Spirit of a Fighter – Chapter 762
चिट्ठी मेरे हाथ से गिरी, और मैंने उसे उठाने की कोशिश भी नहीं की।
सुरंग में सन्नाटा था। सिर्फ़ व्हीलचेयर के पहियों की आवाज़ आ रही थी — धीरे-धीरे, एक-एक करके, जैसे कोई बहुत थका हुआ आदमी सीढ़ियाँ उतर रहा हो।
रणवीर सिंह मेरे सामने रुके। उनके हाथ व्हीलचेयर के पहियों पर थे, और उँगलियाँ काँप रही थीं। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा — उस तरह, जैसे कोई बरसों पुरानी तस्वीर को ज़िंदा देख रहा हो।
"तू बड़ा हो गया," उन्होंने कहा। आवाज़ भारी थी, जैसे गले में कुछ फँसा हो।
मैं कुछ नहीं बोला। बोल नहीं सका।
मीरा ने मेरी बाजू पकड़ी। उसकी पकड़ मज़बूत थी — जैसे वो मुझे गिरने से रोक रही हो।
"पापा," वो बोली, और उसकी आवाज़ में एक अलग ही डर था। "आप यहाँ कैसे?"
रणवीर सिंह ने अपनी बेटी की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। जैसे दोनों को एक साथ देखना उनके लिए मुश्किल हो रहा हो।
"बाबा हरिदास ने मुझे बुलाया था," उन्होंने कहा। "कहा कि आज वो दिन आ गया जिसका मैं तीस साल से इंतज़ार कर रहा था।"
बाबा हरिदास पीछे खड़े थे, लालटेन उनके हाथ में थी। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस रणवीर सिंह की तरफ़ देखा — और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो बरसों के बोझ के बाद हल्की हो रही हो।
रणवीर सिंह ने अपना हाथ बढ़ाया। मेरी तरफ़।
मैंने हाथ नहीं बढ़ाया।
"आपने माँ को छोड़ दिया था," मैंने कहा। मेरी आवाज़ कर्कश निकली, जैसे किसी और की हो। "शादी से पहले की रात कसम खाई थी, और सुबह मुड़कर भी नहीं देखा।"
उनका हाथ हवा में रुका रहा। फिर धीरे से नीचे गिरा।
"हाँ," उन्होंने कहा। कोई सफ़ाई नहीं दी। कोई बहाना नहीं बनाया। बस एक शब्द — और उस एक शब्द में सब कुछ था।
माँ ने पीछे से कहा, "रणवीर।"
वो पलटे। माँ दीवार के सहारे खड़ी थीं, पीतल का ढक्कन अब भी उनके सीने से लगा हुआ। उनकी आँखें सूखी थीं, पर चेहरा ऐसा था जैसे बरसों का थकान एक साथ उतर आई हो।
"तू आ गया," माँ ने कहा। "तीस साल बाद।"
"सरस्वती," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई।
"मत बोल," माँ ने कहा। "आज मत बोल। जो बोलना है, वो मिट्टी के सामने बोलना।"
और फिर वो मेरी तरफ़ मुड़ीं।
"बेटा, ये सुरंग अब सुरक्षित नहीं है। माधव के आदमी हर जगह हैं। हमें यहाँ से निकलना है।"
कालू काका आगे आए। उनका चेहरा पसीने से भीगा था, पर आँखों में वो चमक लौट आई थी जो कई एपिसोड से खोई हुई थी।
"मुझे एक जगह पता है," उन्होंने कहा। "नहर के पार, पुरानी मटमैली झोपड़ी। बीस साल पहले वहाँ मल्लाह रहते थे। अब कोई नहीं आता। माधव के आदमी वहाँ नहीं जाते — उन्हें लगता है कि वहाँ भूत है।"
"भूत?" टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में डर और उत्सुकता दोनों थे। "काका, मैं भूत से नहीं डरता, पर अगर वो मिठाई माँगे तो मेरे पास बस दो लड्डू हैं।"
कालू काका ने पहली बार हल्की हँसी निकाली। "वहाँ भूत नहीं है, बेटा। बस डर है जो लोगों ने फैला रखा है।"
हम सुरंग से बाहर निकले। बाहर आसमान में हल्की लाली थी — सुबह हो रही थी। नहर के किनारे की घास ओस से भीगी थी, और मिट्टी की गंध में कुछ ठंडा-ठंडा था।
मैंने एक बार पीछे देखा। रणवीर सिंह अपनी व्हीलचेयर पर थे, और बाबा हरिदास उन्हें धक्का दे रहे थे। माँ उनसे थोड़ी दूर चल रही थीं — न पास, न दूर। बीच में बस इतनी जगह कि तीस साल की खाई दिख जाए।
नहर पार करने के लिए हमें पुराने पुल से जाना पड़ा। पुल की लकड़ियाँ सड़ी हुई थीं और हर कदम पर चरमराती थीं। मैंने माँ का हाथ पकड़ा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और धीरे से मुस्कुराईं — वो मुस्कान जो कहती है, मैं ठीक हूँ, तू चल।
झोपड़ी नहर से थोड़ी दूर थी, ऊँची घास के बीच। दीवारें मटमैली थीं, छत पर पुरानी खपरैल, और दरवाज़े पर एक टूटा हुआ ताला लटक रहा था।
कालू काका ने ताला खोला। अंदर अंधेरा था, और हवा में उमस। टिंकू ने फौरन खिड़की खोली, और सुबह की रोशनी अंदर आई।
अंदर एक चारपाई थी, एक मटका, और कोने में पुरानी रस्सी का ढेर।
"यहाँ कोई आता है?" मीरा ने पूछा।
"नहीं," कालू काका ने कहा। "बीस साल से नहीं।"
मैंने चारों तरफ़ देखा। दीवार पर एक पुरानी तस्वीर लटक रही थी — धुँधली, फटी। मैं पास गया। तस्वीर में एक जवान आदमी खड़ा था, मिट्टी में लिपटा, और उसके कंधे पर हाथ रखे हुए कोई बड़ा आदमी।
मैंने उसे पहचाना। वो बड़ा आदमी रणवीर सिंह थे — बीस साल पहले के।
"ये तस्वीर…" मैंने कहा।
"उस वक़्त की है," रणवीर सिंह ने कहा, जो अब अंदर आ चुके थे। "जब अखाड़ा हमारा था। जब शेर सिंह ज़िंदा था। जब माधव सिंह हमारा साथी था।"
उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मुझे अनजाना नहीं लगा। जैसे कोई अपनी ही कहानी दूसरों की ज़ुबान से सुन रहा हो।
टिंकू ने मटके से पानी निकाला और एक कटोरी में डालकर रामलाल की तरफ़ बढ़ाया।
रामलाल अब तक दरवाज़े के पास खड़े थे। पूरी राह वो कुछ नहीं बोले थे — बस काँपते हाथों से अपने मरे बेटे की तस्वीर सीने से लगाए चले आ रहे थे।
कालू काका ने उन्हें चारपाई पर बैठाया।
"बैठ रामलाल," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो नरमी थी जो सिर्फ़ पुराने साथियों में होती है। "तू बीस साल से इंतज़ार कर रहा था। अब बोल।"
रामलाल बैठे। उनके हाथ चारपाई के किनारे को पकड़े हुए थे, और उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गई थीं।
"मैंने गुनाह किया," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई बहुत दूर से आ रही हो। "तीस साल। तीस साल मैंने चुप रहकर सबसे बड़ा गुनाह किया।"
"कौन सा गुनाह?" मीरा ने पूछा। वो उनके सामने घुटनों के बल बैठ गई। "आपने क्या किया?"
रामलाल ने अपना सिर हिलाया। "मैंने कुछ नहीं किया। यही तो गुनाह है। मैंने कुछ नहीं किया।"
उनकी आँखें फिर भर आईं। वो अपनी जगह से गिरते-गिरते बचे।
मैंने उनके हाथ में पानी का मटका रखा। "पहले पानी पी लो, काका।"
उन्होंने मटका पकड़ा। एक घूँट पिया। फिर अचानक उनका हाथ मेरी कलाई पर आ गया — कसकर, जैसे किसी डूबते आदमी की पकड़ हो।
मैं चौंका।
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें धुँधली थीं, पर उनमें कुछ ऐसा था जो साफ़ दिख रहा था।
"तेरी आवाज़…" वो बोले, और फिर रुक गए। "तेरी आवाज़ बिल्कुल शेर सिंह जैसी है।"
मेरे अंदर कुछ हिला।
"उसी तरह बोलता था वो," रामलाल ने कहा, और उनकी आवाज़ अब फूट रही थी। "धीरे, जैसे हर शब्द तौलकर। और जब हँसता था… जब हँसता था तो पूरा अखाड़ा हँसता था।"
वो रो पड़े। बूढ़े आदमी का रोना — जिसने तीस साल अपने अंदर दबा रखा हो। कंधे हिल रहे थे, और आवाज़ गले में ही रुक गई थी।
टिंकू ने पास आकर कहा, "काका, पहले पानी पी लो। फिर जो कहना है कहो। मैं नहीं तो वीर सुन लेगा, और वीर के सुनने का तरीका थोड़ा अलग है।"
इस पर रामलाल की हँसी फूट पड़ी — रोने के बीच से, जैसे बरसों बाद। उन्होंने आँखें पोंछीं और मटके से फिर पानी पिया।
"तू ठीक है," उन्होंने टिंकू से कहा। "तेरी बातों में मिठास है। तू मिठाई बनाता है न?"
टिंकू का चेहरा खिल गया। "काका, अब आप मेरे दिल की बात कह दी।"
उसकी बात सुनकर माँ की आँखों में भी हल्की हँसी आई।
मीरा ने रामलाल के सामने बैठकर धीरे से पूछा, "काका, उस रात — जब आप छत पर थे — आपने क्या देखा था?"
रामलाल की मुस्कान मिट गई। उनका चेहरा फिर गंभीर हो गया।
"मैं छत पर था," उन्होंने कहा। "रोज़ रात की तरह। चौकीदार था — अखाड़े की छत पर बैठकर पहरा देता था। उस रात आसमान साफ़ था, तारे दिख रहे थे।"
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