Spirit of a Fighter – Chapter 750
और उसी पल, तेल के नीचे से एक हाथ निकला और मेरा पैर पकड़ लिया।
नहीं — पकड़ा नहीं। जकड़ लिया।
मैंने एक झटका खाया और नीचे जाने लगा। मेरा पूरा शरीर एक झटके में कमर से नीचे तेल में चला गया, और मेरे होंठ तेल के सतह के बस ऊपर थे, और मेरी नाक से एक बार साँस निकली — और मैंने सुना, बहुत दूर से, मीरा की आवाज़ — "वीर!"
मैंने अपना हाथ ऊपर किया और किसी का हाथ पकड़ा — कोई ऊपर से खींच रहा था। मीरा। या टिंकू। पता नहीं।
और नीचे, तेल में, वो हाथ मेरे पैर से चिपका हुआ था। ठंडा। नाखून मेरी एड़ी में धँसे हुए। और फिर मुझे सुनाई दी — एक आवाज़, तेल के अंदर से, दबी हुई, जैसे कोई पानी के नीचे गा रहा हो।
"बेटा।"
मेरे शरीर में खून जम गया।
"बेटा," वो फिर बोली। "मैं तेरा पापा हूँ।"
और मैंने तेल के अंदर अपनी आँखें खोल दीं।
॥
तेल मेरी आँखों में घुस गया और जलन ऐसी हुई जैसे किसी ने मिर्च पीसकर डाल दी हो। पर मैंने आँखें बंद नहीं कीं। मैंने उस अंधेरे में देखा, तेल के नीचे, जहाँ सिर्फ़ एक धुँधली सी परछाई हिल रही थी।
एक चेहरा।
आधा चेहरा। बाकी आधा ऐसा जैसे मोम पिघलकर बह गया हो। एक आँख थी, दूसरी जगह सिर्फ़ चमड़ी का खिंचा हुआ परदा। होंठ नहीं थे — बस एक पतली सी लकीर, जैसे कोई धागे से सिल गया हो।
और वो मेरा पैर पकड़े हुए था, पर अब ज़ोर नहीं लगा रहा था। जकड़ नहीं रहा था। वो बस पकड़े हुए था, जैसे कोई डूबता हुआ आदमी किनारा पकड़ता है।
ऊपर से हाथ आ रहा था। मीरा की आवाज़ आई — दूर, दबी हुई, जैसे कुएँ से सुनी जाए। "खींचो! टिंकू, खींचो!"
मैं ऊपर आने लगा। पर मैंने अपना दूसरा हाथ नीचे किया। तेल के अंदर। और उस आदमी का हाथ पकड़ लिया।
वो काँप रहा था। पूरा काँप रहा था, जैसे बुख़ार में हो।
मैंने उसे ऊपर खींचा। मेरी छाती फटने लगी, साँस रुक गई, पर मैंने हार नहीं मानी। मीरा और टिंकू ऊपर से खींच रहे थे, मैं नीचे से, और वो आदमी बीच में।
हम तीनों-चारों एक साथ तेल के बाहर गिरे, फर्श पर। मैंने ज़ोर से खाँसा। तेल मेरे गले से नीचे उतरा था। जीभ पर उसका स्वाद आया — सड़ा हुआ, कड़वा, जैसे पुरानी कड़ाही में बासी तेल जल गया हो।
और फिर मैंने उस आदमी को देखा, जो मेरे बगल में पड़ा हाँफ रहा था।
वो कंकाल जैसा था। हड्डियाँ चमड़ी को चीरती दिख रही थीं। पसलियाँ गिनी जा सकती थीं। पर सबसे बुरा उसका चेहरा था — आधा जला, आधा ठीक, और उस ठीक वाले हिस्से पर एक पुरानी दाढ़ी के बाल उगे हुए थे, जैसे किसी सूखे खेत में कुछ बचा हुआ हो।
कालू काका पीछे खड़े थे।
उन्होंने पहले मुझे देखा। फिर उस आदमी को।
और फिर कुछ ऐसा हुआ जो मैं कभी नहीं भूलूँगा।
कालू काका की लाठी हाथ से छूट गई। वो दीवार का सहारा छोड़कर आगे आए। एक कदम, दो कदम — और उनके पैर लड़खड़ाने लगे। वो घुटनों के बल गिर पड़े, और उनके मुँह से एक आवाज़ निकली — न रोना, न चीख। कुछ और। जैसे किसी जानवर को मारते वक़्त की आवाज़।
"चंदन।"
वो नाम ऐसे निकला जैसे उनके सीने में तीस साल से दबा हुआ था और अब फट पड़ा हो।
वो आदमी — चंदन सिंह — अपना सिर उठा नहीं पाया। बस उसकी एक आँख से पानी बहने लगा। तेल के साथ मिलकर अजीब सी लकीरें बनाने लगा।
कालू काका रेंगकर उसके पास पहुँचे। उन्होंने अपना हाथ बढ़ाया — वही हाथ जो तीस साल पहले एक मरते हुए आदमी की तरफ़ बढ़ा था और लौट आया था — और इस बार उन्होंने चंदन का कंधा पकड़ा।
"तू ज़िंदा है," कालू काका ने कहा। आवाज़ ऐसी जैसे किसी और की हो। "तू ज़िंदा है, चंदन। तू मेरे सामने ज़िंदा है।"
चंदन ने अपना सिर हिलाया। धीरे से। बस एक बार।
और फिर कालू काका ने उसे अपनी छाती से लगा लिया। उनके हाथ उस जले हुए शरीर पर चल रहे थे, जैसे कोई अंधा आदमी अपने बेटे का चेहरा टटोल रहा हो। और वो रो रहे थे। ऐसे रो रहे थे जैसे किसी पुराने बाँध को तोड़ दिया गया हो।
टिंकू ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया। मीरा दीवार का सहारा लेकर खड़ी थी, और उसकी आँखें भी भरी हुई थीं, पर वो रो नहीं रही थी। वो देख रही थी। मीरा जब भी दुखी होती है, तो पहले देखती है, फिर रोती है।
मैं अपने घुटनों के बल बैठा था, तेल मेरे पूरे शरीर से टपक रहा था। और मेरे अंदर एक बात खटक रही थी।
चंदन बोल नहीं पाता था। उसकी ज़ुबान जल चुकी थी। उसकी आवाज़ गई थी। पर उसने तेल में मुझे पकड़ा क्यों था? वो नीचे क्यों बैठा था?
मैंने उसकी तरफ़ देखा। वो भी मेरी तरफ़ देख रहा था। एक आँख से।
और फिर उसने अपना हाथ उठाया। जली हुई हथेली। उसने उँगली से ज़मीन पर लिखना शुरू किया। उँगली काँप रही थी, और तेल में लिखाई फैलती जा रही थी, पर मैंने पढ़ लिया।
"मैं मरा नहीं।"
हम चारों उसके ऊपर झुक आए।
"मैंने खुद को मार डाला था।"
कालू काका की साँस रुक गई। "का… क्या कह रहा है तू, चंदन?"
चंदन ने फिर लिखा, धीरे-धीरे, एक-एक अक्षर करके, जैसे किसी बच्चे को लिखना सिखा रहा हो।
"उस रात के बाद, मैंने अपना नाम मार दिया। अपनी आवाज़ मार दी। अपना चेहरा मार दिया। जो बचा, वो सिर्फ़ कान थे। ताकि सुन सकूँ। ताकि किसी दिन किसी को बता सकूँ।"
मेरी छाती में कुछ भारी हो गया।
मीरा ने धीरे से कहा, "तुमने खुद को ज़िंदा रखने के लिए कभी बोला ही नहीं।"
चंदन ने उसकी तरफ़ देखा। फिर सिर हिलाया।
"तो तू तीस साल से इसी तेल में बैठा था?" टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ टूट रही थी। "इसी में? इस ठंडे, सड़े हुए तेल में?"
चंदन ने सिर हिलाया। फिर उसने अपनी जली हथेली टिंकू की तरफ़ की। उस पर चमड़ी नहीं थी — सिर्फ़ गुलाबी, खिंचा हुआ मांस, और उस पर सफ़ेद निशान, जैसे कोई धागे से सिलाई कर गया हो।
टिंकू ने देखा और उसका रंग उतर गया। "ये तुमने… अपनी हथेली पर…"
चंदन ने ज़मीन पर लिखा — "बाबा हरिदास ने सिल दी थी। ताकि मैं कुछ पकड़ न सकूँ। ताकि मैं भाग न सकूँ।"
"पर तुम तो यहाँ से भाग सकते थे," मैंने कहा। "ये गड्ढा तुम्हारे पास है। तुम रोज़ ऊपर आ सकते थे।"
चंदन ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी एक आँख में कुछ ऐसा था जो मुझे समझ नहीं आया। वो फिर लिखने लगा, और इस बार उसकी उँगली तेज़ चल रही थी, जैसे अंदर से कुछ फूट रहा हो।
"मैं भागता तो बाबा मेरी माँ को मार देता। मेरे गाँव के बच्चों को मार देता। वो मुझसे कहता था — तू यहीं रह, तेरा बाप ज़िंदा है, तेरी माँ ज़िंदा है, और अगर तू दिखा किसी को, तो सब खत्म।"
कालू काका ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया। "मैं तेरे लिए रोज़ आता था, चंदन। रोज़ इस दीवार के पास खड़ा होता था। मुझे पता था तू यहीं है। मुझे पता था—"
चंदन ने उनका हाथ अपने हाथ से दबाया। फिर लिखा — "मुझे पता है, बाबा। मैं तुझे सुनता था। तू रोज़ आता था और कहता था — 'अगर तू सुन रहा है तो एक आवाज़ कर।' और मैं नहीं करता था। क्योंकि अगर मैं करता, तो बाबा हरिदास तुझे भी खत्म कर देता।"
कालू काका ने कोई जवाब नहीं दिया। वो सिर्फ़ अपने बेटे का सिर अपनी गोद में रखकर रोते रहे, और उनके आँसू चंदन के जले हुए चेहरे पर गिर रहे थे।
मैंने देखा और मेरा गला भर आया। मैंने कभी कालू काका को रोते नहीं देखा था। वो हमेशा वैसे ही खड़े रहते थे — कुबड़े, चुपचाप, जैसे अखाड़े की मिट्टी हो। आज वो मिट्टी की तरह टूट रहे थे।
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