Spirit of a Fighter789 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 789

7 min read November 5, 2026

"वीर," टिंकू ने कहा। "तेरे घर के बाहर कोई खड़ा है। कोई नहीं दिख रहा, पर मेरी दुकान की शक्कर की बोरी में एक चिट्ठी फँसी है।"

उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया।

मैंने उसे पढ़ा।

"माँ को मत भेजना कहीं। वो हमारे पास ठीक है।"

मेरे हाथ में काग़ज़ काँप रहा था।

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "वीर, ये ठाकुर की लिखाई नहीं है।"

"मुझे पता है," मैंने कहा।

"तो किसकी है?"

मैंने काग़ज़ फिर पढ़ा। मैंने उसे सूँघा। उस पर हल्दी की गंध थी।

"ये माँ की लिखाई है," मैंने कहा।

मीरा का मुँह खुला रह गया।

"माँ?" उसने कहा। "पर माँ तो ठाकुर के पास है।"

"नहीं," मैंने कहा। "माँ ठाकुर के पास नहीं है। माँ भाग गई है।"

मैंने काग़ज़ को मोड़कर अपनी जेब में रखा।

"और अगर माँ भाग गई है," मैंने कहा। "तो वो गुड़िया को भी साथ ले गई होगी। ठाकुर झूठ बोल रहा था। उसके पास माँ नहीं है।"

जग्गा ने हँसी छोड़ी।

"तो फिर हम क्यों डर रहे थे?"

"क्योंकि डरना ज़रूरी था," मैंने कहा। "अगर मैं नहीं डरता, तो मैं ठाकुर की बात मान लेता। और अगर मैं नहीं डरता, तो मुझे ये काग़ज़ भी नहीं मिलता।"

मैंने टिंकू को गले लगाया।

"तूने मेरी जान बचाई, टिंकू।"

"अरे," टिंकू ने कहा। "मैं तो बस मिठाई बनाने वाला हूँ।"

"तू बस मिट्ठाई नहीं बनाता," मैंने कहा। "तू मेरा भाई है।"

टिंकू की आँखें भर आईं। उसने अपनी टोपी से आँसू पोंछे।

"अब क्या?" मीरा ने पूछा।

मैंने आसमान की तरफ़ देखा। रात हो रही थी।

"अब," मैंने कहा। "मैं ठाकुर को उसकी असली शक्ल दिखाऊँगा। और उसके लिए मुझे एक चीज़ चाहिए।"

"क्या?"

"मुझे सारे गाँव को चाहिए," मैंने कहा। "और एक ऐसा आदमी जो ठाकुर के सामने खड़े होकर सच बोल सके।"

जग्गा ने अपना हाथ उठाया।

"मैं?"

"नहीं," मैंने कहा। "तू तो लड़ेगा। मुझे किसी और की ज़रूरत है।"

मैंने टिंकू और मीरा की तरफ़ देखा।

"मुझे हरनाम का भाई चाहिए," मैंने कहा। "चुन्नी। वो ठाकुर से नहीं डरता।"

और मैंने अपनी मुट्ठी भींच ली।

"कल सुबह," मैंने कहा। "ठाकुर के पास अपनी ताकत होगी। और मेरे पास मेरी मिट्टी होगी।"

तभी हवा में एक गंध आई।

पीली शीशी वाली गंध।

मैं पलटा।

अखाड़े के फाटक पर एक बूढ़ी औरत खड़ी थी। उसके हाथ में पीली शीशी थी, और उसका चेहरा माँ जैसा था।

"माँ?" मैंने धीरे से कहा।

पर वो माँ नहीं थी।

वो औरत मुस्कुराई और बोली, "नहीं बेटा। मैं तेरी माँ नहीं हूँ। मैं तो तेरे पापा की बहन हूँ।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

"क्या?"

"मैं जानती हूँ," वो बोली। "तेरी माँ ने मुझे बताया। उसने कहा कि अगर वो न रहे, तो मैं तेरे पास आ जाऊँ।"

"माँ कहाँ है?"

वो औरत मेरे करीब आई। उसने पीली शीशी मेरी तरफ़ बढ़ाई।

"तेरी माँ ने कहा कि ये तुझे देना। और ये भी कहना कि —"

वो रुकी।

"कि क्या?"

"कि वो ठाकुर के पास नहीं है," उसने कहा। "वो शमशेर सिंह के साथ है। और वो तेरे लिए एक रास्ता बना रही है।"

मैंने शीशी उसके हाथ से ली।

"कौन-सा रास्ता?"

वो औरत मुस्कुराई।

"ये शीशी," उसने कहा। "इसे खोलना मुकाबले से पहले। और इसे पीना नहीं।"

"तो फिर क्या करना है?"

"इसे मिट्टी में डालना है," उसने कहा। "जिस मिट्टी में तू लड़ेगा। और फिर तू खुद देखेगा कि ठाकुर की ताकत कैसे पानी-पानी हो जाती है।"

वो पलटी और अंधेरे में चली गई।

"रुको!" मैंने कहा। "तुम्हारा नाम क्या है?"

वो रुकी।

"मेरा नाम कमला है," उसने कहा। "और मैं तेरे पापा की बहन हूँ। तेरी बुआ।"

और वो रात में खो गई।

मैंने शीशी को हाथ में पकड़ा और आसमान की तरफ़ देखा।

कल सुबह, मैं ठाकुर को उसी मिट्टी में हराऊँगा जिसमें उसने मेरे पापा को मारा था।

और इस बार, कोई माँ नहीं आएगी।

इस बार, मैं खुद आऊँगा।

॥

कमला बुआ रात में खो गईं, और मैं वहीं खड़ा रह गया। मेरे हाथ में पीली शीशी थी, और उसका काँच ठंडा था। इतना ठंडा, जैसे बर्फ़ की डली पकड़ी हो।

मैंने शीशी को कान के पास लाकर हिलाया। अंदर कुछ खड़खड़ाया — बहुत हल्का, जैसे सूखी हल्दी का कोई टुकड़ा शीशी के काँच से टकरा रहा हो।

"वीर।" मीरा ने मेरा कंधा छुआ। "तुम्हारे हाथ काँप रहे हैं।"

"नहीं काँप रहे।"

"देखो।" उसने मेरी कलाई पकड़ ली। "ये कहते हो नहीं काँप रहे?"

मैंने शीशी को जेब में रखा और उसका हाथ झटक दिया। फिर मुझे अपनी ही आवाज़ पर शर्म आई। वो मेरी दुश्मन नहीं थी। वो तो वही थी जो मेरे साथ रात के इस वक़्त तक खड़ी थी।

"सॉरी," मैंने कहा। "मैं… मैं ठीक हूँ।"

"तुम ठीक नहीं हो," मीरा ने कहा। "और होने की ज़रूरत भी नहीं है। तुम्हारी बुआ आई, एक शीशी देकर चली गई, और कह गई कि तुम्हारी माँ ठाकुर के पास नहीं है। इतना सुनकर कोई भी आदमी ठीक नहीं रहता।"

टिंकू पास आया। उसने मेरी दूसरी तरफ़ से मेरा हाथ पकड़ा।

"भाई, तू घर चल। माँ को देख ले। अपनी आँखों से देख ले। फिर सोचना क्या करना है।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। टिंकू की टोपी टेढ़ी थी और उसके माथे पर पसीना था। पर उसकी आवाज़ में जो चीज़ थी, वो मेरे लिए दवा जैसी थी।

"तू चलेगा?" मैंने पूछा।

"अरे, मैं तो तेरे साथ हूँ," टिंकू ने कहा। "मैं तो तब भी साथ था जब तू बच्चा था और हम दोनों माँ की चक्की के पीछे छुपकर रोटी चुराते थे।"

मैं हँसा। पहली बार उस रात में हँसा।

"तूने मेरी आधी रोटी खाई थी," मैंने कहा।

"आधी नहीं," टिंकू ने कहा। "पूरी खाई थी। बाद में तुझे बताया था कि चूहा खा गया।"

मीरा ने हम दोनों को देखा और उसके चेहरे पर वो हल्की-सी मुस्कान आई जो कभी-कभी आती थी। फिर वो सीरियस हो गई।

"जग्गा कहाँ है?" उसने पूछा।

हम चारों तरफ़ देखने लगे। जग्गा अब भी अखाड़े के फाटक के पास खड़ा था। उसके हाथ में वो पीली शीशी थी जो उसने ठाकुर को पीने को दी थी — नहीं, वो तो उसने मुझे दे दी थी। ये दूसरी थी। या फिर वो उसी को पकड़े खड़ा था और मैं भूल गया था।

नहीं। मेरे हाथ में जो शीशी थी, वो कमला बुआ की थी। जग्गा के हाथ में वो शीशी थी जो ठाकुर ने उसे दी थी।

"जग्गा," मैंने आवाज़ दी। "तू आ रहा है?"

वो पलटा। उसका चेहरा थका हुआ था, पर आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी — ठंडा गुस्सा। वो चुपचाप हमारे साथ हो लिया।

रास्ते में कोई कुछ नहीं बोला। गाँव सो रहा था। नीम के पेड़ों की पत्तियाँ हवा में सरसरा रही थीं, और दूर कहीं कुत्ता भौंक रहा था। मेरे नंगे पैर अब भी कीचड़ से भरे थे, और उनमें छोटे-छोटे काँटे चुभ रहे थे। पर मुझे दर्द नहीं हो रहा था। डर दर्द से बड़ा हो तो दर्द कहाँ दिखता है।

घर का दरवाज़ा खुला था।

मैं रुका। मेरे पेट में एक ठंडी गोली सी फिसल गई। क्या दरवाज़ा खुला छोड़ गई थीं माँ? या कोई और खोलकर गया है?

"ठहरो," मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। "अंदर से आवाज़ आ रही है।"

मैंने कान लगाए। चूल्हे की फूँक। और तवे पर रोटी पलटने की आवाज़।

मेरी साँस लौटी।

मैंने दरवाज़ा धकेला और अंदर गया।

सरस्वती चूल्हे के सामने बैठी थीं। उनकी पीठ दरवाज़े की तरफ़ थी, और उनके कंधे धीरे-धीरे हिल रहे थे — जैसे कोई बहुत थका हुआ आदमी साँस ले रहा हो। उनके सिर पर सफ़ेद चोटी थी, और माथे पर हल्दी का टीका।

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