Spirit of a Fighter – Chapter 803
उसने माधव की तरफ़ देखा। और माधव ने अपना मुँह फेर लिया — वो मुँह फेरना ही उसका पहला सच था।
"बोलो, बाप," भैरव ने कहा, और वो 'बाप' शब्द उसके मुँह से ऐसे निकला जैसे कोई राख में से अंगारा निकाले। "बीस साल मैंने तुम्हारे लिए बोतलें ढोईं। तुम्हारे लिए ज़हर घोला। तुम्हारे लिए अठारह लाशें गिनीं। और तुम आज कह रहे हो कि मैं तुम्हारा बेटा नहीं?"
माधव ने कुछ कहना चाहा, पर भैरव ने हाथ उठाया — बँधा हाथ, पर फिर भी हाथ।
"मैं आज यहाँ अपने लिए माफ़ी माँगने नहीं आया," भैरव ने कहा, और अब उसकी आवाज़ भीड़ की तरफ़ थी। "मैं आज यहाँ बीस साल का हिसाब देने आया हूँ।"
उसने पुलिसवाले की तरफ़ देखा। "मेरी जेब में एक काग़ज़ है। निकालो।"
पुलिसवाले ने काग़ज़ निकाला। भैरव ने भीड़ की तरफ़ बढ़ाया। "ये है अठारह नामों की सूची। तारीख़, रकम, और किसके हाथ से बोतल गई। और सबसे ऊपर —" वो रुका, और उसकी आवाज़ एक पल के लिए काँपी। "— सबसे ऊपर मेरे बाप का नाम है। माधव सिंह।"
भीड़ में एक आवाज़ उठी — किसी औरत की, फूट-फूटकर रोने की।
और मैंने देखा, मेरे सामने, एक आदमी जो अब तक मुस्कुरा रहा था, अब अपने ही हाथों से अपना चेहरा ढक रहा था।
पर भैरव अभी रुका नहीं। उसने आख़िरी बात कही, और उस आख़िरी बात ने मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन खिसका दी।
"और एक बात," भैरव ने कहा, और उसकी नज़र सीधे मुझ पर आई। "वीर सिंह, तेरे पापा की मौत की रात — मैं वहाँ था। मैंने बोतल खुद नहीं खोली। मेरे बाप ने खोली। पर जिसने उस रात सबसे पहले बोतल को हाथ लगाया, वो तीसरा आदमी था। और वो आज इस भीड़ में खड़ा है।"
मेरा दिल धड़कना रह गया।
"कौन?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ फटी हुई निकली।
भैरव ने भीड़ की तरफ़ देखा। और उसकी आँखें उस चेहरे पर रुकीं जो सबसे पीछे खड़ा था — गमछा लपेटे, हाथ में लाठी, जला हुआ चेहरा।
"तू बोल," भैरव ने कहा। "या मैं तेरा नाम ले लूँ?"
उस आदमी ने गमछा नीचे खींचा। उसका जला चेहरा सुबह की रोशनी में साफ़ दिखा। और वो धीरे से बोला, "मैंने हाथ नहीं लगाया। मैंने सिर्फ़ देखा।"
"पर तूने बताया किसी को नहीं," भैरव ने कहा। "बीस साल तक।"
"मैं डर गया था," उसने कहा, और उसकी आवाज़ बच्चे जैसी हो गई। "मैंने देखा कि बोतल किसके हाथ में है, और मैं भाग गया।"
मैं उसकी तरफ़ बढ़ा। मेरे पैर काँप रहे थे, पर मैं रुका नहीं। मैंने उसे कंधे से पकड़ा और पूछा, "किसके हाथ में?"
उसने मेरी आँखों में देखा। और फिर उसने धीरे से वो नाम कहा जो मैंने कभी सोचा भी नहीं था।
"कालू काका के हाथ में।"
मेरे हाथ ढीले पड़ गए।
मैंने पलटकर देखा। भीड़ में, सबके पीछे, कालू काका खड़े थे। उनकी सफ़ेद दाढ़ी हवा में हिल रही थी, और उनके हाथ में वो लालटेन थी जो उन्होंने कल रात मुझे दी थी। लालटेन अब बुझी हुई थी।
मेरी आँखें उनसे मिलीं। और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो उन्होंने कल रात मुझसे कही थी — "जो आदमी अपना डर बताता है, वो अब डर नहीं रहा।"
वो धीरे से आगे आए। और मेरे सामने आकर रुक गए।
"वीर," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ पहले से भी ज़्यादा धीमी थी, "मैंने तुझे अधूरा सच बताया था। मैंने कहा था कि मैंने भैरव को बोतल के साथ देखा और भाग गया। पर सच ये है कि उस रात बोतल पहले मेरे हाथ में आई थी।"
मेरे मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकली।
"मैंने उसे खोला," कालू काका ने कहा। "मैंने उसे सूँघा। और मैंने उसे वापस भैरव को दिया। क्योंकि मैं उस वक़्त समझ नहीं पाया कि ये क्या है। और जब समझा, तो तेरे पापा गिर चुके थे।"
उनकी आँखें भर आईं। "मैं बीस साल से इसी दिन का इंतज़ार कर रहा था, वीर। पर मैं कायर था। और कायर आदमी का इंतज़ार लंबा होता है।"
वो मेरे सामने झुक गए, लालटेन ज़मीन पर रखी, और उनके हाथ काँप रहे थे।
मैं वहीं खड़ा रह गया। मेरे अंदर कुछ टूट रहा था — वो भरोसा जो मैंने इस बूढ़े आदमी पर किया था। और मेरे अंदर कुछ और भी हो रहा था — एक दया, जो मुझे नहीं चाहिए थी, पर आ रही थी।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। टिंकू ने मेरा कंधा। किसी ने कुछ नहीं कहा।
और तभी माधव सिंह ने अपने हाथ चेहरे से हटाए। उनकी आँखें लाल थीं, पर उनके होंठों पर वो मुस्कान लौट आई थी — टूटी हुई, पर लौट आई थी।
"बहुत अच्छा," उन्होंने कहा, और आवाज़ में वो ज़हर भर लिया जो अब तक छिपा था। "बहुत अच्छा तमाशा किया तुम सबने। पर एक बात भूल गए। ये काग़ज़ पुलिस का है। और पुलिस सिर्फ़ मेरी सुनती है।"
उन्होंने पुलिसवालों की तरफ़ इशारा किया। "इन दोनों को हिरासत में लो। वीर सिंह पर हत्या का आरोप है, और भैरव पर ज़हर देने का। दोनों जेल जाएँगे। और पंचायत —" उन्होंने भीड़ की तरफ़ देखा, "— पंचायत आज भंग।"
दो पुलिसवाले आगे बढ़े। एक ने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया।
और तभी, भीड़ के सबसे पीछे से, एक आवाज़ आई — बूढ़ी, दुबली, पर ऐसी जिसमें बीस साल की चुप्पी टूट रही थी।
"रुको।"
सब पलटे।
मेरी माँ खड़ी थीं। उनके सिर पर सफ़ेद होती चोटी थी, माथे पर हल्दी का टीका, और हाथ में एक लोहे का डिब्बा। उनके पीछे गुड़िया थी, और गुड़िया के हाथ में एक काग़ज़ था जो काँप रहा था।
माँ आगे आईं। भीड़ उनके लिए फटती चली गई, जैसे नदी किसी पत्थर के लिए फटती है।
वो चबूतरे के सामने आकर रुकीं। उन्होंने पुलिसवाले की तरफ़ देखा, फिर माधव की तरफ़।
"मेरे बेटे को हाथ मत लगाना," उन्होंने कहा। आवाज़ धीमी, पर साफ़। "पहले ये सुन लो।"
उन्होंने लोहे का डिब्बा खोला। उसमें से काग़ज़ों की गड्डी निकली — पुरानी, पीली, कुछ जली हुई।
"ये हैं वो काग़ज़," माँ ने कहा, "जो मैंने बीस साल से अपनी अलमारी में छिपाकर रखे थे। हर बेटे की मौत का काग़ज़। हर काग़ज़ पर एक ही हस्ताक्षर।"
उन्होंने सबसे ऊपर का काग़ज़ उठाया और भीड़ की तरफ़ बढ़ाया।
"माधव सिंह के हस्ताक्षर।"
माधव ने एक कदम पीछे रखा।
"और ये," माँ ने कहा, और गुड़िया के हाथ से काग़ज़ लिया, "ये है उस रात का काग़ज़, जिस रात मेरे पति मरे। इस पर लिखा है — 'शेर सिंह, बुख़ार से मृत्यु।' पर नीचे, इसी काग़ज़ के कोने पर, किसी ने छोटे अक्षरों में लिखा है — 'माधव ने कहा, चुप रहो।'"
माँ की आवाज़ एक पल के लिए रुकी। फिर वो भरी।
"ये लिखाई मेरे पति की है। मरते वक़्त उन्होंने ये काग़ज़ अपनी मुट्ठी में दबा लिया था। और मैंने बीस साल इसे छिपाकर रखा, क्योंकि मैं डरती थी कि मेरे बच्चों का क्या होगा।"
वो माधव की तरफ़ मुड़ीं।
"आज मेरा बेटा यहाँ खड़ा है, और मैं अब नहीं डरती।"
उन्होंने काग़ज़ माधव की तरफ़ फेंका। काग़ज़ हवा में लहराया और माधव के पैरों पर गिरा।
माधव ने उसे देखा। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
और तभी एक पुलिसवाले ने, जो अब तक चुप खड़ा था, अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला और अपने साथी की तरफ़ देखा।
"ये मेरे पास सुबह ही आया था," उसने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी थी। "ऊपर से हुक्म था कि पंचायत से पहले न खोलूँ।"
उसने काग़ज़ खोला।
"ये है असली हुक्मनामा। वीर सिंह पर कोई आरोप नहीं है। आरोप है — माधव सिंह पर। ज़हर देने का, रिकॉर्ड में हेराफेरी का, और हत्या में मदद का।"
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