Spirit of a Fighter – Chapter 763
वो थोड़ी देर रुके। जैसे याद कर रहे हों।
"फिर भैरव आया। उसके हाथ में बोतल थी — वही हरी बोतल। वो नीचे आँगन में आया और शेर सिंह के सामने रख दी। कहा, 'पहलवान जी, आज कसरत के बाद ये पी लीजिए, ताकत बढ़ेगी।'"
"और शेर सिंह ने?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ सूखी थी।
"उन्होंने मना कर दिया," रामलाल ने कहा। "उन्होंने कहा — 'बेटा, ताकत पानी से नहीं, मिट्टी से आती है। ये तेरे पास रख, मुझे इसकी ज़रूरत नहीं।'"
मेरे अंदर कुछ ढीला हुआ। जैसे कोई गाँठ खुल गई हो।
"पर फिर…" रामलाल ने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी हो गई। "फिर माधव आया। छाया की तरह। मैंने उसे आते नहीं देखा — बस अचानक वो वहाँ था, बोतल के पास।"
"माधव?" मीरा ने कहा। "आपने उसे पहचाना?"
"पहचाना क्यों नहीं। सरपंच साहब। उन्होंने शेर सिंह के कंधे पर हाथ रखा और कहा — 'भाई, ये पानी हमारे अखाड़े की मेहनत में मिला है। एक घूँट पी लो, मेरे लिए।'"
रामलाल ने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"शेर सिंह ने उनकी आँखों में देखा। कुछ देर तक देखा। फिर बोले — 'माधव, तू मेरा भाई है। अगर ये पानी तेरे हाथ से है, तो मैं पी लूँगा।'"
मेरी साँस रुक गई।
"और उन्होंने पी लिया," रामलाल ने कहा। "गिलास पूरा खाली किया। फिर मुस्कुराकर बोले — 'अब बता, तेरे दिल में क्या है?'"
मैंने अपनी मुट्ठी भींच ली। मेरे हाथ की उँगलियाँ चारपाई की लकड़ी में धँस गईं।
"माधव कुछ नहीं बोला," रामलाल ने कहा। "वो बस हँसा। और फिर चला गया। उसके जाने के बाद शेर सिंह वहीं बैठ गए — आँगन में, मिट्टी पर। मैं छत से देख रहा था। उन्होंने अपना हाथ मिट्टी में डाला और उसे मुट्ठी में भर लिया। फिर बोले — 'मिट्टी, तूने मुझे बहुत दिया। अब मेरे बच्चे को देना।'"
मैंने अपना सिर नीचे किया। मेरी आँखों से पानी बह रहा था, और मैं उसे रोक नहीं रहा था।
"मैं उस रात चुप रहा," रामलाल ने कहा। "अगर मैं नीचे आकर चिल्ला देता, अगर मैं पंचायत बुला लेता, तो शायद शेर सिंह बच जाते। पर मैं डर गया। मेरा बेटा… मेरा बच्चा उसी अखाड़े में था। मुझे लगा अगर मैं बोला तो माधव उसे भी मार देगा।"
वो रुके। उनका पूरा शरीर काँप रहा था।
"और मेरा बेटा फिर भी मर गया," उन्होंने कहा। "दो साल बाद। उसे भी बुख़ार बताकर मार दिया। मैं चुप रहा, और मेरा बच्चा चला गया।"
मीरा ने उनका हाथ पकड़ा। "काका, अब आप चुप मत रहिए। अदालत में गवाही दीजिए।"
रामलाल ने उनकी तरफ़ देखा। "मैं गवाही दूँगा। पर एक शर्त पर।"
"क्या शर्त?" मैंने पूछा।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें अब सूखी थीं। और उनमें कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा — एक बूढ़े आदमी का आख़िरी हौसला।
"पहले मुझे मेरे बेटे की कब्र दिखाओ," उन्होंने कहा। "मैं तीस साल से उसकी कब्र पर नहीं गया। जब वो मरा, मैंने उसे दफ़नाया और उसके बाद कभी पलटकर नहीं देखा। डरता था कि कहीं माधव मुझे भी न मार दे।"
उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा। उनका हाथ ठंडा था, पर उसमें एक अजीब-सी गर्मी थी।
"तेरे बाप ने मुझे बचाया था," उन्होंने कहा। "शेर सिंह ने। एक बार अखाड़े में जब मैं गिरा था, तो उन्होंने मुझे उठाया था और कहा था — 'रामलाल, तू चौकीदार नहीं, मेरा भाई है।'"
रामलाल की आवाज़ भर्रा गई।
"आज मैं तेरा नाम बचाऊँगा। तेरे बाप के नाम की लाज बचाऊँगा।"
झोपड़ी में सन्नाटा छा गया। सिर्फ़ बाहर नहर की आवाज़ आ रही थी, और हवा में ठंडी मिट्टी की गंध।
कालू काका ने धीरे से कहा, "मैं जानता हूँ कब्र कहाँ है। नहर के उस पार, पुराने पीपल के नीचे। मैं ले चलूँगा।"
मैंने एक बार माँ की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और सिर हिलाया — जैसे कह रही हों, जा, मैं यहीं हूँ।
"…तो चलो," मैंने कहा।
हम निकले। मैं, मीरा, टिंकू और कालू काका। सूरज अब ऊपर आ रहा था, और घास पर ओस चमक रही थी।
टिंकू चलते-चलते बोला, "काका, वो कब्र कैसी दिखती है?"
"पत्थर का एक टुकड़ा," कालू काका ने कहा। "बस इतना। कोई नाम नहीं। उस वक़्त नाम लिखने की हिम्मत नहीं थी।"
हम नहर पार करके पुराने पीपल के पास पहुँचे। पीपल की जड़ें ज़मीन से बाहर निकली हुई थीं, और उसकी छाया में एक चौकोर पत्थर रखा था।
कालू काका रुके। "यही है।"
मैं आगे बढ़ा। और फिर मेरे पैर ठिठक गए।
मिट्टी की गंध मेरी नाक में घुसी। ताज़ी खोदी हुई मिट्टी की। ऊपर की परत अभी गीली थी — कच्ची, बिना सूखी।
मैं झुका। पत्थर के पास की मिट्टी पर मेरी उँगली गई। वो अंदर तक ढीली थी, जैसे किसी ने अभी-अभी हाथ डाला हो।
"मीरा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ बैठ गई। "ये मिट्टी ताज़ी है।"
वो तुरंत मेरे पास आई। "कितनी ताज़ी?"
"आज रात की," मैंने कहा, और मेरी नाक फिर ज़ोर से भर गई। "किसी ने यहाँ रात में ही खोदा है।"
कालू काका आगे आए। उनके चेहरे का रंग उड़ गया।
"कब्र खोदी है?" उन्होंने कहा। "किसने?"
मैंने अपना हाथ मिट्टी में डाला। नीचे अंधेरा था। मेरी उँगलियाँ किसी चीज़ से टकराईं — सूखी, चिकनी। मैंने उसे बाहर निकाला।
एक पुरानी हड्डी। टूटी हुई। पीली पड़ चुकी।
"काका," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँप रही थी। "इस कब्र में कुछ नहीं है। रामलाल के बेटे की हड्डियाँ गायब हैं।"
टिंकू ने पीछे से कहा, "भैया… उस तरफ़ कुछ रखा है।"
हम सब पलटे। पीपल के पीछे, घास पर, एक छोटी पीतल की थाली रखी थी। उसमें हल्दी, कुछ बाल, और एक चिट्ठी।
मैंने चिट्ठी उठाई। उसमें बस एक लाइन थी, और वो लाइन मेरे दिल तक सीधी गई।
"हड्डियाँ मेरे पास हैं। अदालत में गवाही देनी है तो पहले मुझसे मिलो — माधव सिंह।"
॥
चिट्ठी मेरे हाथ में काँप रही थी, और मैं उसे पढ़े जा रहा था बार-बार। जैसे कोई आदमी एक ही चोट पर उँगली रखकर देखता रहे कि खून आया या नहीं।
"हड्डियाँ मेरे पास हैं। अदालत में गवाही देनी है तो पहले मुझसे मिलो — माधव सिंह।"
कालू काका ने मेरे कंधे पर हाथ रखा। उनका हाथ भारी था, थका हुआ।
"बेटा," उन्होंने कहा, "ये गड्ढा देख रहा है तू? इसमें कुछ और भी है।"
मैंने नीचे देखा। कब्र का गड्ढा गहरा था, कम से कम चार हाथ। अंदर अंधेरा घुसा बैठा था। पर मेरी नाक कह रही थी कि अंदर सिर्फ़ मिट्टी की गंध नहीं है। कुछ और है। लोहा। जंग लगा लोहा। और उसके नीचे… जला हुआ काग़ज़।
"मीरा," मैंने कहा, "मुझे नीचे जाना है।"
"वीर, रुक—"
पर मैं पहले ही किनारे पर बैठ चुका था। पैर डाले और उतर गया। गड्ढे की मिट्टी ठंडी थी, सीलन भरी। मेरी चप्पल फँस गई, मैंने उसे वहीं छोड़ दिया और नंगे पैर नीचे टटोला।
अंदर घुसते ही साँस घुटने लगी। ऊपर से आसमान एक छोटा-सा टुकड़ा दिख रहा था, बाकी सब अंधेरा।
मैंने हाथ बढ़ाया। मिट्टी में कुछ सख़्त मिला। मैंने उँगलियों से मिट्टी हटाई तो लोहे का एक डिब्बा निकला — छोटा, पुराना, जिस पर जंग ने अपने दाँत गड़ा दिए थे। डिब्बे का ढक्कन पूरा जम चुका था। मैंने दोनों हाथों से खींचा, फिर पत्थर से ठोका। तीसरी बार में ढक्कन खुला, और अंदर से एक गंध निकली जिसने मेरे पेट को झटका दे दिया।
जला काग़ज़। पुराना जला काग़ज़। वही गंध जो आँगन में मिली जली चिट्ठी से आई थी। वही गंध जो उस बीस साल पुराने आदमी की थी।
"क्या मिला?" ऊपर से मीरा की आवाज़ आई।
"एक डिब्बा," मैंने कहा। "और इसमें… एक कॉपी है। आधी जली।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno