Spirit of a Fighter751 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 751

7 min read November 5, 2026

टिंकू ने अपनी जेब से रूमाल निकाला और कालू काका की तरफ़ बढ़ाया। फिर रोककर उनके कंधे पर हाथ रख दिया। "काका," उसने कहा, "मेरे पास मिठाई है। थैली में रखी है। ऊपर। मैं लाऊँगा।"

"अभी नहीं, बेटा," कालू काका ने कहा। आवाज़ बैठी हुई थी।

चंदन ने फिर ज़मीन पर लिखा। इस बार बड़े अक्षरों में, ताकि हम सब पढ़ सकें।

"बाबा हरिदास उसी दीवार के पीछे है। रोज़ रात वो इस गड्ढे में तेल डालता है। ऊपर से। एक पाइप से। इसलिए कोई पार नहीं कर सकता। तेल गहरा है, और उसके नीचे सुरंग बंद है।"

"तो ये तेल एक दरवाज़ा है?" मीरा ने पूछा। "और ये दरवाज़ा बंद रखने के लिए वो इसे भरता है?"

चंदन ने सिर हिलाया।

"तो अगर तेल निकल जाए," मैंने कहा, "तो रास्ता खुल जाएगा?"

चंदन ने मेरी तरफ़ देखा। बहुत देर तक देखा। फिर उसने लिखा — "तेल निकलेगा तो बाबा को पता चल जाएगा। और वो यहाँ आ जाएगा। पर…" उसने रुककर फिर लिखा, "वो तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहा है। वो जानता है कि तुम आ रहे हो।"

मेरे पेट में एक ठंडा झटका लगा।

"वो जानता है?" मैंने कहा।

चंदन ने लिखा — "वो हर रोज़ गड्ढे के किनारे खड़ा होकर नीचे देखता है। और कहता है — 'लड़का आएगा। शेर सिंह का लड़का। और वो वही सवाल पूछेगा जो मैं उसके बाप से पूछना चाहता था।'"

कालू काका ने अपना सिर उठाया। "कौन सा सवाल?"

चंदन ने लिखा — "वो मुझे नहीं बताता। पर वो कहता है कि जब लड़का आएगा, तो मैं उसे वो बताऊँगा जो उसके तीनों बाप नहीं जानते थे।"

"तीनों बाप?" टिंकू ने कहा। "तीन बाप कहाँ से आए?"

पर मैं जानता था। शेर सिंह। रघुवीर सिंह। और… और जो भी सच था, जो अभी तक मेरे सामने नहीं आया था। तीन आदमी। तीन भाई, जैसा उस तस्वीर के पीछे लिखा था। एक ने दिया, एक ने लिया, और तीसरा चुप रहा।

"वो कब आएगा?" मैंने पूछा।

चंदन ने लिखा — "तुम यहाँ आ चुके हो। वो जानता है। वो बस इंतज़ार कर रहा है कि तुम तेल से बाहर आओ।"

मैं खड़ा हो गया। मेरे कपड़ों से तेल टपक रहा था, मेरे बाल चिपके हुए थे, मेरी आँखें जल रही थीं। पर मैं खड़ा था।

"तो फिर इंतज़ार क्यों?" मैंने कहा। "चलो, तेल निकालते हैं।"

"रुक," मीरा ने कहा। वो मेरे पास आई और उसने मेरी बाँह पकड़ी। "तुम इस हाल में कहीं नहीं जा रहे। तुमने तेल पी लिया है, वीर। तुम्हारी आँखें लाल हैं। तुम्हारे हाथ काँप रहे हैं।"

"मेरे हाथ नहीं काँप रहे," मैंने कहा।

"देखो," उसने कहा, और मेरा हाथ उठाकर मेरी आँखों के सामने किया।

वो काँप रहा था। सच में।

मैंने अपना हाथ नीचे किया। "तेल ठंडा है," मैंने कहा। "बस इसीलिए।"

मीरा ने मेरी आँखों में देखा। वो जानती थी कि मैं झूठ बोल रहा हूँ। पर उसने बहस नहीं की।

"टिंकू," उसने कहा, "तू ऊपर जाकर देख, कोई आ न रहा हो। और हाँ — तू चूल्हा जलाने वाली लकड़ी ले आ। और तेल में डुबोने के लिए कोई पुराना कपड़ा।"

"कपड़ा?" टिंकू ने कहा। "कपड़े का क्या करेगी?"

"हम तेल को जलाएँगे नहीं," मीरा ने कहा। "हम उसे सोखेंगे। और जो बचेगा, उसे लकड़ी से खींचकर बाहर निकालेंगे। उसके पास कितना तेल है?"

चंदन ने लिखा — "बहुत। रोज़ डालता है। कभी नहीं निकालता।"

"तो कितना?"

चंदन ने अपनी उँगली से ज़मीन पर एक घेरा बनाया, फिर उसके अंदर एक और, फिर एक और। चार घेरे। फिर उसने अपनी हथेली घेरों के बाहर रखी और सिर हिलाया।

"चार लोग जितना गहरा?" टिंकू ने कहा।

चंदन ने सिर हिलाया।

"हे भगवान," टिंकू ने कहा। "तो ये तेल का गड्ढा नहीं, तेल का कुआँ है।"

"कुआँ," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ अचानक बदल गई। "ये कुआँ है। असली कुआँ। जिसे बाबा ने तेल से भर दिया।"

मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। "तुम्हें पता था?"

"मुझे शक था," उन्होंने कहा। "पर मैं कभी यहाँ तक नहीं आया। मुझे डर था कि कहीं मैं चंदन को देखकर… देखकर टूट न जाऊँ। और अगर मैं टूटा, तो बाबा को पता चल जाता।"

चंदन ने अपने बाप की तरफ़ देखा। उसकी एक आँख में कुछ ऐसा था जो मैं समझ गया — ये वो आदमी था जिसने तीस साल एक ऐसी जगह बिताए जहाँ उसका बाप उसे देख नहीं सकता था, सिर्फ़ सुन सकता था। और उसने कभी आवाज़ नहीं की। क्योंकि अगर वो आवाज़ करता, तो उसका बाप मर जाता।

मैंने अपना हाथ उसके कंधे पर रखा। "चंदन," मैंने कहा। "मैं तुम्हें यहाँ से निकालकर ले जाऊँगा। और तुम्हारे बाप को भी। और जो उसने तुम्हारे साथ किया है, उसका हिसाब भी लूँगा।"

चंदन ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने ज़मीन पर लिखा — "पहले उसकी बात सुन लो। फिर हिसाब लेना।"

"क्यों?"

उसने लिखा — "क्योंकि उसकी बात सुनकर तुम्हारा हिसाब बदल जाएगा।"

टिंकू ऊपर गया। मैं और मीरा चंदन के पास बैठे रहे। कालू काका ने अपने बेटे का सिर अपनी गोद में रख लिया था और उसके बालों में हाथ फेर रहे थे — जो बाल बचे थे, जो जले नहीं थे।

"तेरी माँ," कालू काका ने धीरे से कहा। "तेरी माँ ने तुझे ढूँढा। सालों ढूँढा। हर मेले में जाती थी, हर अखाड़े के बाहर खड़ी होती थी। और जब कोई पहलवान मरता, तो वो दौड़कर जाती थी — ये सोचकर कि कहीं तू हो।"

चंदन की आँख से पानी बहने लगा।

"और आठ साल पहले," कालू काका ने कहा, "वो चली गई। बुख़ार से। पर मुझे पता है, वो बुख़ार नहीं था। वो तेरे इंतज़ार में मर गई।"

चंदन ने अपना हाथ उठाया और अपने बाप की कलाई पकड़ ली। उसने ज़मीन पर लिखा — "मुझे पता था। मैंने उसकी आवाज़ सुनी थी। एक रात वो इसी दीवार के ऊपर से आवाज़ दे रही थी — 'चंदन, तू कहाँ है?' और मैं तेल के अंदर बैठा रहा। मैं बाहर नहीं आया। क्योंकि अगर मैं आता, तो बाबा उसे मार देता।"

कालू काका ने कोई जवाब नहीं दिया। वो बस अपने बेटे को और कसकर पकड़ लिया।

मीरा उठकर दीवार के पास गई और उसने अपना हाथ उस पर रख दिया। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।

"वीर," उसने कहा। "ये दीवार सिर्फ़ पत्थर की नहीं है।"

"मतलब?"

"इस पर कुछ लिखा है। बहुत पुरानी लिखाई। मिट्टी से ढकी हुई है।"

मैं उसके पास गया। मीरा ने अपनी आस्तीन से दीवार पर फेरा, और मिट्टी हटने लगी। नीचे से पत्थर पर खुदे हुए अक्षर निकलने लगे। पुराने, टेढ़े-मेढ़े, जैसे किसी ने नाखून से खोदे हों।

मैंने पढ़ना शुरू किया। "जो यहाँ आए… वो अपना नाम भूल जाए…"

नीचे और लिखा था। मीरा ने और मिट्टी हटाई।

"मिट्टी सब कुछ जानती है। मिट्टी किसी से नहीं डरती। जो मिट्टी से लड़ेगा, वो मिट्टी में मिल जाएगा।"

और उसके नीचे, छोटे अक्षरों में, एक तारीख़ थी। मैंने उसे देखा और मेरी साँस रुक गई।

वो तारीख़ आज की थी।

"मीरा," मैंने कहा। "ये आज खोदा गया है।"

मीरा ने करीब से देखा। उसने अपनी उँगली उन अक्षरों पर फेरी और उसकी उँगली पर ताज़ा पत्थर की धूल लग गई।

"आज सुबह," उसने कहा। "या कल रात।"

"मतलब वो जानता है कि हम आज आएँगे।"

"वो नहीं जानता कि हम आज आएँगे," मीरा ने कहा। "वो जानता है कि तुम आज आओगे। बस तुम।"

मैंने पीछे मुड़कर देखा। चंदन मेरी तरफ़ देख रहा था। उसने धीरे से सिर हिलाया। वो पहले से जानता था।

तभी टिंकू ऊपर से लौटा। उसके हाथ में लकड़ी के टुकड़े थे और एक पुराना कपड़ा। पर उसका चेहरा उतरा हुआ था।

"भाई," उसने कहा। "ऊपर कोई है।"

मैं सीधा खड़ा हो गया। "कौन?"

"पता नहीं। पर मुझे दीवार के बाहर से आवाज़ आई। किसी के चलने की। और उसके साथ… लोहे की घिसटने की आवाज़। जैसे कोई पुराना दरवाज़ा खुल रहा हो।"

"कितनी दूर?"

"बहुत पास।"

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