Spirit of a Fighter – Chapter 788
मीरा ने मेरी कमर में हाथ रखा और धीरे से कहा, "मेरे पास काली मिर्च और तुलसी का पाउडर है। बचा हुआ।"
"तो फिर देर किस बात की," मैंने कहा।
पहला आदमी आया। मैं झुका, उसकी लाठी मेरे सिर के ऊपर से निकली, और मैंने उसकी कमर में कंधा मारा। वो दीवार से टकराया और गिरा। दूसरे ने मेरी पीठ पर लाठी मारी। मेरी रीढ़ में झन्नाटा आया और मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। पर मैं गिरा नहीं।
मैं उसके पैर पर कदम रखकर चढ़ा और उसकी कलाई मरोड़ी। लाठी उसके हाथ से छूटी। मैंने उसे उठाया और तीसरे के मुँह पर दे मारा।
तभी जग्गा चिल्लाया।
मैंने पलटकर देखा। एक आदमी ने उसकी गर्दन में बाजू डाली थी। जग्गा ने उसे कोहनी मारी, और फिर उसके कान में दाँत गड़ा दिए। आदमी चीखा और उसे छोड़ दिया।
"जग्गा!" मैंने चिल्लाया। "पीछे!"
पर जग्गा पहले ही पलट चुका था। उसने अपनी तरफ़ आते आदमी को लात मारी और वो सीढ़ियों से लुढ़कता हुआ ऊपर गया।
और तभी मैंने एक चीज़ महसूस की।
गंध।
तेल की जली हुई गंध। वही गंध जो बीस साल पहले मेरे पापा की मौत की रात की थी। वो गंध ठाकुर की तरफ़ से आ रही थी, पर उसकी छड़ी से नहीं। उसकी जेब से।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा। "ठाकुर की जेब में कुछ है।"
"क्या?"
"मुझे नहीं पता। पर वो गंध मेरे पापा की मौत की रात वाली है।"
ठाकुर अब भी वहीं खड़ा था। उसने अपने आदमियों को गिरते देखा, और उसके चेहरे पर वो घमंड नहीं था जो अभी था। अब वहाँ कुछ और था।
डर।
नहीं, डर नहीं। शक।
वो मेरी तरफ़ बढ़ा, और मैंने उसकी छड़ी पकड़ ली। हम दोनों बराबर थे। दोनों की साँसें तेज़। दोनों के हाथ काँप रहे थे।
"तू क्या चाहता है, वीर?" उसने कहा। "तू मुझे हराकर क्या पा लेगा? तेरे पापा वापस नहीं आएंगे। तेरी माँ की जवानी वापस नहीं आएगी। तेरा बचपन वापस नहीं आएगा।"
"मुझे वो नहीं चाहिए," मैंने कहा। "मुझे सिर्फ़ ये चाहिए कि तू पूरे गाँव के सामने ये बोले कि तूने क्या किया।"
वो हँसा।
"बोलूँगा," उसने कहा। "पर एक शर्त पर।"
"क्या शर्त?"
"तेरी माँ और तेरी बहन," उसने कहा। "वो दोनों मेरे पास हैं।"
मेरा हाथ ढीला पड़ा।
नहीं।
"तू झूठ बोल रहा है," मैंने कहा। "माँ तो घर पर…"
"घर पर सिर्फ़ एक काग़ज़ रखा है," ठाकुर ने कहा। "और तेरी बहन को स्कूल से लौटते वक़्त मेरे आदमी ने रास्ते से उठा लिया। तू अभी जाकर देख ले।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसके चेहरे से खून सूख गया था।
"वीर," वो बोली। "वो झूठ बोल सकता है।"
"हाँ," मैंने कहा। "पर मैं रिस्क नहीं ले सकता।"
मैंने ठाकुर की छड़ी छोड़ दी।
"अगर तूने उन्हें कुछ किया," मैंने कहा। "तो मैं तेरा नाम मिट्टी से मिटा दूँगा। पूरे गाँव के सामने। पूरे इलाक़े के सामने।"
"मुझे तेरी धमकी नहीं चाहिए," ठाकुर ने कहा। "मुझे तेरा फ़ैसला चाहिए। कल के मुकाबले में तू नहीं लड़ेगा। और तेरे बदले जग्गा लड़ेगा।"
जग्गा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल था, और मेरी आँखों में जवाब।
"मंज़ूर," मैंने कहा।
"नहीं!" मीरा ने कहा। "वीर, तू पागल हो गया है।"
"मीरा," मैंने कहा। "मेरी बहन बारह साल की है।"
और वो चुप हो गई।
ठाकुर मुस्कुराया। उसने अपनी छड़ी उठाई और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा।
"एक बात और," उसने कहा। "जग्गा, तू लड़ेगा। पर अगर तू हार गया, तो तेरी माँ भी मेरी हो जाएगी।"
जग्गा ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं।
"अगर मैं जीत गया," जग्गा ने कहा, "तो तू वो सब वापस करेगा जो तूने लिया है।"
"मंज़ूर," ठाकुर ने कहा, और वो सीढ़ियों से ऊपर चला गया। उसके आदमी भी उसके पीछे गए।
मैं वहीं खड़ा रहा।
मेरे हाथ काँप रहे थे।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा और कुछ नहीं कहा। जग्गा ने दीवार को लात मारी।
"मैंने तुझे अकेले नहीं जाने दिया होता," जग्गा ने कहा। "अगर मैं तेरे पीछे न आता, तो तू यहाँ अकेला मर जाता।"
"तू आया," मैंने कहा। "इसीलिए मैं ज़िंदा हूँ।"
"और अब?"
"अब," मैंने कहा। "मैं तेरी माँ को निकालूँगा। और तू मेरी बहन को।"
हम उन लोगों के पास पहुँचे जो ज़मीन पर पड़े कराह रहे थे। मैंने उनमें से एक को उठाया और उसका कपड़ा खींचा।
"तेरा नाम क्या है?"
"म… मैं…"
"तेरा नाम क्या है?" मैंने फिर पूछा।
"रामू," उसने कहा।
"रामू," मैंने कहा। "मेरी बहन कहाँ है?"
"मुझे नहीं पता," उसने कहा। "मैं सिर्फ़ सीढ़ियों पर पहरा दे रहा था। ठाकुर ने हमें कुछ नहीं बताया।"
मैंने उसे छोड़ दिया और मीरा की तरफ़ देखा।
"वो झूठ बोल सकता है," मीरा ने कहा। "हो सकता है गुड़िया स्कूल में ही हो।"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "पर वो झूठ नहीं बोल रहा। मैं उसकी गंध से बता सकता हूँ।"
मैंने दीवार पर टँगे पुराने चित्रों को देखा। पहलवानों की तस्वीरें। उनके चेहरे पुराने थे, पर उनकी आँखों में वो आग अब भी जल रही थी।
"मीरा," मैंने कहा। "मुझे कुछ सोचना है।"
मैं वहीं ज़मीन पर बैठ गया। मेरे हाथ में मिट्टी थी। तहखाने की मिट्टी। मैंने उसे उँगलियों में लिया और सूँघा।
उसमें पापा की गंध थी। वही गंध जो अखाड़े की मिट्टी में थी। पर उसमें कुछ और भी था। एक धातु की गंध। लोहे की। जैसे किसी अंगूठी की।
और फिर मुझे एहसास हुआ।
वो गंध ठाकुर की अंगूठी की थी।
मैंने मिट्टी को अपनी हथेली पर रखा और देखा। उसमें एक छोटा-सा टुकड़ा चमक रहा था। धातु का।
मैंने उसे उठाया।
वो एक अंगूठी का टुकड़ा था। टूटी हुई अंगूठी। और उस पर वही निशान था — त्रिकोण और बिंदु।
"मीरा," मैंने कहा।
वो मेरे पास आई।
"ये अंगूठी," मैंने कहा। "ये ठाकुर की है। और ये यहाँ क्यों है?"
मीरा ने उसे हाथ में लिया और करीब से देखा।
"वीर," उसने धीरे से कहा। "ये वही अंगूठी है जो ठाकुर आज पहन कर आया था। मैंने उसकी उँगली में देखी थी।"
"तो ये यहाँ कैसे…"
"क्योंकि ठाकुर यहाँ पहले भी आया था," मीरा ने कहा। "आज नहीं। पहले। बहुत पहले।"
मैंने मिट्टी को फिर सूँघा। अब मुझे साफ़ गंध आ रही थी। पापा की गंध। ठाकुर की गंध। और एक तीसरी गंध। कोई और था, जिसने यहाँ आने की हिम्मत की थी।
"मीरा," मैंने कहा। "रघुवीर यहाँ आते थे। रोज़।"
"कैसे पता?"
"क्योंकि मिट्टी में उनकी गंध है," मैंने कहा। "और उनकी गंध में एक चीज़ है जो मुझे अब समझ आई। वो हल्दी है। वही हल्दी जो माँ अपने माथे पर लगाती है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"तो रघुवीर और तेरी माँ…"
"मैं नहीं जानता," मैंने कहा। "पर मैं जानता हूँ कि रघुवीर यहाँ आते थे। और यहीं उन्होंने वो पीली शीशी बनाई थी जो माँ ने मुझे दी थी।"
मैं उठा।
मेरे हाथ अब काँप नहीं रहे थे।
"मीरा," मैंने कहा। "मुझे गुड़िया को ढूँढना है। और मुझे माँ को भी। पर मैं अकेला नहीं जाऊँगा।"
"तो?"
"मैं सबको लेकर जाऊँगा," मैंने कहा। "पूरे गाँव को। और मैं ठाकुर को उसी तरह हराऊँगा जैसे रघुवीर ने कहा था — पूरे गाँव के सामने उसकी असली शक्ल दिखाकर।"
मैं सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा।
"पर पहले," मैंने कहा। "मैं माँ और गुड़िया को ढूँढूँगा।"
तभी मुझे एक गंध आई। तेज़। चीनी की।
मैं सीढ़ियों से ऊपर भागा।
और अखाड़े के मैदान में खड़े टिंकू को देखा। वो हाँफ रहा था, और उसके हाथ में एक काग़ज़ था।
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