Spirit of a Fighter – Chapter 757
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके चेहरे पर वही मुस्कान थी, पर आँखें गंभीर थीं।
"टिंकू…" मैंने कहा।
"मैं जानता हूँ, ये तेरा हक़ है," उसने कहा। "पर तू मेरा भाई है। और भाई के हाथ जब काँपें, तो दूसरे भाई को उठाना पड़ता है।"
उसने बूढ़े के हाथ से चिट्ठी ली।
उसने उसे खोला। धीरे से, किनारे से। काग़ज़ पुराना था, इसलिए वो बहुत सँभालकर खोल रहा था, जैसे कोई पुरानी रोटी तोड़ रहा हो।
उसकी आँखें पंक्तियों पर चलीं।
और फिर उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। मुस्कान गायब हो गई, होंठ खुले रह गए, और उसके हाथ से काग़ज़ फड़फड़ाया।
"टिंकू?" मैंने कहा। "क्या लिखा है?"
वो मेरी तरफ़ देखने से बच रहा था। उसने चिट्ठी को सीने से लगा लिया, जैसे उसे छिपाना चाहता हो।
"टिंकू, बोल।"
"भाई…" उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने उसका गला पकड़ लिया हो। "ये चिट्ठी तो…"
वो रुक गया। उसने एक बार माँ की तरफ़ देखा, फिर बूढ़े की तरफ़, फिर मेरी तरफ़।
"ये चिट्ठी तो रणवीर सिंह की लिखाई में है।"
मेरे पैरों तले की ज़मीन फिर खिसकी।
"क्या बक रहा है तू?" मैंने कहा। "रणवीर सिंह? मीरा के पिता?"
"मैंने उनकी लिखाई बहुत बार देखी है," टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़। "अखाड़े के काग़ज़ों पर, रसीदों पर, उनकी टूटी घड़ी के नीचे रखी डायरी में। ये उन्हीं का हाथ है। मैं इसे गलत नहीं पढ़ सकता।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
वो खड़ी थी, बिलकुल स्थिर, जैसे कोई मूर्ति। फिर उसने धीरे से कहा, "मुझे दो।"
टिंकू ने चिट्ठी उसकी तरफ़ बढ़ाई। मीरा ने उसे लिया और पढ़ने लगी। उसके चेहरे पर पहले शक था, फिर हैरानी, फिर कुछ ऐसा जो मैंने उसके चेहरे पर कभी नहीं देखा — दर्द।
"ये सच है," उसने धीरे से कहा। "ये मेरे पापा की लिखाई है। पर…"
"पर क्या?" मैंने पूछा।
"पर ये चिट्ठी उन्होंने तीस साल पहले लिखी थी।" उसने काग़ज़ के नीचे की तरफ़ देखा। "नीचे तारीख़ है। और ये किसी को संबोधित करके लिखी गई है।"
"किसको?" मैंने पूछा।
मीरा ने चिट्ठी को सीने से लगाया। उसकी आँखें भर आई थीं।
"मेरे पापा ने ये चिट्ठी अपने ही हाथ से लिखी थी… अपने ही बारे में।"
मैं समझा नहीं।
मीरा ने चिट्ठी को मेरी तरफ़ बढ़ाया, और उसकी आवाज़ टूट रही थी।
"वीर, ये चिट्ठी मेरे पापा ने खुद को लिखी थी। ये उनका इकरारनामा है।"
मैंने चिट्ठी पकड़ी। इस बार मेरे हाथ नहीं काँपे। मैंने उसे पढ़ा।
और जो पढ़ा, वो मेरे दिल में ऐसा उतरा जैसे कोई मिट्टी खोदकर मेरे भीतर से कुछ निकाल रहा हो।
चिट्ठी पर लिखा था — "मैं रणवीर सिंह, इस बात का इकरार करता हूँ कि शेर सिंह का बेटा मेरा नहीं है। वो बच्चा मेरे घर में पैदा हुआ था, पर उसका बाप मैं नहीं हूँ। उसका बाप कोई और है, जिसका नाम मैं आज नहीं लिखूँगा, क्योंकि अगर ये बात खुली, तो रामपुर की मिट्टी खून से रंग जाएगी। मैं उस बच्चे को अपना नाम देता हूँ, पर मेरा हक़ उस पर नहीं है। मेरा हक़ सिर्फ़ इतना है कि मैं उसे अपनी बेटी का भाई कहूँ। और मेरी बेटी जब बड़ी हो, तो उसे ये सच बताया जाए — पर तभी, जब वक़्त आए।"
मैंने पढ़ना रोक दिया।
मेरे हाथ में वो काग़ज़ था, और मुझे लगा जैसे मैं किसी और की कहानी पढ़ रहा हूँ। पर वो मेरी ही कहानी थी।
"तो…" मेरी आवाज़ निकली, किसी दूर से। "तो मैं रणवीर सिंह का बेटा हूँ?"
"नहीं," बूढ़े ने कहा। "तू रणवीर सिंह का बेटा नहीं है। रणवीर ने तुझे अपना नाम दिया, पर वो तेरा बाप नहीं है।"
"फिर कौन है?" मैंने चिल्लाकर कहा। मेरी आवाज़ आँगन में गूंजी, और गुड़िया डरकर माँ से चिपक गई। "कौन है मेरा बाप? तीन आदमी हैं इस कहानी में — शेर सिंह, रणवीर सिंह, और माधव सिंह। शेर सिंह मेरे पापा थे, और अब तुम कह रहे हो वो मेरे बाप नहीं थे। रणवीर सिंह ने लिखा है वो भी नहीं हैं। तो क्या माधव…"
"नहीं," बूढ़े ने कहा। उनकी आवाज़ सख़्त हो गई। "माधव सिंह तेरा बाप नहीं है। माधव सिंह तो एक ज़हर है, जो हर रिश्ते में घुल गया।"
"तो फिर कौन?" मैंने कहा। "कौन है मेरा बाप? या मैं किसी का बेटा ही नहीं हूँ?"
माँ ने तब आवाज़ दी।
"वीर।"
मैं पलटा। माँ आँगन के बीच खड़ी थीं, और उनकी आँखें सूख चुकी थीं। उनके चेहरे पर वो शांति थी जो बहुत बड़े दर्द के बाद आती है।
"मैं बताऊँगी," उन्होंने कहा। "अब मैं बताऊँगी। पर तू मेरी एक बात सुन ले।"
"क्या?"
"जो आदमी तेरा बाप है, वो इस गाँव में नहीं है। और शायद इस दुनिया में भी नहीं।" उन्होंने कहा। "पर उसने तुझे मुझे दिया था — अपनी जान बचाकर। और मैंने तुझे अपनी जान से बड़ा माना।"
मैं चुप हो गया।
तभी गली के मोड़ से आवाज़ आई। किसी ने गेट पर ज़ोर से मुक्का मारा। तीन बार।
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा।
"वीर," उन्होंने कहा। "अंदर आ।"
"नहीं," मैंने कहा। मैंने माँ का हाथ धीरे से छोड़ा, और आँगन की मिट्टी में अपने नंगे पैर जमा लिए। "अब नहीं। जो सच मैंने बीस साल में नहीं सुना, वो अब मेरे घर के दरवाज़े पर आकर मुझे डराएगा — ये नहीं होगा।"
मैंने गेट की तरफ़ कदम बढ़ाया।
पीछे से बूढ़े ने कहा, "वीर, रुक। वो लोग शीशी लेकर आए हैं। तेरे पास हथियार नहीं है।"
"मेरे पास एक चीज़ है," मैंने कहा। मैंने पलटकर उनकी तरफ़ देखा। "मेरी नाक।"
और मैंने गेट खोल दिया।
बाहर दो आदमी खड़े थे। एक लंगड़ा था, हाथ में पुरानी पीतल की लालटेन, और दूसरा — सफ़ेद मूँछों वाला बड़ा आदमी, जिसकी आँखों में वो ठंडक थी जो कुएँ की तली में होती है। उसके हाथ में एक छोटी शीशी थी, नीली।
"वीर सिंह?" उसने कहा। आवाज़ मीठी थी, जैसे गुड़ घोल दिया हो। "मैं माधव सिंह का आदमी हूँ। तुझे सलाम कहने आया हूँ।"
"सलाम रख अपने पास," मैंने कहा। "बोल क्या चाहिए।"
वो हँसा। बड़ी, गरम हँसी, जो अंदर तक नहीं पहुँचती।
"तेरे पास एक चीज़ है जो हमारी है," उसने कहा। "एक चिट्ठी। और एक चाबी। दोनों दे दे, और हम चले जाएँगे।"
"चाबी तो हरनाम की मुट्ठी में थी," मैंने कहा। "और चिट्ठी…"
मैंने पलटकर देखा। बूढ़ा मेरे पीछे खड़ा था, और उसने मेरी तरफ़ देखकर धीरे से सिर हिलाया — नहीं।
"चिट्ठी मेरे पास नहीं है," मैंने कहा।
"झूठ," लंगड़े ने कहा। उसकी आवाज़ में वो चीख़ थी जो सिर्फ़ डर से आती है। "हमने देखा है। बूढ़े ने उसे दिया है।"
"तो अब देख लो," मैंने कहा, और अपनी जेबें खींच दीं। "कुछ नहीं है।"
सफ़ेद मूँछों वाले ने शीशी को हवा में उठाया।
"वीर सिंह," उसने कहा। "ये शीशी तेरी माँ के नाम की है। माधव सिंह ने कहा है — अगर चिट्ठी और चाबी नहीं मिली, तो ये शीशी तेरे घर के कुएँ में खाली कर दी जाए। तेरी माँ, तेरी बहन, तेरा गाँव — सब पीएँगे।"
मेरी साँस रुक गई।
मैंने शीशी की तरफ़ देखा। नीली, छोटी, और उसकी गंध — गुड़ जैसी मिठास, जो मैंने हरनाम की दुकान में पहचानी थी। मुझे पता था कि इसकी एक बूँद क्या कर सकती है।
"तू इतना बड़ा काम नहीं कर सकता," मैंने कहा। मेरी आवाज़ शांत रखने की कोशिश कर रहा था, पर मेरे हाथ काँप रहे थे।
"क्यों नहीं?" वो बोला। "तेरे पापा को करके दिखाया था। तेरे रणवीर सिंह को करके दिखाया था।"
मैंने एक कदम आगे रखा।
"मेरे पापा को?" मैंने कहा।
"शेर सिंह," उसने कहा, और उसके होंठ पर मुस्कान आई। "उस रात उसने भी यही कहा था। 'तू इतना बड़ा काम नहीं कर सकता।' और फिर…"
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