Spirit of a Fighter – Chapter 797
"अब मुझे खींचो," मैंने चिल्लाया।
और जब मैं ऊपर पहुँचा, जब मेरे पैर फिर से ज़मीन पर आए, जब मैंने अपनी आँखें खोलीं और ऊपर का आसमान देखा — तब मेरे घुटने जवाब दे गए।
मैं बैठ गया। वहीं, कुएँ के किनारे। मेरी साँस फूल रही थी, और मेरे हाथों में कुएँ की मिट्टी लगी थी।
टिंकू मेरे पास दौड़ा आया। मीरा पहले से रामदीन के पास बैठी थी, उसकी कलाई थामे, नाड़ी देख रही थी। कालू काका एक तरफ़ खड़े थे, हाथ जोड़े हुए, और उनकी आँखों से पानी बह रहा था।
रामदीन ने धीरे से मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले। "बेटा…"
"हाँ, काका?"
"तूने अंदर कुछ देखा?" उसने पूछा।
"एक डिब्बा मिला," मैंने कहा। "और एक काग़ज़। रघुवीर का।"
रामदीन की आँखें फैल गईं। उसने मेरी तरफ़ देखा, फिर मीरा की तरफ़।
और फिर वो रुक गया।
उसका चेहरा बदल गया। जैसे किसी ने अंदर कुछ खोल दिया हो।
"तू…" उसने धीरे से कहा, आँखें मीरा पर टिकी हुईं। "तू कौन है? तेरा चेहरा…"
मीरा ने अपना हाथ उसकी कलाई पर रखा। "मैं मीरा हूँ। रणवीर सिंह की बेटी।"
रामदीन की साँस अटक गई। उसके होंठ काँपे। और फिर उसने धीरे से, बहुत धीरे से, जैसे कोई पुरानी तस्वीर को पहचान रहा हो, कहा —
"तू… तू रघुवीर की बेटी है ना?"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।
"रघुवीर मेरे पिता के गुरु थे," वो धीरे से बोली। "पर मैं उनकी बेटी नहीं…"
"नहीं, तू समझी नहीं," रामदीन ने कहा, और उसकी आवाज़ में अचानक ताकत आ गई — जैसे किसी बूढ़े ने अपनी आख़िरी बात करने के लिए सारी ताकत समेट ली हो। "मैं तेरे पापा रणवीर को नहीं कह रहा। मैं रघुवीर की बात कर रहा हूँ। तेरे पापा के गुरु।"
वो रुका। साँस ली। और फिर बोला:
"तेरे पापा के पैर कैसे गए, वो मैं जानता हूँ। और वो कहानी तेरे पापा ने खुद मुझे सुनाई थी। उस रात। जिस रात मैंने तेरे पापा को खून में लेटा देखा था।"
मीरा की आँखें भर आईं। उसने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसका हाथ पकड़ा।
"कहानी क्या है, काका?" मैंने पूछा।
रामदीन ने आँखें बंद कीं। और फिर खोलीं।
"रघुवीर के पैर," उसने कहा, "उन्होंने खुद नहीं खोए थे। उन्हें खोया गया था। और जिसने खोए, वो आज भी ज़िंदा है।"
कुएँ के ऊपर हवा चली। पेड़ों की पत्तियाँ हिलीं। और मुझे लगा जैसे पूरा रामपुर साँस रोककर सुन रहा है।
"कौन?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो गुस्से से पहले आती है।
रामदीन ने उसकी तरफ़ देखा। बहुत देर तक। और फिर वो बोला — और उसका हर शब्द मेरे सीने में ईंट की तरह गिरा —
"जिसे तू पापा कहती है।"
॥
"जिसे तू पापा कहती है।"
वो शब्द हवा में लटक गए। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका हाथ मेरी कलाई पर था, और उसकी उँगलियाँ ठंडी हो गई थीं। वो रामदीन से नज़र नहीं हटा रही थी, पर उसकी आँखों में जो था, वो गुस्सा नहीं था। डर था। एक ऐसा डर जो बहुत पुराना हो, और जिसे वो अब तक नाम न दे पाई हो।
"काका," मैंने धीरे से कहा, "आप ठीक से बोलिए। क्या कह रहे हैं आप?"
रामदीन ने अपनी सूखी ज़ुबान से होंठ गीले किए। वो इतना कमज़ोर था कि बोलते-बोलते उसकी साँस टूट रही थी, पर आँखों में वो चीज़ जल रही थी जो बीस साल की चुप्पी में जमा हो गई थी।
"पहले मुझे यहाँ से हटाओ," उसने कहा। "इस कुएँ की हवा में साँस नहीं ले सकता। बीस साल से यही हवा पी रहा हूँ।"
कालू काका आगे आए। उन्होंने रामदीन को कंधा दिया। टिंकू दूसरी तरफ़ से सहारा देने लगा, पर रामदीन के शरीर में इतनी ताकत नहीं थी कि खड़ा हो सके। मैंने उसे अपनी पीठ पर लिया। वो हड्डियों का गट्ठर था — जैसे किसी ने कपड़े में लकड़ियाँ बाँधकर मेरे कंधों पर रख दी हों।
टिंकू ने रास्ता दिखाया। हम कुएँ के पीछे वाले रास्ते से निकले, जो सुरंग से होकर अखाड़े की पिछली दीवार तक जाता था। कालू काका आगे-आगे लालटेन लिए चल रहे थे, और उनका हाथ काँप रहा था। मैं समझ गया — उनका बेटा चंदन सिंह अभी भी उसी सुरंग में था, एक कोने में, चुपचाप।
"चंदन को भी ले चलो," मैंने धीरे से कहा।
कालू काका रुके। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — शुक्रिया, और शर्म, दोनों एक साथ।
वो लौटे और कुछ देर बाद चंदन को सहारा देकर लाए। चंदन का आधा चेहरा जला हुआ था, और वो बोल नहीं सकता था। पर जब उसने रामदीन को मेरी पीठ पर देखा, तो उसकी आँखें भर आईं। उसने अपना जला हुआ हाथ उठाया और रामदीन की तरफ़ बढ़ाया।
रामदीन ने उसे देखा। और फिर उसने धीरे से कहा, "चंदन… तू ज़िंदा है।"
चंदन ने सिर हिलाया। उसकी आँखों से पानी बह रहा था, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी।
"बाद में," मैंने कहा। "पहले यहाँ से निकलते हैं।"
हम अखाड़े की पिछली दीवार के पास पहुँचे। कालू काका ने ईंटों की एक परत हटाई — वो ढीली थी, जैसे पहले भी कोई खोलता आया हो। उसके पीछे एक छोटा-सा कमरा था, जिसमें पुरानी चटाइयाँ और मिट्टी के घड़े पड़े थे। ये मज़दूरों का विश्राम-कमरा था, जहाँ अब कोई नहीं आता था।
मैंने रामदीन को चटाई पर लिटाया। मीरा उसके पास बैठ गई और अपना बैग खोला। उसमें छोटी-छोटी शीशियाँ थीं — तुलसी का रस, अदरक का पानी, कुछ पिसी हुई जड़ी-बूटियाँ। उसने एक कपड़े पर थोड़ी गर्म तुलसी डालकर रामदीन के सीने पर रखी।
"साँस लीजिए, काका। धीरे।"
रामदीन ने आँखें बंद कीं। कुछ पल वो चुप रहा। फिर उसने आँखें खोलीं और मेरी तरफ़ देखा।
"वीर," उसने कहा, "तू वही है ना? शेर सिंह का बेटा?"
"हाँ, काका।"
"तेरी आँखें… बिलकुल उसकी तरह।" उसने धीरे से कहा। "जब वो मुझे बचा रहे थे, उस रात, उनकी आँखों में भी यही था। डर नहीं था। बस एक बात थी — 'मेरे बेटे को बचा ले।'"
मेरा गला भर आया। मैंने कुछ नहीं कहा। कभी-कभी चुप रहना ही सबसे बड़ी बात होती है।
मीरा ने रामदीन की कलाई छोड़ी और उसके सामने बैठ गई। उसका चेहरा गंभीर था, पर आवाज़ नरम।
"काका, अब आप मेरे सवाल का जवाब दीजिए। आपने कहा कि जिसने रघुवीर के पैर खोए, वो मेरे पापा हैं। मेरे पापा रणवीर सिंह। ये क्या बात कर रहे हैं आप?"
रामदीन ने उसकी तरफ़ देखा। बहुत देर तक। जैसे वो तौल रहा हो कि कितना बताए, और कहाँ से शुरू करे।
"बैठ जा, बेटा," उसने कहा। "और सुन। ये कहानी बीस साल पुरानी है, और मैंने इसे अपने सीने में दबाकर रखा था। आज तेरे सामने खोल रहा हूँ।"
मीरा बैठ गई। मैंने भी घुटने के बल बैठकर उसकी तरफ़ देखा।
"तेरे पापा रणवीर और शेर सिंह दोनों इसी अखाड़े के शेर थे," रामदीन ने शुरू किया। "और उनके सामने एक ही आदमी खड़ा होता था — माधव सिंह। वो दोनों का सबसे बड़ा दुश्मन था। हर मुकाबले में माधव हारता, और हर बार बदला लेने की कसम खाता।"
वो रुका। एक लंबी साँस ली।
"फिर एक दिन बड़ा मुकाबला हुआ। बाहर से पहलवान आए थे। माधव ने पहले रणवीर को चुनौती दी, और रणवीर ने उसे पछाड़ दिया। फिर शेर सिंह से लड़ा, और हार गया। दोनों ने उसे मिट्टी में लोट दिया। पूरे गाँव के सामने।"
रामदीन की आवाज़ भारी हो गई।
"उस रात माधव ने अपने घर के पीछे वाले कमरे में ज़हर पी लिया। पीली शीशी वाला ज़हर। वही जो उसने बाद में भैरव को सिखाया।"
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