंदा है। वो ठीक है। और वो बोलने को तैयार है।"
माधव के चेहरे से खून उतर गया। पुलिसवाले उनका हाथ पकड़कर खींचने लगे, पर मीरा रुकी नहीं। वो एक-एक करके गिनने लगी, उँगली पर।
"और जो पंद्रह आदमी आपके मुकाबलों से जीतकर गए और कभी लौटकर नहीं आए — उनकी हड्डियाँ कुएँ के पास से निकली हैं। कल रात। जब आप हमें बांध रहे थे, तब गाँव के लोग खोद रहे थे।"
भीड़ में से एक बूढ़ा आगे आया — शंकर चाचा, जिसका बेटा पाँच साल पहले "गायब" हो गया था। उसके हाथ में एक छोटी सी हड्डी थी, और वो कुछ नहीं बोला। बस माधव के सामने उसे रख दिया, जैसे कोई दलील रखता है।
माधव ने देखा। उनका गला सूख गया।
"और अगर ये काफ़ी नहीं," मीरा ने धीरे से कहा — इतने धीरे कि सब सुनने के लिए आगे झुक गए, "तो आपके अपने बेटे भैरव की गवाही काफ़ी होगी?"
माधव सन्न रह गए।
और ठीक उसी पल, पीछे से एक आवाज़ आई। धीमी, पर साफ़, जैसे किसी गहरे कुएँ से निकलती हुई।
"हाँ, काफ़ी होगी।"
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