Spirit of a Fighter – Chapter 801
सुक्खी बुआ ने मुझे देखा। वो हमेशा हर बात में मज़ा लेती थीं, पर उस वक़्त उनके चेहरे पर कुछ और था। जैसे उन्हें भी याद आ गया हो कि उनके ही गाँव में कोई अपने बेटे को खो चुका है।
"मैं कह दूँगी," उन्होंने कहा। "पर वीर, एक बात। मैंने सुना है कि ठाकुर ने पंचायत में एक और गवाह रखा है। कोई है जो तेरे खिलाफ़ बोलेगा। और वो कोई और नहीं, तेरा अपना गाँव वाला है।"
मेरी छाती में एक ठंडी सुई चुभी।
"कौन?" मैंने पूछा।
सुक्खी बुआ ने पान का बीड़ा मुँह में घुमाया। फिर उन्होंने धीमे से कहा, "मुंशीजी का बेटा। जो तेरे साथ लड्डू बनाने वालों में से एक था।"
मैं चुप हो गया। टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। और मैंने आसमान की तरफ़ देखा, जो अब सफ़ेद हो रहा था।
सुबह होने वाली थी। और उस सुबह, सिर्फ़ मैदान नहीं, पंचायत का चबूतरा भी मेरा इंतज़ार कर रहा था।
मैंने अपनी मुट्ठी खोली और उसमें रखी वो पीतल की चाबी देखी, जो हरनाम ने अपनी मुट्ठी में पकड़ी थी। उस पर त्रिकोण और बिंदु का निशान था। जो भी ताले इस चाबी से खुलते थे, वो सच हमारे हाथ में थे।
"चलो," मैंने कहा। "मुंशीजी के घर।"
टिंकू ने अपनी टोपी ठीक की। "और अगर वो न खोले?"
"तो दरवाज़ा खुद खुलेगा," मैंने कहा। "या फिर हम उसे तोड़कर खोलेंगे। आज किसी की चुप्पी हमें नहीं रोक सकती।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरे हाथ को दबाया। और हम उस सुबह की तरफ़ चल पड़े, जिसमें मुझे पता था कि मैं सिर्फ़ अपनी जान के लिए नहीं लड़ूँगा — उन सबके लिए लड़ूँगा जो बीस साल से चुप थे।
पर जब हम आँगन से बाहर निकले, तो मेरी नज़र फिर अखाड़े की दीवार पर पड़ी। चूने की लिखाई अब सूख चुकी थी। पर उसके नीचे, ज़मीन पर, किसी ने ताज़ा मिट्टी से एक छोटा-सा तीर बनाया था, जो नहर की तरफ़ इशारा कर रहा था। और उस तीर की नोक पर एक पीला फूल रखा था — वही फूल जो माँ तुलसी के चौरे पर चढ़ाती थीं।
मेरे पैर रुक गए। मैंने झुककर फूल उठाया और उसे सूँघा। उसमें माँ के हाथों की हल्दी थी, और उसके नीचे, बहुत हल्का-सा, वही कपूर।
मैंने फूल अपनी मुट्ठी में भींच लिया और नहर की तरफ़ देखा। सुबह की पहली किरण पानी पर पड़ रही थी। और वहीं कहीं, उस किनारे पर, कोई मेरा इंतज़ार कर रहा था।
"ये माँ का इशारा है," मैंने धीमे से कहा। "वो मुझे कुछ बताना चाहती है। और पंचायत से पहले मुझे उसे सुनना है।"
टिंकू ने मेरे हाथ से फूल देखा। उसका चेहरा गंभीर हो गया। "तो पहले नहर, फिर मुंशीजी?"
"नहीं," मैंने कहा। "पहले मुंशीजी। क्योंकि अगर माँ ने नहर पर बुलाया है, तो इसका मतलब वो जानती है कि पंचायत में क्या होने वाला है। और मुझे उससे पहले मुंशीजी का दरवाज़ा खोलना है।"
मैंने फूल अपनी जेब में रखा और तेज़ कदमों से चल पड़ा। सुबह की हवा ठंडी थी और मेरे नंगे पैरों के नीचे मिट्टी गीली थी।
पर जैसे ही हम गली के मोड़ पर पहुँचे, सामने से एक परछाई आई। एक आदमी, सिर पर गमछा लपेटे, हाथ में लाठी। उसने हमें देखा और रुक गया।
और फिर उसने धीरे से कहा, "वीर सिंह? मैं तेरे पापा का दोस्त हूँ। तुझे पंचायत में नहीं जाना चाहिए। ठाकुर ने वहाँ तेरे लिए एक जाल बिछाया है — हत्या के केस की काग़ज़ात के नीचे, उसने तेरी माँ के खिलाफ़ भी काग़ज़ रखवा दिया है। अगर तू पंचायत में गया, तो तेरी माँ और तू, दोनों फँस जाओगे।"
मैं रुक गया। मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए। और सुबह की रोशनी में, मैंने उस आदमी का चेहरा देखा — जला हुआ, पहचाना हुआ, और उसकी आँखों में वो डर था जो बीस साल से किसी ने नहीं देखा था।
"तो फिर रास्ता क्या है?" मैंने पूछा।
उसने लाठी ज़मीन पर टेकी और धीमे से कहा, "रास्ता एक ही है। पंचायत से पहले, ठाकुर के गोदाम का ताला खोलो। वहाँ जो है, वो पंचायत में सबके मुँह बंद कर देगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। और मेरे दिल ने कहा कि ये आदमी झूठ नहीं बोल रहा। पर मेरा दिमाग़ कह रहा था कि आज हर रास्ता जाल भी हो सकता है।
॥
उस आदमी की बात मेरे कानों में रह गई, पर मैंने उसे वहीं छोड़ दिया। पंचायत से पहले गोदाम का ताला खोलना — ये बात मेरे दिल को जँची नहीं। जो आदमी बीस साल से छिपा फिर रहा है, वो आज अचानक रास्ता क्यों दिखाने आ गया? मैंने मन में ठान लिया — पहले मुंशीजी। गोदाम बाद में।
हम गली के मोड़ से तेज़ चल पड़े। मेरे नंगे पैरों में गीली मिट्टी चिपक रही थी, और सुबह की हवा में कोई गड़बड़ थी। ऐसी गड़बड़ जो पेट में हल्की-सी मरोड़ बनकर बैठ जाती है।
टिंकू मेरे पीछे-पीछे आ रहा था, हाँफते हुए। "भाई, एक बात कहूँ?"
"बोल।"
"जब से तेरी नाक ने ये काम शुरू किया है, मेरी टाँगें कभी नहीं थकीं, पर मेरी साँस ज़रूर फूल गई है।"
मीरा ने बिना मुड़े कहा, "टिंकू, अपनी साँस संभाल। अभी तो शुरुआत है।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से बड़बड़ाया, "ये मैडम जब ऐसे बोलती हैं, तो लगता है कोई जज का हथौड़ा मार रहा हो।"
मेरे मुँह से हँसी निकल गई, पर वो हँसी ज़्यादा दूर नहीं गई। क्योंकि सामने पंचायत का चबूतरा दिखने लगा था, और वहाँ भीड़ जमा थी। इतनी सुबह। इतनी भीड़। मेरे पेट की मरोड़ तेज़ हो गई।
मैंने मीरा का हाथ पकड़ा। "रुक।"
वो रुकी। "क्या हुआ?"
"सूंघो," मैंने कहा, और फिर खुद अपनी गलती पर हँस दिया। "मतलब — मैं सूंघ रहा हूँ। भीड़ में बहुत तेल है। लालटेन का तेल। ऐसा तेल सिर्फ़ उसके आदमियों के पास रहता है। दस-बारह आदमी होंगे।"
मीरा का चेहरा सख़्त हो गया। "तो वो पहले से तैयार है।"
"हाँ," मैंने कहा। "पर तैयारी वाला आदमी डरता भी है। चलो, उसका डर देख लें।"
हम चबूतरे की तरफ़ बढ़े। भीड़ ने रास्ता दिया, पर वो रास्ता कोई इज़्ज़त वाला नहीं था। एक-दो आदमी मुँह फेरकर खिसक गए। एक बुढ़िया ने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से बोली, "बेटा, ये आदमी तो शेर सिंह का बेटा है।" कोई उसे चुप करा रहा था।
मेरी छाती में एक चीज़ घूँट भर रही थी। पर मैंने कदम रोका नहीं।
चबूतरे पर माधव सिंह खड़े थे। सफ़ेद कुर्ता, कंधे पर अंगोछा, हाथ में काग़ज़ों का बंडल। और चेहरे पर वो मुस्कान जो मुझे बचपन से चिढ़ाती आई थी — जैसे कोई गाय का दूध देकर उसका बछड़ा भी साथ दे दे।
"आ गए," उन्होंने कहा, इतनी खुशी से जैसे शादी में बारात का इंतज़ार कर रहे हों। "वीर सिंह। आ जाओ, बैठो। पंचायत तुम्हारी ही राह देख रही थी।"
मैंने कोई जवाब नहीं दिया। मीरा आगे आई।
"ये क्या है?" उसने काग़ज़ों की तरफ़ इशारा किया।
माधव ने काग़ज़ ऊपर उठाया और सबको दिखाया। भीड़ में एक जैसी साँसें रह गईं।
"ये है पुलिस का हुक्मनामा," उन्होंने कहा, आवाज़ में वो माप जो चीखने से भी ज़्यादा बोलती है। "वीर सिंह पर आरोप है हरनाम ठेकेदार की हत्या का। हरनाम की लाश अखाड़े में मिली, वीर का हाथ उसके मुँह से झाग पर था — कई लोगों ने देखा। तो जाँच पूरी होने तक वीर सिंह अखाड़े की किसी भी कुश्ती में नहीं उतरेगा। भारत केसरी का मुकाबला भी उसके लिए बंद।"
भीड़ में फुसफुसाहट फैल गई। किसी ने कहा, "हमने तो देखा था, वो ज़हर की बात कर रहा था।" किसी ने कहा, "बीस साल में जो हुआ, वो अब होगा क्या?"
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