Spirit of a Fighter – Chapter 790
गुड़िया चौकी पर बैठी अपनी कॉपी पर कुछ लिख रही थी। उसने सिर उठाया और मुझे देखा।
"भैया!"
वो उछलकर भागी और मेरे पेट से लिपट गई। उसकी चोटियाँ मेरे हाथों में आ गईं और उसकी कॉपी ज़मीन पर गिर गई।
"तुम आ गए," वो बोली। "माँ कह रही थीं कि तुम रात को लौटोगे। मैंने कहा नहीं, भैया अभी आएँगे। और तुम आ गए।"
मैंने उसके बालों में हाथ फिराया। उसके बालों में साबुन की गंध थी — वो गंध जो हफ़्ते में एक बार आती थी, रविवार को।
"तू सोई नहीं?" मैंने पूछा।
"कैसे सोती?" गुड़िया ने कहा। "माँ रोटी बना रही थीं और बीच-बीच में चूल्हे में लकड़ी ऐसे डाल रही थीं जैसे… जैसे पता नहीं।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। वो अब भी चूल्हे की तरफ़ देख रही थीं, पर उनका हाथ तवे पर रुका हुआ था। रोटी जल रही थी। धुआँ उठ रहा था।
"माँ।"
वो पलटीं। उनके चेहरे पर कोई डर नहीं था, कोई उम्मीद नहीं थी। बस एक चीज़ थी — जानने की चाह। जैसे वो पहले से जानती हों कि कुछ हुआ है, और अब बस ये जानना चाहती हों कि कितना बड़ा हुआ है।
"रोटी जल रही है," मैंने कहा।
उन्होंने तवे की तरफ़ देखा, रोटी उठाई, और सीधे आँच में डाल दी। फिर उठकर खड़ी हुईं और मेरे पास आईं। उन्होंने मेरा चेहरा दोनों हाथों में लिया और ध्यान से देखा।
"कुछ हुआ है," उन्होंने कहा। "बता।"
मैंने उनका हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ चक्की की गर्मी से अब भी गरम थीं।
"ठाकुर ने धमकी दी है," मैंने कहा। "कह रहा है कि तू उसके कब्ज़े में है। और गुड़िया भी।"
माँ ने मेरा हाथ छोड़ा। वो चूल्हे की तरफ़ गईं, रोटी पलटी, और फिर बोलीं — आवाज़ बिलकुल शांत, जैसे कोई पानी में पत्थर फेंक रहा हो जिससे लहर न उठे।
"तो चिट्ठी झूठी है।"
"माँ, मैंने खुद…"
"तूने खुद क्या देखा?" उन्होंने पलटकर पूछा। "मुझे देखा? मैं यहाँ हूँ। गुड़िया को देखा? वो वहाँ बैठी है। तो फिर ठाकुर के पास क्या है?"
"बस बातें," मैंने कहा। "झूठी बातें।"
"हाँ," माँ ने कहा। "और बातें किसके लिए होती हैं? डराने के लिए। जो आदमी ताकत से हार नहीं सकता, वो बातों से डराता है।"
उन्होंने रोटी उतारी और मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"खा।"
"माँ, मेरा मन नहीं…"
"मैंने कहा खा।" उनकी आवाज़ में वो चीज़ थी जिससे बहस नहीं की जा सकती थी। "खाली पेट लड़ने वाला हार जाता है। और तू कल लड़ने वाला है।"
मैंने रोटी ली और बैठ गया। मीरा और टिंकू भी बैठ गए। जग्गा दरवाज़े के पास खड़ा रहा, जैसे अंदर आने की हिम्मत न कर रहा हो।
"तू भी आ," माँ ने उसे देखकर कहा। "मेरे घर में कोई बाहर नहीं खड़ा रहता।"
जग्गा अंदर आया। उसने दरवाज़े पर हाथ रखकर जूते उतारे, और फिर चौकी के कोने पर बैठ गया। उसका चेहरा अब भी कड़ा था, पर उसकी आँखों में पानी था।
माँ ने उसकी तरफ़ देखा और कुछ नहीं बोलीं। बस एक रोटी और निकालकर उसकी तरफ़ बढ़ा दी।
"खा, बेटा," उन्होंने कहा। "तेरी भी माँ होगी कहीं।"
जग्गा ने रोटी ली और उसकी आँखों से आँसू गिर पड़े। उसने जल्दी से पोंछे और रोटी में मुँह डाल दिया, जैसे छुपाना चाहता हो कि वो रो रहा है।
मैंने रोटी खाई। उसमें नमक कम था — बहुत कम। माँ आज कुछ सोच रही थीं, और जब वो सोचती थीं तो नमक भूल जाती थीं। ये उनकी पुरानी आदत थी, और ये आदत मुझे हमेशा बताती थी कि माँ के अंदर क्या चल रहा है।
"माँ," मैंने कहा। "मुझे कमला बुआ मिलीं।"
माँ का हाथ रुका। बस एक पल के लिए। फिर वो सामान्य हो गया।
"कहाँ?"
"अखाड़े के फाटक पर। उन्होंने पीली शीशी दी और कहा कि तू शमशेर सिंह के साथ है। और कहा कि शीशी मुकाबले से पहले मिट्टी में डालनी है।"
माँ ने चूल्हे में एक और लकड़ी डाली। आग की लपटें उठीं और उनका चेहरा लाल हो गया।
"कमला ने आज तक मेरे घर का रास्ता नहीं देखा था," उन्होंने कहा। "बीस साल में एक बार भी नहीं। और आज रात आई?"
"माँ, वो तेरी ननद है। तेरे पति की बहन।"
"हाँ," माँ ने कहा। "और यही तो सोच रही हूँ। जो औरत बीस साल अपने भाई के बेटे से न मिली, वो आज रात क्यों आई?"
मैं चुप हो गया।
"क्योंकि कोई उसे भेजकर लाया है," माँ ने कहा। "और जो भेजता है, वो बदले में कुछ माँगता है।"
"तो शीशी…"
"शीशी असली हो सकती है," माँ ने कहा। "पर उसे देने वाला साफ़ नहीं है।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने बहुत कम देखी थी — शक। और जब माँ को शक होता था, तो वो अक्सर सही होती थीं।
"तो मैं शीशी इस्तेमाल नहीं करूँ?"
"मैंने ऐसा नहीं कहा," माँ ने कहा। "मैंने कहा कि उसे देने वाला साफ़ नहीं है। शीशी को खुद परख। तेरी नाक है ना?"
मैंने जेब से शीशी निकाली और उसका ढक्कन खोला। गंध आई — हल्दी, और कुछ और। कुछ मीठा। और उसके नीचे, बहुत नीचे, कुछ कड़वा।
मैंने ध्यान से सूँघा। कड़वाहट वही थी जो तहखाने की मिट्टी में थी। वही जो रघुवीर के पीले काग़ज़ पर थी।
"इसमें तहखाने की मिट्टी है," मैंने कहा। "और हल्दी। और… और कुछ है जो मैं पहचान नहीं पा रहा।"
"तो फिर आधी बात साफ़ हो गई," माँ ने कहा। "बाकी आधी कल पता चलेगी।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आवाज़ धीमी हो गई।
"एक बात सुन, वीर।"
"हाँ।"
"जो औरत अपने बेटे को अखाड़े में उतारने का हौसला रखती है," उन्होंने कहा। "उसे कोई उठाकर नहीं ले जा सकता। मैं बीस साल से तेरे पापा की मौत का बोझ उठा रही हूँ। अब मैं इतनी कमज़ोर नहीं हूँ कि कोई मुझे धमकी देकर डरा दे।"
मेरी आँखें भर आईं। मैंने सिर नीचे किया ताकि कोई न देखे।
"माँ…"
"और एक बात," वो बोलीं। "कल तेरे पापा की धोती पहनकर उतरना। मैंने उसे धोकर रख ली है। बीस साल से उसी संदूक में है।"
"माँ, वो धोती…"
"वो धोती तेरे पापा की थी," माँ ने कहा। "और अब तेरी है।"
गुड़िया उठी। उसने अपनी जेब से कुछ निकाला — एक छोटी थैली, जो मिट्टी से भरी थी।
"भैया," उसने कहा। "मैं डर गई थी जब तुम चिट्ठी पढ़ रहे थे। तुम्हारा चेहरा ऐसा हो गया था जैसे… जैसे कुछ टूट गया हो। पर अब नहीं डर रही।"
उसने थैली मेरे हाथ में रख दी।
"ये अखाड़े की मिट्टी है," वो बोली। "मैंने आज सुबह लाई थी। मैं रोज़ लाती हूँ। मैं चुपके से जाती हूँ, कोई नहीं देखता।"
मैंने थैली को हाथ में पकड़ा। मिट्टी ठंडी थी, और उसमें वो गंध थी जो मुझे बचपन से पता थी।
"तू रोज़ जाती है?" मैंने पूछा।
"हाँ," गुड़िया ने कहा। "और एक दिन मैंने कालू काका को देखा। वो मिट्टी सींच रहे थे। उन्होंने मुझे डाँटा नहीं। बस हँसे और कहा — 'तेरे भैया के हाथ मज़बूत होंगे।'"
मैंने थैली को सीने से लगाया।
"तू समझती है," मैंने कहा। "तू बारह साल की है और तू समझती है।"
"मैं समझती हूँ कि मेरा भैया कल जीतेगा," गुड़िया ने कहा। "बस इतना।"
टिंकू ने चुपचाप अपनी टोपी उतारी और उस पर हाथ फिराया, जैसे दुआ माँग रहा हो।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
तीन बार। धीमी। जैसे कोई काँपते हाथ से खटखटा रहा हो।
मैं उठा। मेरा हाथ अपने आप चौकी के कोने पर पड़ी लाठी की तरफ़ बढ़ा, जो माँ ने रोज़ वहीं रखी थी।
"कौन है?" मैंने पूछा।
"मैं हूँ, वीर। कालू।"
मैंने दरवाज़ा खोला।
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