Spirit of a Fighter752 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 752

7 min read November 5, 2026

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने अपना बैग खोला और उसमें से एक छोटी सी थैली निकाली — काली मिर्च और तुलसी वाला पाउडर।

"हमारे पास ज़्यादा वक़्त नहीं है," उसने कहा।

"हमारे पास वक़्त है," चंदन ने लिखा। उसकी उँगली अब तेज़ चल रही थी। "बाबा अंदर नहीं आएगा। वो बाहर से बात करेगा। वो कभी अंदर नहीं आता।"

"क्यों?" मैंने पूछा।

"क्योंकि वो इस गड्ढे से डरता है," चंदन ने लिखा। "वो इस तेल से डरता है। ये तेल उसने नहीं बनाया। ये तेल यहाँ पहले से था। बहुत पहले से। और वो जानता है कि अगर वो इसमें उतरेगा, तो वो बाहर नहीं आएगा।"

मेरे रोंगटे खड़े हो गए। "ये तेल किसने बनाया?"

चंदन ने लिखा — "जो लोग यहाँ साधना करते थे। सैकड़ों साल पहले। वो इस तेल को बनाते थे — मिट्टी, जड़ी-बूटी और अपने पसीने से। ये तेल ज़हर नहीं है। ये तेल दवा है।"

"दवा?" मीरा ने कहा। वो आगे आई। "कैसी दवा?"

"जो शरीर से थकान खींच लेती है," चंदन ने लिखा। "जो आदमी इसमें डूबता है, उसके शरीर से सारा ज़हर निकल जाता है। पर सिर्फ़ तभी, जब उसका मन साफ़ हो।"

मैं कुछ देर चुप खड़ा रहा। मेरे शरीर से तेल टपक रहा था, और मेरी आँखें जल रही थीं, और मेरे हाथ काँप रहे थे — पर मेरे अंदर कुछ अलग हो रहा था। मेरी छाती हल्की लग रही थी। जैसे कोई भारी बोझ उतर गया हो।

"मेरा सिर दर्द," मैंने कहा। "वो गया।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "क्या?"

"मेरे सिर में जो दर्द रहता था। जब मैं बहुत ज़्यादा सूंघता था। वो गया।"

मीरा ने मेरी आँखों में देखा। फिर उसने मेरा हाथ पकड़ा और उसे घुमाया। "तेरे हाथ के छाले…"

"वो भी हल्के हैं," मैंने कहा।

मीरा ने चंदन की तरफ़ देखा। "ये तेल सच में दवा है?"

चंदन ने सिर हिलाया। फिर लिखा — "बाबा इसे इसलिए डालता है ताकि कोई अंदर न आए। पर उसे पता नहीं कि ये उसकी सबसे बड़ी गलती है। उसने अपना रास्ता खुद तेल से भर दिया है। और जो इसमें डूबेगा, वो उससे ज़्यादा मज़बूत होकर निकलेगा।"

"तो तुम…" मैंने कहा। "तुम तीस साल से इसी में हो। तुम्हारा शरीर…"

चंदन ने अपनी बाँह उठाई। हड्डी पर चमड़ी। "मेरा शरीर सूख गया," उसने लिखा। "क्योंकि मैंने इसे खाया नहीं। बस इसमें बैठा रहा। ये तेल शरीर से ज़हर निकालता है, पर खाना नहीं देता।"

कालू काका ने कराहकर कहा, "तूने तीस साल से कुछ खाया नहीं?"

"खाया," चंदन ने लिखा। "जो बाबा फेंकता था। रोटी के टुकड़े। कभी-कभी।"

कालू काका ने अपना सिर पीट लिया। "मैं तुझे खाना लाता था, चंदन! रोज़! मैं दीवार के बाहर रोटी रखकर जाता था—"

"वो बाबा उठा लेता था," चंदन ने लिखा। "वो मुझे कभी नहीं देता था।"

कालू काका की आवाज़ फूट पड़ी। "तो तू तीस साल से भूखा है? तीस साल से?"

चंदन ने सिर हिलाया। और फिर उसने अपनी आँख मूँद ली, जैसे ये सब कहकर वो थक गया हो।

मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। टिंकू की आँखें भरी हुई थीं, पर उसने अपनी थैली खोली और उसमें से एक छोटी सी मिठाई निकाली — गोल, पीली, चासनी में डूबी हुई। उसने वो चंदन की तरफ़ बढ़ाई।

"ले," टिंकू ने कहा। "इससे मुँह मीठा होगा। और तू बोल नहीं सकता, तो सुन — मैं टिंकू हूँ। वीर का दोस्त। और आज से तेरा भी।"

चंदन ने मिठाई को देखा। बहुत देर तक देखा। फिर उसने अपना हाथ बढ़ाया और उसे पकड़ लिया। उसके हाथ में मिठाई काँप रही थी।

उसने उसे मुँह में रखा। और फिर उसकी एक आँख से आँसू बहने लगे।

टिंकू ने अपना मुँह फेर लिया। "भाई," उसने धीरे से कहा, "मुझे कुछ नहीं पूछना। बस… बस ये देखकर अजीब लग रहा है।"

"अजीब नहीं," मैंने कहा। "सही लग रहा है।"

तभी बाहर से आवाज़ आई।

नहीं — बाहर से नहीं। ऊपर से। दीवार के पार से। एक आवाज़, बूढ़ी, धीमी, पर साफ़। जैसे कोई पुरानी किताब पढ़ रहा हो।

"शेर सिंह का बेटा आ गया।"

हम सब सन्न रह गए।

"मैं जानता था। मैं तेरा इंतज़ार कर रहा था। बीस साल से नहीं — तीस साल से। जब से तेरे बाप ने मुझे धोखा दिया।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने अपनी थैली कसकर पकड़ ली।

"पर पहले," आवाज़ ने कहा, "तू उस आदमी से मिल ले जो तेरे बाप का दोस्त था। जो तेरे बाप की मौत की रात वहाँ था। वो तुझे वो बताएगा जो तेरे बाप ने मुझसे छुपाया था।"

चंदन ने ज़मीन पर लिखा — "वो झूठ बोल रहा है। वो हमेशा झूठ बोलता है।"

"फिर भी," आवाज़ ने कहा, जैसे उसने चंदन की लिखाई पढ़ ली हो, "सच और झूठ में फ़र्क़ तभी पता चलता है जब दोनों सुन लो।"

और फिर एक आवाज़ आई — लोहे की घिसटने की। जैसे कोई भारी दरवाज़ा खुल रहा हो।

टिंकू ने मेरी बाँह पकड़ ली। "भाई, ये आवाज़ ऊपर से आ रही है।"

"नहीं," चंदन ने लिखा। "ये आवाज़ नीचे से आ रही है। तेल के नीचे से।"

मैंने नीचे देखा। तेल की सतह हिल रही थी। और उसके बीच में, बीचोबीच, एक दरार बन रही थी — जैसे तेल खुद को चीर रहा हो।

और उस दरार से रोशनी आ रही थी। पीली, मटमैली रोशनी।

"वो दरवाज़ा खुल गया," चंदन ने लिखा। "जिसका इंतज़ार वो कर रहा था। अब वो तुम्हें अंदर बुला रहा है।"

कालू काका ने अपने बेटे को छाती से लगाया और मेरी तरफ़ देखा। "वीर, बेटा। मत जा। ये आदमी बीस साल से लोगों को खा रहा है।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। फिर मीरा की तरफ़। फिर उस रोशनी की तरफ़, जो तेल के बीच से आ रही थी।

"काका," मैंने कहा, "मैं इसीलिए आया हूँ।"

मैंने अपनी धोती का छोर कसा, अपनी आँखें पोंछीं, और उस दरार की तरफ़ बढ़ा।

पर मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

"मैं साथ चलूँगी," उसने कहा।

"नहीं—"

"ये बहस नहीं है, वीर सिंह," उसने कहा। "मैंने तुमसे कहा था — अगर तुम डूबे, तो मैं तुम्हें खींचकर बाहर लाऊँगी। और अगर मैं डूबी, तो तुम मुझे खींचकर लाना। ये वादा था।"

मैंने उसकी आँखों में देखा। उसमें डर था — साफ़, सच्चा डर। पर उसके पीछे कुछ और भी था। ज़िद। वो ज़िद जो कहती है — मैं तुम्हें अकेले नहीं जाने दूँगी।

"ठीक है," मैंने कहा।

टिंकू ने भी अपना हाथ बढ़ाया। "मैं भी।"

"तू रुक," मैंने कहा। "तू ऊपर देख। अगर कोई आए, तो आवाज़ दे।"

टिंकू ने पहले कुछ कहना चाहा, फिर उसने अपना सिर हिलाया। "पर भाई, अगर तुम वापस न आए, तो—"

"तब तू मेरी माँ को बता देना," मैंने कहा, "कि मैंने उसका नाम रोशन किया।"

टिंकू ने मुँह फेर लिया। "ये बातें मत कर। तू वापस आएगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुराया। फिर मैंने मीरा का हाथ पकड़ा और उस दरार की तरफ़ बढ़ा।

तेल ने मेरे पैर छुए। इस बार ठंडा नहीं लगा। गर्म लगा। जैसे कोई पुरानी याद।

और जैसे ही मैंने उस रोशनी में पहला कदम रखा, बाबा हरिदास की आवाज़ फिर आई — इस बार करीब से, बहुत करीब से।

"अंदर आ, बेटा। तेरा बाप भी यहीं आया था। और वो भी यही सवाल पूछने आया था जो तू पूछेगा।"

"कौन सा सवाल?" मैंने कहा।

"कि आख़िर तेरी माँ कौन है?"

॥

"कि आख़िर तेरी माँ कौन है?"

बाबा हरिदास की वो बात मेरे सीने में तीर की तरह लगी। मैं उस रोशनी में खड़ा था, पैर तेल में, और मीरा का हाथ मेरे हाथ में। पर मेरा दिमाग़ कहीं और था — उस औरत के पास जो कल शाम आई थी, काली साड़ी में, मेरी तस्वीर लिए, और कह गई कि मेरा बाप मर गया।

मैंने आगे कदम बढ़ाया।

तेल घुटनों तक था। गर्म, चिपचिपा, और उसमें एक गंध थी जो मुझे बचपन से पता थी — पुरानी लकड़ी, जली हुई रोटी, और माँ के हाथ की हल्दी। मैंने आँखें मींच लीं और सूंघा।

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