Spirit of a Fighter – Chapter 795
"रामदीन काका," मैंने कहा। "मुझे पता है तुम सुन रहे हो। मैं वादा करता हूँ — आज रात जो भी हो, मैं उस कमरे का ताला खोलकर ही रहूँगा। तुम्हारे बीस साल का हिसाब मैं वसूल करूँगा।"
रामदीन की आँखों से पानी बहता रहा। उसके होंठ हिले। कुछ बोलने की कोशिश की, पर आवाज़ नहीं निकली।
मैं उठा।
और तभी कुएँ के अंदर से एक आवाज़ आई। धीमी। टूटी। जैसे कोई बहुत दूर से, बहुत गहरे से, अपनी आख़िरी ताकत लगाकर बोल रहा हो।
"पानी… पानी…"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
क्योंकि वो आवाज़ मैंने पहले सुनी थी। कुछ घंटे पहले। जब मैं पहली बार इस कुएँ के पास आया था। जब मैंने उस पुरानी जली चप्पल की गंध सूँघी थी।
वो आवाज़ चंदन सिंह की नहीं थी।
वो आवाज़ उस आदमी की थी जो बीस साल से इस तहखाने में बंद था।
मैंने चंदन सिंह की तरफ़ देखा। उसका चेहरा पत्थर जैसा सफ़ेद हो गया था। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
"ये… ये आवाज़?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ भी फटी हुई निकली।
चंदन सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो डर था जो बीस साल से छिपा हुआ था।
"रामदीन," उसने फुसफुसाया। "ये रामदीन की आवाज़ है।"
"पर रामदीन तो यहाँ है!" मैंने कहा। "मेरे सामने!"
चंदन सिंह ने धीरे से सिर हिलाया। "हाँ। पर उसकी आवाज़ अंदर से आ रही है। मतलब…"
वो रुका। उसका गला सूख गया।
"मतलब," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में जो निकला, वो मेरी अपनी नहीं लगी, "तहखाने में कोई और है। और वो रामदीन की आवाज़ में बोल रहा है।"
कुएँ के अंदर से फिर आवाज़ आई। इस बार थोड़ी साफ़।
॥
मैं रुका नहीं। रस्सी मेरे हाथ में थी, और मैंने उसे कुएँ के पुराने लोहे के कड़े में कस दिया। दो बार खींचकर देखा। पक्की थी।
"तू ऊपर रह," मैंने टिंकू से कहा, जो अभी गली के मोड़ से लौटा था, साँस फूली हुई।
"भाई, मैं भी—"
"तू ऊपर रह," मैंने दोहराया, और इस बार आवाज़ में वो बात थी जो बहस नहीं सुनती। "अगर रस्सी हिले और मैं न बोलूँ, तो खींच लेना। चाहे जो हो, खींच लेना।"
टिंकू ने होंठ भींचे। फिर सिर हिलाया।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो कुछ कहना चाहती थी — उसकी आँखों में साफ़ लिखा था। पर उसने कुछ नहीं कहा। बस अपना बैग कंधे से उतारकर मेरी तरफ़ बढ़ाया। अंदर से एक छोटी थैली निकाली — तुलसी, काली मिर्च, सोंठ।
"अगर साँस घुटे, तो इसे सूँघना। और अगर कोई घायल हो, तो घाव पर बाँधना।"
मैंने थैली ली। मेरी उँगलियाँ उसकी उँगलियों से छू गईं। एक पल के लिए। बस एक पल। और फिर मैंने थैली कमर में खोंस ली और कुएँ के मुँह पर झुक गया।
नीचे से गंध आ रही थी। पानी की, हाँ। पर उसके साथ कुछ और भी — सड़ी लकड़ी, गीली मिट्टी, और वो बू जो किसी बंद कमरे में हवा न बदलने से आती है। जैसे कोई कपड़ा सालों से धूप न देखा हो।
मैंने रस्सी पकड़ी और पैर पहले डाले।
कुआँ संकरा था। कंधे दोनों तरफ़ पत्थर से रगड़ते थे। मेरी पीठ दीवार से चिपक रही थी, और नीचे जाते-जाते अंधेरा और गाढ़ा होता गया। ऊपर आसमान का जो टुकड़ा दिख रहा था, वो छोटा होता गया — पहले एक थाली जितना, फिर कटोरी जितना, फिर सुई की नोक जितना। और फिर कुछ नहीं।
सिर्फ़ मेरी साँस। और रस्सी की चरचराहट।
मेरे हाथ जलने लगे। पैरों के नीचे कुछ नहीं था — बस हवा और गंध। दस हाथ, बारह हाथ, पंद्रह हाथ। मैंने गिनना छोड़ दिया।
तभी मेरा पैर किसी चीज़ पर टिका। पत्थर। और फिर पानी की आवाज़ — बहुत धीमी, बहुत नीचे, जैसे कोई दूर किसी कमरे में नल टपक रहा हो।
मैंने रस्सी छोड़ी और उस पत्थर पर उतर गया।
अंधेरा ऐसा था कि अपना हाथ भी नहीं दिख रहा था। मैंने कमर से लालटेन निकाली — कालू काका की पुरानी लालटेन — और माचिस रगड़ी। एक बार, दो बार। तीसरी बार में बत्ती पकड़ी।
पीली रोशनी फैली, और मैंने अपने चारों तरफ़ देखा।
ये कुआँ नहीं था। ये कुएँ के नीचे बना एक कमरा था — छोटा, गोल, पत्थर की दीवारों वाला। फर्श पर पानी की पतली धार बह रही थी, जो एक तरफ़ के छेद में जा रही थी। दीवार पर काई जमी थी, और हवा में वो गंध थी जो मैंने ऊपर सूँघी थी — सड़ी लकड़ी और बंद कमरे की बू।
और कोने में, दीवार से सटाकर, कोई बैठा था।
मैंने लालटेन आगे की।
आदमी घुटनों से सीना छुपाए बैठा था। सिर झुका हुआ। कपड़े फटे, कीचड़ से सने। हाथ में कुछ पकड़े था — एक टूटा हुआ कटोरा, जिसमें पानी की कुछ बूँदें बची थीं।
"रामदीन काका?" मैंने धीरे से कहा।
आदमी का सिर हिला। धीरे-धीरे। जैसे बहुत भारी हो।
और फिर उसने अपना चेहरा उठाया।
मेरे हाथ से लालटेन काँपी। रोशनी हिली, और उस हिलती रोशनी में मैंने वो चेहरा देखा — रामदीन का चेहरा। पर ऐसा चेहरा जो मैंने उस आदमी में कभी नहीं देखा था।
होंठ फटे हुए। आँखें धँसी हुईं। गाल की हड्डी इतनी उभरी कि चमड़ी तन गई थी। और गर्दन पर, कान के नीचे, एक लंबा निशान — जैसे रस्सी या तार से खींचा गया हो। खून सूखकर काला हो गया था।
"तू… तू आ गया," उसने फुसफुसाया। आवाज़ ऐसी जैसे किसी पुराने दरवाज़े की कब्ज़ चरचरा रही हो।
मैं उसके पास गया और घुटनों के बल बैठ गया। मेरे हाथ काँप रहे थे, पर मैंने उसे छुआ — उसका कंधा। हड्डी थी, बस हड्डी। मांस जैसे सूख गया था।
"पानी," उसने कहा। यही शब्द, फिर से। "पानी…"
मैंने अपनी कमर से पानी की थैली निकाली — रबर की, मीरा ने दी थी, रास्ते में। उसके होंठों से लगाई।
वो पीने लगा। घूँट-घूँट। और हर घूँट के साथ उसका गला ऐसे हिलता जैसे किसी को रोना आ रहा हो पर आँसू न हों।
फिर उसने पानी छोड़ा और मेरी कलाई पकड़ी। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ मज़बूत थी — हैरान करने वाली मज़बूती। जैसे शरीर टूट गया हो पर अंदर कुछ बचा हो।
"सुन," उसने कहा। "सुन ले। मैं बहुत देर तक नहीं रहूँगा। मुझे पता है।"
"तुम बोलो मत—"
"चुप रह," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो डाँट थी जो बूढ़े लोग बेटों को देते हैं। "मैं सत्तर साल का हूँ, बेटा। मैं जानता हूँ मेरा शरीर क्या कह रहा है। अब सुन।"
मैं चुप हो गया।
उसने मेरी कलाई छोड़ी और दीवार को टेक लगाकर थोड़ा सीधा बैठा। ये करने में उसे इतनी ताकत लगी कि उसका माथा पसीने से भर गया।
"ठाकुर ने मुझे यहाँ फेंका," उसने कहा। "कल रात। या आज रात? मुझे दिन-रात का हिसाब नहीं रहा। पर जब फेंका, तब बोला — 'बूढ़े, तूने बहुत सुन लिया।'"
"तुमने क्या सुना?"
रामदीन ने आँखें बंद कीं। एक लंबी साँस ली। और फिर बोला, धीरे-धीरे, जैसे हर शब्द को दाँतों से नोचकर बाहर निकाल रहा हो।
"तहखाने में। मैं अपने कमरे में था — उसी कोने वाले में जहाँ मुझे बीस साल से रखा है। दीवार में एक चूल्हा है, पुराना। उसकी चिमनी से आवाज़ आती है। तहखाने की आवाज़। मैं बीस साल से उस चिमनी से सब सुनता आया हूँ।"
मेरा गला सूख गया। "क्या सब?"
"सब," उसने कहा। "बोतलें कब भरीं। किसको कितनी दी। किस पहलवान को कब-'कब बीमार कहा। कौन मरा और किसने काग़ज़ पर 'बुख़ार' लिखा।" उसकी आँखें खुलीं। उनमें लालटेन की रोशनी तैर रही थी। "मैंने सब सुना। पर कभी कुछ कहा नहीं। क्योंकि मैं डरता था।" उसकी आवाज़ टूटी। "और आज रात, जब ठाकुर आया, मैंने सुना कि वो अपने आदमियों से कह रहा था—"
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