Spirit of a Fighter – Chapter 754
"तेरी असली माँ," उसने कहा, "वो औरत है जो कल तेरे दरवाज़े पर आई थी। काली साड़ी में। जिसने कहा कि तेरा बाप मर गया।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"वो… वो कौन है?"
"उसका नाम कमला है," उसने कहा। "और वो माधव सिंह की बहन है। भैरव की बुआ।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।
"तो फिर मैं…" मैंने धीरे से कहा।
"तू माधव सिंह का भांजा है," बूढ़े ने कहा। "और भैरव तेरा ममेरा भाई।"
मैंने अपना हाथ उसके हाथ से छुड़ाया और खड़ा हो गया।
"ये झूठ है," मैंने कहा। "ये सब झूठ है। तू मुझे फँसाने की कोशिश कर रहा है। तू भैरव का आदमी है।"
"वीर—"
"नहीं!" मैंने कहा। "मेरी माँ ने मुझे पाला है। मेरी माँ ने मेरे लिए चक्की चलाई है। मेरी माँ ने अपने हाथों से मेरी बीमारी में रातें काटी हैं। और तू कहता है कि वो मेरी माँ नहीं है?"
मेरी आवाज़ टूट रही थी।
"वो मेरी माँ है," मैंने कहा। "जिसने मुझे जना नहीं, उससे ज़्यादा माँ है वो।"
बूढ़े ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में कुछ बदला।
"तू सही कहता है," उसने कहा। "माफ़ कर दे। मैंने ग़लत कहा। सरस्वती तेरी माँ है। वो एक ही माँ है जो तुझे पता है। पर सच ये है कि कमला ने तुझे जना है। और उसने तुझे छोड़ा नहीं था — उससे तुझे छीना गया था।"
"किसने छीना?"
"माधव ने," उसने कहा। "क्योंकि तू शेर सिंह का बेटा था। और माधव को डर था कि अगर तू बड़ा हुआ, तो तू अपने बाप की मौत का बदला लेगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "वीर, इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, हमें ये जानना होगा कि ये आदमी सच बोल रहा है या झूठ।"
"सही कहा," मैंने कहा। मैंने बूढ़े की तरफ़ देखा। "तू साबित कर। साबित कर कि तू मेरा पापा है।"
बूढ़ा मुस्कुराया। फिर उसने अपनी धोती का छोर उठाया और अपना बायाँ कंधा दिखाया।
वहाँ एक निशान था — पुराना, जला हुआ, किसी चीज़ से बना हुआ।
"याद है?" उसने पूछा। "जब तू पाँच साल का था, तू मेरे पास आया था, रात में, डरकर। तूने कहा था — 'पापा, मुझे भूत दिखा।' मैंने तुझे गोद में उठाया और कहा — 'भूत नहीं होते।' और तूने मेरे कंधे पर अपना दाँत गड़ा दिया था। इतना ज़ोर से कि खून निकल आया था।"
मेरी आँखें भर आईं।
"ये… ये निशान मैंने बनाया था," मैंने धीरे से कहा।
"हाँ," उसने कहा। "और ये निशान आज भी है। क्योंकि सच नहीं मिटता।"
मैं उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया।
"पापा," मैंने कहा। आवाज़ मेरी निकली, पर वो किसी और की लग रही थी।
उसने मेरा सिर सहलाया। "बेटा।"
हम दोनों चुप हो गए। दीयों की लौ फड़फड़ा रही थी।
फिर बूढ़े ने मेरी तरफ़ देखा और कहा, "अब तू मुझे बता। तेरे पापा ने — मैंने — मरते वक़्त तेरी माँ के कान में क्या कहा था?"
मैंने आँखें पोंछीं। "माँ ने कभी नहीं बताया।"
"कभी नहीं बताया?"
"नहीं।"
बूढ़े ने गहरी साँस ली। "तो फिर मैं बताता हूँ। मैंने उस रात, मरने से पहले, सरस्वती के कान में कहा था — 'बेटे को मत बताना कि मैं ज़िंदा हूँ। जब वक़्त आएगा, तब खुद बताऊँगा।'"
"और तूने क्यों नहीं बताया?" मैंने पूछा। "इतने साल?"
"क्योंकि अगर मैं अपने चेहरे से तेरे सामने आता," उसने कहा, "तो माधव को पता चल जाता कि मैं ज़िंदा हूँ। और वो तुझे उसी रात मार देता।"
वो उठा और दीवार की तरफ़ बढ़ा।
"मैंने तुझे बचाने के लिए अपना चेहरा बदला," उसने कहा। "मैंने रघुवीर का चेहरा पहना। मैंने रघुवीर का नाम लिया। मैंने रघुवीर की तरह बोलना सीखा। इतना कि मैं खुद भूल गया कि मैं कौन हूँ।"
उसने दीवार पर हाथ रखा।
"और अब," उसने कहा, "वक़्त आ गया है।"
"किस बात का?"
"उस बात का," उसने कहा और पलटा, "जिसके लिए मैं तीस साल से इंतज़ार कर रहा था। माधव सिंह को उसी मिट्टी में गिराने का, जिसे उसने ज़हर से सींचा है।"
उसकी आँखों में वो आग थी जो सिर्फ़ बदले की होती है। और मैंने पहली बार सोचा — क्या ये आदमी सच में मेरा पापा है? या सिर्फ़ एक ऐसा आदमी जिसने तीस साल तक बदले की आग में खुद को ज़िंदा रखा?
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल था — "तुम क्या सोच रहे हो?"
मैंने धीरे से उसका हाथ दबाया — "बाद में।"
"पापा," मैंने कहा। "एक बात पूछूँ?"
"पूछ।"
"तूने माँ को क्यों नहीं बताया कि तू ज़िंदा है? इतने साल? वो रोज़ रात को तेरी तस्वीर के सामने बैठती है। वो रोज़ तेरे नाम की रोटी बनाती है।"
बूढ़े का चेहरा बदल गया।
"क्योंकि," उसने धीरे से कहा, "अगर मैंने उसे बताया होता, तो वो मेरे पास आ जाती। और माधव को पता चल जाता। और माधव… माधव तेरी माँ को कभी नहीं छोड़ता। वो उसे बंधक बना लेता।"
वो रुका।
"मैंने सोचा," उसने कहा, "कि अगर मैं चुप रहूँगा, तो वो सुरक्षित रहेगी। पर मैं ग़लत था। मैं हर रोज़ उसे चक्की चलाते देखता था, और कुछ नहीं कर पाता था।"
उसकी आवाज़ टूट गई।
"तूने उसे देखा?" मैंने पूछा। "तूने माँ को देखा?"
"रोज़," उसने कहा। "रोज़ सुबह, जब वो चक्की चलाती है, मैं उस पेड़ के पीछे खड़ा होता हूँ जो तेरे घर के बाहर है। और मैं उसे देखता हूँ। और मैं खुद से कहता हूँ — 'आज बता दूँ।' पर फिर मैं डर जाता हूँ।"
मेरे दिल में कुछ टूटा।
"तूने मुझे क्यों नहीं बताया?" मैंने पूछा। "मैं तेरा बेटा हूँ। मैं तुझे देख सकता था।"
"क्योंकि तू माधव की नज़र में था," उसने कहा। "तू अखाड़े के बाहर खड़ा होता था, और मैं जानता था कि माधव के आदमी तुझे देख रहे हैं। अगर मैंने तुझसे बात की, तो वो मेरा पता लगा लेते।"
वो मेरे पास आया और मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"पर अब नहीं," उसने कहा। "अब मैं थक गया हूँ। अब मैं छुपना नहीं चाहता।"
"तो फिर क्या करना है?" मैंने पूछा।
उसने दीवार पर टंगी तस्वीर की तरफ़ देखा।
"माधव सिंह को ये साबित करना है," उसने कहा, "कि वो जो कुर्सी पर बैठा है, वो उसकी नहीं है। उस कुर्सी पर बैठने का हक़ सिर्फ़ उस आदमी को है जिसने मिट्टी में पसीना डाला है। और वो तू है, वीर।"
"मैं?" मैंने कहा। "मैं तो अभी खुद को साबित नहीं कर पाया।"
"तूने जो किया है," उसने कहा, "वो बहुत है। तूने अखाड़े के ज़हर को उजागर किया। तूने भैरव को टूटने पर मजबूर किया। तूने माधव के झूठ को खोला।"
वो रुका।
"पर एक चीज़ बाकी है," उसने कहा।
"क्या?"
"तेरा अपना सच।"
वो मेरी आँखों में देखने लगा।
"माधव ने तुझे शेर सिंह का बेटा बताकर पाला है। पर सच ये है कि तू शेर सिंह और कमला का बेटा है। और कमला माधव की बहन है। इसका मतलब ये हुआ कि माधव तेरा मामा है। और भैरव तेरा ममेरा भाई।"
मैंने अपना सिर हिलाया। "ये तो तूने बता दिया।"
"पर एक बात है," उसने कहा, "जो तुझे नहीं पता।"
वो फिर रुका। और इस बार उसकी आँखों में कुछ और था। डर।
"क्या?" मैंने पूछा।
"भैरव को भी नहीं पता," उसने कहा। "कि उसका बाप माधव सिंह नहीं है।"
कमरे में सन्नाटा छा गया।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या कह रहे हैं ये?"
"मैं कह रहा हूँ," बूढ़े ने कहा, "कि भैरव का बाप कोई और है। और वो कोई और… मैं हूँ।"
मेरा सिर घूम गया।
"तू… तू भैरव का बाप है?" मैंने कहा।
"नहीं," उसने कहा। "मैं भैरव का बाप नहीं हूँ। मैं भैरव का सच्चा बाप नहीं हूँ। पर माधव ने सबको यही बताया कि भैरव उसका बेटा है। जबकि सच ये है कि भैरव एक औरत का बेटा है — वो औरत जो बीस साल पहले अखाड़े में आई थी।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगा।
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