Spirit of a Fighter – Chapter 800
वो मीरा की तरफ़ देख रहे थे। मीरा की आँखें भर आई थीं। वो उनके पास गई और उनके व्हीलचेयर के पास घुटनों के बल बैठ गई।
रणवीर सिंह ने अपना हाथ उठाया और उन्होंने मीरा के सिर पर हाथ रखा। धीरे से सहलाया। मैंने उनके हाथ देखे — बड़े, चौड़े, काँपते हुए हाथ। जो पहलवान के हाथ थे, पर अब उनमें सिर्फ़ हड्डियाँ और झुर्रियाँ बची थीं।
"तू मेरी बेटा है, बेटी नहीं," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ भर आई थी। "तूने मेरी तरफ़ से जो हिम्मत दिखाई है, वो मैंने अपने पूरे पहलवानी के ज़माने में नहीं दिखाई। मैंने अपने गुरु को, अपने दोस्त को, अपने पैरों को — सबको खोया, और चुप रहा। पर तूने किसी को नहीं खोया। तूने लड़कर छीना है।"
मीरा ने अपना सिर उनके घुटनों पर रख दिया। उसके कंधे काँप रहे थे। वो रो रही थी — चुपचाप, बिना आवाज़ के। और रणवीर सिंह उसके सिर पर हाथ रखे चुपचाप बैठे रहे।
मैं वहीं खड़ा था। मेरा गला भर आया। मैंने अपना मुँह दूसरी तरफ़ कर लिया, पर तभी मेरी नज़र टिंकू पर पड़ी। वो बरामदे के दरवाज़े के पास खड़ा था, और उसकी आँखें भी गीली थीं। उसने मेरी तरफ़ देखा और मुस्कुराने की कोशिश की, पर मुस्कान आधी बनकर रह गई।
उस पल मुझे अपनी माँ याद आई। चक्की पर बैठी, कमर पकड़े, सुबह चार बजे उठकर आटा पीसती हुई। और मुझे लगा कि अगर आज रात कुछ हो गया, तो मैं उससे कभी ये नहीं कह पाऊँगा कि मैंने उसे आराम से बैठते हुए देखने का सपना देखा था।
मैं बाहर आया। आँगन में तुलसी के चौरे के पास खड़ा हो गया। आसमान अब थोड़ा और खुल रहा था। मेरे हाथ ठंडे थे और मेरे पैर नंगे थे — मुझे याद आया कि मैं चप्पलें पहनना भूल गया था।
टिंकू मेरे पास आया। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"क्या बात है, भाई?" उसने धीमे से पूछा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी टोपी टेढ़ी थी और उसके कान के पीछे वाली पेंसिल अब भी थी। वो मेरा दोस्त था। वो आज भी टोपी लगाकर घूम रहा था, जैसे दुनिया में कोई तूफ़ान नहीं आया।
"टिंकू," मैंने कहा। "कल मुकाबले के बाद मुझे कुछ कहना है मीरा से।"
टिंकू ने पहले मेरी तरफ़ देखा, फिर उसके चेहरे पर एक हँसी फूटी — छोटी-सी, समझने वाली। "कह देना भाई। कह देना। पर पहले जीत लेना। हारकर प्यार का इज़हार करने में मज़ा नहीं आता।"
मैं हँसा। पहली बार उस रात। "तू मीरा से कम है क्या? मुझे सलाह दे रहा है।"
"मैं तो रसोइया हूँ," टिंकू ने सीना फुलाकर कहा। "मुझे हर चीज़ का तड़का लगाना आता है। प्यार का भी।"
तभी बाहर गली से आवाज़ आई। कई पैरों की। दौड़ते हुए। और उसके साथ सुक्खी बुआ की चमकीली आवाज़, जो अभी-अभी किसी बड़ी खबर के साथ आ रही थी।
मैं दरवाज़े की तरफ़ भागा। आँगन के फाटक पर सुक्खी बुआ खड़ी थीं, साड़ी का पल्लू कंधे पर, हाथ में पान का बीड़ा, और चेहरा सफ़ेद। उनके पीछे पूरा गाँव इकट्ठा हो रहा था — मर्द, औरतें, बच्चे, सब।
"अरे मैंने तो सुना है…" सुक्खी बुआ ने हाँफते हुए कहा। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और उनकी आवाज़ अचानक धीमी हो गई, जैसे वो खुद नहीं चाहती थीं कि ये बात कहें। "अखाड़े का मुकाबला रद्द। ठाकुर ने पंचायत से काग़ज़ निकलवा दिया है। कहता है वीर के नाम पर हत्या का केस है!"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"कौन-सी हत्या?" टिंकू ने आगे आकर पूछा। उसकी आवाज़ तेज़ थी।
सुक्खी बुआ ने हाथ में पकड़ा पान का बीड़ा मुँह में डाला और फिर बोलीं, "हरनाम की। कहते हैं कि हरनाम को वीर ने ही मारा। ठाकुर के आदमी ने काग़ज़ पर गवाही दी है कि उसने वीर को हरनाम के कमरे से निकलते देखा था। और मुंशीजी का नाम भी उसमें है। मुंशीजी ने कहा है कि वीर ने हरनाम से झगड़ा किया था।"
मेरे कानों में गूँज शुरू हो गई। हरनाम। वो आदमी जो भैरव के ज़हर से मरा था। जिसकी मुट्ठी में पीतल की चाबी थी। जिसने अपनी मौत से पहले वो काग़ज़ छोड़ा था जिसमें भैरव का असली नाम लिखा था।
"ये सरासर झूठ है," मीरा ने कहा। वो अंदर से आई थी और उसने सब सुन लिया था। उसकी आँखें अब सूखी थीं, और उनमें वो ज़िद लौट आई थी जो मैं जानता था। "हरनाम भैरव के ज़हर से मरा था। हमारे पास उसका काग़ज़ है।"
"पर पंचायत के सामने काग़ज़ कौन ले जाएगा?" सुक्खी बुआ ने पूछा। उनकी आवाज़ में अब फुसफुसाहट थी, जैसे वो डर रही हों। "ठाकुर ने सुबह के मुकाबले की जगह अब पंचायत बुला ली है। कहता है — सुबह दस बजे, चबूतरे पर, हत्या का फ़ैसला सुनाया जाएगा। और उसने ये भी कहा है कि अगर वीर पंचायत से पहले भागने की कोशिश करेगा, तो उसकी माँ और बहन को हिरासत में ले लिया जाएगा।"
मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए। मैंने अपनी साँस रोक ली। मैंने सुक्खी बुआ के पीछे खड़े लोगों को देखा। कुछ औरतें अपनी आँखें फेर रही थीं। कोई बूढ़ा आदमी सिर झुकाए खड़ा था, जिसने शायद अपने बेटे को अखाड़े में खोया था। और माधव सिंह के दो आदमी, जो दूर नीम के पेड़ के नीचे खड़े थे, मुस्कुरा रहे थे।
"ये ठाकुर की चाल है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "वो मुकाबले से डरता है। इसलिए उसने पहले ही पंचायत बुला ली, ताकि मैं मैदान तक न पहुँच सकूँ।"
"तो तू पंचायत में जाकर ये बात कह दे," सुक्खी बुआ ने कहा। "और सबको सच दिखा दे। पर एक बात कहूँ, बेटा — पंचायत का दरवाज़ा अब ठाकुर के आदमी पहरा दे रहे हैं। वहाँ सिर्फ़ वही जा सकता है जिसे वो बुलाए।"
"तो मुझे बुलवाना पड़ेगा," मैंने कहा।
"कैसे?" टिंकू ने पूछा।
मैंने पीछे मुड़कर देखा। रणवीर सिंह व्हीलचेयर पर बरामदे के दरवाज़े पर आ चुके थे। उनकी आँखें मुझ पर टिकी थीं। और उनके चेहरे पर वो भाव था जो मैंने कभी नहीं देखा — एक पहलवान का भाव, जो अपनी आख़िरी चाल चलने वाला हो।
"पंचायत सरपंच की होती है," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ में वो गरज थी जो दूर तक सुनाई देती थी। "और माधव सिंह सरपंच हैं। पर मैं रामपुर का सबसे बुज़ुर्ग पहलवान हूँ। मुझे पंचायत में बोलने का हक़ है। और मैं कल वहाँ जाऊँगा।"
"पापा—" मीरा ने फिर कहना चाहा।
"चुप, बेटा," उन्होंने कहा। पर इस बार उनकी आवाज़ में डाँट नहीं थी, बस एक थकी हुई मुस्कान। "मैंने बीस साल तुम्हें बचाया है। अब मुझे खुद को बचाने दो।"
वो अपनी व्हीलचेयर घुमाकर अंदर ले गए। पर फिर वो रुके और उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"वीर," उन्होंने कहा। "एक बात याद रख। पंचायत में सच बोलने के लिए हिम्मत चाहिए, पर उसे साबित करने के लिए दिमाग़। सुबह से पहले हमें हरनाम की मौत का सच जुटाना है। जो काग़ज़ उसने छोड़ा था, वो कहाँ है?"
"मेरे पास," मीरा ने कहा।
"तो ले आओ। और उस पीतल की चाबी भी। और मुंशीजी को भी ले आओ — वो गवाही देगा कि हरनाम का शरीर कैसा था।"
मैंने सिर हिलाया। मेरे अंदर कुछ बदल रहा था। डर अब भी था — मेरे पेट में, मेरी छाती में। पर उसके ऊपर एक और चीज़ आ गई थी। वो गुस्सा जो मुझे कल सुबह मैदान में ले जाना था, अब पंचायत में ले जाएगा।
मैंने पीछे मुड़कर सुक्खी बुआ को देखा। "बुआ, आप गाँव वालों से कह दीजिए — जो सुबह पंचायत आना चाहे, आए। पर उन्हें सच सुनना पड़ेगा। चाहे वो कितना भी कड़वा हो।"
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