Spirit of a Fighter – Chapter 753
"वीर?" मीरा ने धीरे से कहा।
"ये तेल नहीं है," मैंने कहा। "ये… किसी की याद है। जमी हुई याद।"
उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी पकड़ मज़बूत हो गई।
हम उस दरार तक पहुँचे। रोशनी अंदर से आ रही थी, पीली और मटमैली, जैसे किसी पुराने दीये की। मैंने सिर झुकाया और अंदर देखा।
एक सुरंग थी। छोटी, तंग, और दीवारों पर वही तेल की परत जमी थी। सुरंग आगे जाकर मुड़ती थी, और वहीं से रोशनी आ रही थी।
"अंदर आ," आवाज़ फिर आई। "डर मत। यहाँ सिर्फ़ मैं हूँ। और मैं तेरा दुश्मन नहीं हूँ।"
मैंने पीछे देखा। चंदन तेल के किनारे बैठा था, आधा जला, और उसकी आँखों में कुछ था जो मुझे रोक रहा था। उसने हाथ उठाया और सिर हिलाया — ना में।
"चंदन," मैंने कहा, "तू क्या कहना चाहता है?"
उसने ज़मीन पर उँगली से लिखा — "वो अंदर है। पर वो वैसा नहीं है जैसा तू सोचता है।"
"कैसा है?"
उसने लिखा — "टूटा हुआ।"
मैंने एक गहरी साँस ली और मीरा का हाथ पकड़कर सुरंग में घुस गया।
सुरंग तंग थी। कंधे दीवारों से रगड़ते थे। मीरा मेरे पीछे थी, और मैं उसकी साँस अपनी गर्दन पर महसूस कर रहा था — तेज़, पर काबू में। वो डरी हुई थी, पर भाग नहीं रही थी। यही बात मुझे उसमें सबसे ज़्यादा पसंद थी।
सुरंग मुड़ी और फिर खुली।
और मैं रुक गया।
एक कमरा था। छोटा, गोल, मिट्टी की दीवारों वाला। छत से ज़मीन तक, हर तरफ़, पुराने दीये जल रहे थे — पचास, सौ, दो सौ से ज़्यादा। इतने दीये कि कमरे में हवा भी गर्म लग रही थी।
और बीच में, एक चटाई पर, एक बूढ़ा आदमी बैठा था।
सफ़ेद दाढ़ी, झुर्रियों से भरा चेहरा, पीली धोती। आँखें बंद थीं और उसके हाथ में माला थी जिसे वो बहुत धीरे फेर रहा था। उसके सामने एक छोटा दीया जल रहा था।
मैं पहले उसके चेहरे को देखता रहा। वो रघुवीर जैसा था। मेरे पापा जैसा। वही नाक, वही ठुड्डी, वही झुकी हुई गर्दन।
पर कुछ अलग था। हड्डियाँ ज़्यादा उभरी हुईं, गाल धँसे हुए, और आँखों के चारों तरफ़ काला घेरा। ऐसा आदमी जो बहुत दिनों से ठीक से सोया न हो।
मैंने मीरा का हाथ छोड़ा और एक कदम आगे बढ़ा।
"तूने मेरे पापा को ज़हर पिलाया," मैंने कहा।
आवाज़ मेरी अपनी थी, पर उसमें वो ज़हर भी था जिसकी बात मैं कर रहा था।
बूढ़े ने माला फेरनी बंद नहीं की। आँखें भी नहीं खोलीं।
"मैंने पिलाया नहीं," उसने कहा। आवाज़ धीमी, जैसे किसी गहरे कुएँ से आ रही हो। "मैंने पीने से रोका। पर तेरे पापा ने खुद पी लिया। क्योंकि उन्हें लगा कि मरकर वो तुझे बचा लेंगे।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। इतना कि दीयों की लौ की आवाज़ सुनाई दे रही थी — हल्की-सी फड़फड़ाहट।
मीरा ने मेरी बाँह पकड़ी।
"किससे बचाएँगे?" उसने पूछा। उसकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो सिर्फ़ सच्चाई की भूख से आती है।
अब बूढ़े ने आँखें खोलीं।
और मैं पीछे हट गया।
क्योंकि उन आँखों में कुछ था। वो आँखें रघुवीर की थीं, पर उनमें रघुवीर का प्यार नहीं था। उनमें बीस साल का इंतज़ार था। तीस साल का दर्द। और कुछ ऐसा जो मैं नाम नहीं दे सकता था।
उसने अपनी माला चटाई पर रखी और धीरे से उठा।
"उससे बचाएँगे," उसने कहा, "जो तेरे पिता की कुर्सी पर बैठना चाहता है।"
वो दीवार की तरफ़ बढ़ा। उसके पैर सुन्न से लग रहे थे, जैसे बहुत दिनों से चले न हों। वो एक तस्वीर के सामने रुका जो दीवार पर टंगी थी, और उसकी तरफ़ इशारा किया।
मैं पास गया।
तस्वीर पुरानी थी, पीली पड़ी हुई। उसमें दो आदमी थे, दोनों जवान, दोनों मिट्टी में हाथ धोते हुए। एक रणवीर सिंह थे — मीरा के पापा। बाल घने, मूँछें काली, आँखों में वो चमक जो अब व्हीलचेयर पर बैठकर भी नहीं गई।
और दूसरा आदमी…
मेरी साँस रुक गई।
"ये…" मीरा ने धीरे से कहा। "ये तो भैरव के पापा हैं।"
"हाँ," बाबा हरिदास ने कहा। "माधव सिंह। जवानी में रणवीर का सबसे पक्का दोस्त। और आज… रणवीर की कुर्सी पर बैठने का सबसे बड़ा ख्वाब देखने वाला।"
मैं तस्वीर को देखता रहा। तीन आदमी थे इस कहानी में — रणवीर, माधव… और मेरे पापा। तीन भाई। एक ने दिया, एक ने लिया, और तीसरा चुप रहा।
"बैठ," बाबा हरिदास ने कहा और अपनी चटाई की तरफ़ इशारा किया। "ये बात खड़े होकर सुनने की नहीं है।"
मैं बैठ गया। मीरा मेरे पास बैठी।
बूढ़े ने मेरी तरफ़ देखा और पहली बार उसके चेहरे पर कुछ नरमी आई। "तू अपने बाप जैसा दिखता है। शेर सिंह जैसा। वो भी ऐसे ही बैठता था — घुटने मोड़कर, हाथ ज़मीन पर। जैसे हमेशा उठने को तैयार हो।"
"तू मेरे पापा को जानता था?" मैंने पूछा।
"जानता था?" उसने हल्की हँसी निकाली, पर उसमें हँसी नहीं थी। "बेटा, मैं तेरे पापा का दोस्त था। दोस्त नहीं… उससे भी बड़ा कुछ।"
वो रुका। उसने अपने हाथों को देखा, जो काँप रहे थे।
"मैं तुझे वो बताऊँगा जो तीस साल से किसी को नहीं बताया। पर पहले तुम मुझे बताओ — तुम्हारे पापा ने मरते वक़्त तुम्हारी माँ के कान में क्या कहा था?"
कमरे में फिर सन्नाटा छा गया।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो भूख थी जो सिर्फ़ एक सच को जानने की होती है।
"तू मुझे पहले बता," मैंने कहा। "तू कौन है?"
बूढ़े ने गहरी साँस ली। "मैं रघुवीर सिंह हूँ।"
मैं उठने ही वाला था कि उसने हाथ उठाया।
"नहीं। मैं रघुवीर सिंह नहीं हूँ। मैंने उसका चेहरा पहना है। तीस साल पहले, जब रघुवीर मर रहा था, उसने मुझे बुलाया और कहा — 'मेरा चेहरा ले ले। मेरा नाम ले ले। और मेरे बेटे को बचा ले।'"
"तू… तू कौन है?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
बूढ़े ने मेरी तरफ़ देखा और उसकी आँखों में पानी आ गया।
"मैं शेर सिंह हूँ," उसने कहा। "मैं तेरा पापा हूँ, वीर।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
मैंने उसके चेहरे को देखा — रघुवीर का चेहरा। फिर उसकी आँखें — शेर सिंह की आँखें। फिर उसके हाथ — वो हाथ जिन्होंने मुझे बचपन में उठाया था, जिन्होंने मुझे चलना सिखाया था।
"झूठ," मैंने कहा। "मेरे पापा मर गए। मैंने उनकी लाश देखी है। मैंने उनका चेहरा जलते देखा है।"
"तूने मेरा चेहरा जलते देखा था," उसने कहा। "पर वो मेरा चेहरा नहीं था। वो रघुवीर का चेहरा था — जो मैंने तेरे बचपन में पहना था। जब तू छोटा था, मैंने तुझे रघुवीर के नाम से पाला। क्योंकि शेर सिंह का बेटा ज़िंदा नहीं रह सकता था।"
मेरा सिर घूमने लगा।
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। "वीर, साँस लो।"
मैंने साँस ली। पर वो अंदर तक नहीं गई।
"तो फिर वो आदमी जो मेरे घर में था?" मैंने पूछा। "जो फूला दादी के साथ आया था? जिसने कहा कि मैं शेर सिंह हूँ?"
"वो धन्नू मल्लाह है," बूढ़े ने कहा। "मेरा पुराना साथी। मैंने उसे बीस साल पहले बचाया था, और उसने मुझे बचाया। पर वो मेरा चेहरा नहीं है। वो सिर्फ़ मेरी आवाज़ की नक़ल कर सकता है।"
"तो फिर असली शेर सिंह कौन है?" मैंने चिल्लाया। "तू है या वो?"
बूढ़े ने अपना हाथ बढ़ाया और मेरे सिर पर रखा। उसका हाथ ठंडा था, पर उसमें वो वज़न था जो सिर्फ़ पिता के हाथ में होता है।
"मैं हूँ," उसने कहा। "और मैं तुझे सब बताऊँगा। पर पहले तू मुझे बता — तेरी माँ ने तुझे क्या बताया? तेरी असली माँ ने?"
मैंने उसकी आँखों में देखा। "मेरी माँ सरस्वती है।"
"नहीं," उसने धीरे से कहा। "सरस्वती ने तुझे जना नहीं। उसने तुझे पाला है। पर तेरी असली माँ…"
वो रुका।
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