Spirit of a Fighter – Chapter 796
वो रुका। साँस लेने के लिए। साँस ऐसी आ रही थी जैसे किसी छेद से हवा खींच रही हो।
"क्या कह रहा था?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ भी फुसफुसाहट थी।
"कह रहा था — 'मुकाबले से पहले वीर का नाम कटवा दो। और अगर न कटे, तो उसकी माँ का नाम कटवा दो।'" रामदीन ने मेरी तरफ़ देखा। "मैंने ये सुना, तो मैं चुप नहीं रह सका। बीस साल की चुप्पी एक पल में टूट गई। मैं चिल्लाया। मैंने कहा — 'तू बेटे को नहीं, माँ को मारेगा? तेरी माँ भी थी कभी।'"
"और फिर?"
"और फिर," रामदीन ने कहा, और उसके होंठों पर एक टेढ़ी मुस्कान आई, जो बहुत दुखी थी, "ठाकुर हँसा। बोला — 'बूढ़े, तेरी ज़ुबान खुल गई। अब तू इस कुएँ में सड़ेगा।' दो आदमी मुझे घसीटकर लाए। मैंने चिल्लाने की कोशिश की, पर तब तक मेरा गला…"
उसने गर्दन पर हाथ फेरा। उस निशान पर।
"और बीस साल से तू यहाँ बंद था?" मैंने कहा। "ऊपर कमरे में?"
"वहाँ मैं हवा में ज़िंदा था," उसने कहा। "यहाँ पानी में मर रहा हूँ। फर्क यही है।"
मैंने अपनी आँखें बंद कीं। एक पल के लिए। और फिर खोलीं।
"रामदीन काका, मैं तुम्हें ऊपर ले चलता हूँ। अभी।"
उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा आया जो मैंने किसी बूढ़े की आँखों में नहीं देखा था। शुक्रिया नहीं। भरोसा नहीं। कुछ और। जैसे किसी को लंबे समय बाद अपना नाम याद आ गया हो।
"बेटा," उसने कहा, और आवाज़ भर्रा गई, "मैं बीस साल इस तहखाने में सड़ा। बीस साल। मैंने अपने बेटे का चेहरा भुला दिया, बेटा। मुझे याद नहीं वो कैसा दिखता था। बस इतना याद है कि उसके बाएँ कान के पीछे एक तिल था।"
उसकी आँखों से पानी बहा। सूखे गालों पर। और वो पानी काई जैसी दाढ़ी में चला गया।
"अब मरने से पहले एक बात कहना चाहता हूँ," उसने कहा। "एक ही बात। और फिर मैं चुप हो जाऊँगा।"
"कहो," मैंने कहा।
उसने मेरा हाथ पकड़ा। दोनों हाथों से। और उसकी उँगलियाँ काँप रही थीं — जैसे कोई बच्चा ठंड में काँपता है।
"तेरे पापा," उसने कहा। "शेर सिंह। उस रात मैं भी वहाँ था।"
मेरा पूरा शरीर जम गया।
"मैं चौकीदार था। मैंने देखा कि भैरव गिलास में कुछ डाल रहा है। मैंने शोर मचाना चाहा। पर तब तक तेरे पापा ने मुझे देख लिया था। उन्होंने आँखों से इशारा किया — 'चुप रह।' मैं चुप रहा। और फिर…"
उसकी आवाज़ रुकी। उसने आँखें भींच लीं।
"और फिर जब सब ख़त्म हो गया, जब तेरे पापा ज़मीन पर गिर रहे थे, तब उन्होंने मुझे पास बुलाया। मैं गया। वो मेरे कान के पास आए। और बोले — 'रामदीन, अगर तू ज़िंदा बचा, तो मेरे बेटे को बताना — उसका बाप ईंट का था, पर उसका बेटा हीरे का होगा।'"
मेरे गले में कुछ अटक गया। मैंने उसे निगलने की कोशिश की। नहीं गया।
"फिर वो मुझे घसीटकर उस कोने में ले गए," रामदीन ने कहा, और उसकी आवाज़ अब भर्राई हुई थी, "जहाँ एक टूटा हुआ तख़्त था। उन्होंने मुझे वहाँ छुपाया। अपनी जान देकर मुझे छुपाया। क्योंकि उन्हें पता था कि अगर मैं गवाही दूँगा, तो सच बाहर आएगा। और सच सामने आने से पहले उन्हें मेरी जान बचानी थी।"
वो रुका। उसकी साँस फूल रही थी। मैंने उसे पानी दिया। उसने एक घूँट लिया और फिर मेरी तरफ़ देखा।
"तेरे पापा ने मेरी जान बचाई," उसने कहा। "और मैंने बीस साल उस जान को इस कुएँ में सड़ाया। हर दिन सोचता — काश मैं उस रात चिल्ला दिया होता। काश।"
"तुमने कुछ नहीं किया," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँप रही थी। "तुमने जो किया, वो—"
"मैंने कुछ नहीं किया," उसने कहा। "यही मेरा गुनाह है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वो थकान थी जो सिर्फ़ उन लोगों के चेहरों पर होती है जो बहुत लंबे वक़्त तक अकेले रहे हों। और मेरे दिल में कुछ ऐसा हुआ — गुस्सा? नहीं। कुछ और। जैसे किसी ने मेरी छाती में एक हाथ रख दिया हो और हल्के से दबा दिया हो।
मैंने उसके हाथ अपने हाथों में लिए। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर अब मेरे हाथों की गर्मी उनमें जा रही थी।
"अब सुनो मेरी बात," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो बात थी जो मैंने खुद कभी नहीं सुनी थी — किसी बूढ़े के सामने बोलते हुए मुझे लगा जैसे मैं अपने पापा से बोल रहा हूँ। "तुम्हारा गुनाह नहीं है। गुनाह उसका है जिसने ज़हर दिया। और उसका भी है जिसने बीस साल तुम्हें इस अंधेरे में ज़िंदा रखा। अब तुम बाहर आओगे, और मेरे साथ खड़े होकर वो सब बताओगे जो तुमने सुना।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ चमका। जैसे अंधेरे कमरे में दूर कहीं एक दीया जला हो।
"मैं बाहर आ सकता हूँ?" उसने पूछा। आवाज़ में बच्चे जैसी हैरानी थी। "सच?"
"सच," मैंने कहा।
मैंने रस्सी नीचे झुलाई, जो मैंने अपने साथ लाई थी — पतली, पर मज़बूत। दो बार उसकी कमर के चारों तरफ़ घुमाया और गाँठ लगाई। अपनी कमर से एक और रस्सी निकाली। दोनों को जोड़ा।
"अब तुम्हें ऊपर खींचेंगे," मैंने कहा। "ऊपर मेरे दोस्त हैं। तुम्हें देखकर डरेंगे नहीं। तुम बस अपने हाथ से रस्सी पकड़े रहना। समझे?"
उसने सिर हिलाया। फिर उसने मेरी कलाई पकड़ी — फिर से। इस बार हल्के से।
"तू… तू शेर सिंह का बेटा है?" उसने पूछा।
"हाँ," मैंने कहा।
उसने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक। और फिर उसके होंठ हिले, और आवाज़ ऐसी निकली जैसे किसी सूखे कुएँ से पानी निकल रहा हो।
"तेरे पापा जैसा चेहरा है," उसने कहा। "वैसी ही आँखें। वो भी ऐसे ही देखते थे — जैसे सब कुछ देख लिया हो, पर कुछ कहते न हों।"
मेरी आँखें जलने लगीं। मैंने उन्हें रगड़ा — ज़ोर से। जैसे कोई धूल गई हो।
"ऊपर चलो," मैंने कहा, और आवाज़ जान-बूझकर सख़्त रखी। "बहुत काम बाकी है।"
मैंने रस्सी हिलाई। दो बार। ऊपर टिंकू का सिर दिखा — अंधेरे में एक छोटा काला धब्बा।
"खींचो!" मैंने चिल्लाया। "धीरे-धीरे।"
रस्सी तन गई। रामदीन का शरीर हिला, और फिर वो धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा। मैंने उसका कमर पकड़ा, संभाला, और जब वो मेरे हाथ से निकल गया, तब मैं वहीं खड़ा रह गया — अंधेरे में, अकेला।
मैंने चारों तरफ़ देखा। पानी की धार। दीवार पर काई। और कोने में एक टूटा हुआ तख़्त।
मैं उस तख़्त के पास गया और झुका।
नीचे मिट्टी थी। गीली। और उस मिट्टी में कुछ गड़ा था।
मैंने हाथ डाला। कुछ ठंडा छुआ। लोहे जैसा।
मैंने खींचा। एक छोटा लोहे का डिब्बा निकला — ज़ंग लगा हुआ, छोटा, ताला टूटा हुआ। मैंने उसे खोला।
अंदर एक कपड़े में लिपटी चीज़ थी। मैंने कपड़ा खोला।
एक पुरानी घड़ी। टूटी हुई। और उसके नीचे एक काग़ज़ — सूखा, पीला, मोड़ा हुआ।
मैंने काग़ज़ खोला। लिखाई मेरी पहचानी हुई थी। रघुवीर की।
बस तीन लाइनें थीं।
"जो बोतल मैंने बनाई, वो शरीर नहीं, आदमी का लालच खाती है। जो इसे पीएगा, वो अपनी ताकत से ज़्यादा तेज़ भागेगा — और अपनी उम्र से पहले बूढ़ा होगा।"
और नीचे, छोटे अक्षरों में:
"अगर ये काग़ज़ कभी किसी और ने पढ़ा, तो मतलब मैं नहीं रहा। और अगर मैं नहीं रहा, तो मेरा बेटा मेरी मिट्टी में होगा। उससे कहना — बदला खून से नहीं, सच से लेना।"
मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने काग़ज़ को सीने से लगाया। कुछ पल के लिए।
फिर मैंने उसे सँभालकर कमर में खोंसा, और रस्सी पकड़कर ऊपर देखा।
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