Spirit of a Fighter – Chapter 744
दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई। इस बार ज़ोर से। और साथ में एक आवाज़ — बूढ़ी, थकी, पर गहरी।
"खोलो। मैं वो हूँ जो तुम्हें खोज रहा है। कुछ देर से आया, पर आया ज़रूर।"
मीरा ने मेरी आँखों में देखा। मैंने हल्का सा सिर हिलाया।
कालू काका काँप रहे थे। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा।
"वीर," उन्होंने कहा, "ये आवाज़…" वो पूरी नहीं कह पाए।
मैंने उनका हाथ थाम लिया। फिर मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा। मेरे कदम धीरे थे, पर मेरे अंदर कुछ ऐसा जाग रहा था जो डर नहीं था — जैसे पूरी उम्र का इंतज़ार एक ही पल में आकर खड़ा हो गया हो।
मैंने कुंडी उठाई।
दरवाज़ा खुला।
बाहर चाँदनी में एक आदमी खड़ा था। लंबा। बड़ा शरीर, जो अब झुक गया था। सफ़ेद बाल, बड़ी सफ़ेद मूँछें। हाथ में लाठी। और उसके पीछे, दूर, खंडहर की दीवार के पास, एक लालटेन जल रही थी — जिसकी रोशनी खंडहर की दीवार पर एक लंबी छाया बना रही थी।
आदमी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें धँसी हुई थीं, और उनमें वो चीज़ थी जो रामलाल के घर के पड़ोसन ने बताई थी — पानी।
"तू वीर है?" उसने पूछा। उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जैसे वो रो रहा हो, पर आँसू नहीं आ रहे हों। "शेर सिंह का बेटा?"
मेरे पीछे मीरा आ गई। उसकी आवाज़ सख़्त थी।
"आप कौन हैं?" उसने पूछा। "और अंदर आने से पहले अपना नाम बताइए।"
आदमी ने अपना सिर हिलाया, जैसे उसे मीरा की बात पसंद आई हो। फिर उसने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई और अपने दोनों हाथ सामने फैला दिए — जैसे कोई अपने आप को सौंप रहा हो।
"मेरा नाम ग़ुलाम रसूल है," उसने कहा। "मैं उस अखाड़े का पहला पहलवान था जिसे भैरव के ज़हर से मारा गया था। पर मैं मरा नहीं। मैं बस — बीस साल से मरने से मना कर रहा हूँ।"
उसने एक कदम आगे बढ़ाया। उसकी लाठी ज़मीन पर टकराई, और वो आवाज़ उस रात की चुप्पी में फैल गई जैसे कोई पत्थर कुएँ में गिरा हो।
"और तेरे पापा का नाम," उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब बिलकुल साफ़ थी, "उसी पन्ने पर लिखा है जो तूने अभी अपनी कमर में छिपाया है।"
मैं जम गया।
कमरे में इतनी चुप्पी छा गई कि लालटेन की लौ की आवाज़ सुनाई देने लगी — धीमी, काँपती हुई, जैसे कोई हमारे साथ साँस ले रहा हो।
ग़ुलाम रसूल ने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों से एक आँसू गिरा। उसने उसे पोंछा नहीं।
"मैं तेरे पापा का हमसफ़र हूँ, वीर," उसने कहा। "और मैं वो आदमी हूँ जिसे तेरे पापा ने उस रात बचाया था — खुद मरकर।"
मेरे पैर कमरे के फर्श पर जम गए। पापा। मेरे पापा ने किसी को बचाया था? मैंने हमेशा सुना था कि वो बुख़ार से मरे — अचानक, बिना किसी को कुछ कहे। माँ आज तक कहती है कि उनकी आँखें मरने से पहले तक खुली थीं, जैसे कुछ कहना बाकी हो।
"अंदर आइए," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ काँप रही थी, पर वो खड़े थे। "आप बाहर खड़े रहेंगे तो ये रात और भारी हो जाएगी।"
ग़ुलाम रसूल अंदर आए। उनका एक पैर सीधा नहीं पड़ता था — वो लाठी के सहारे चलते थे। जब वो लालटेन के पास आए, तो मैंने उनका चेहरा ठीक से देखा। उम्र ने उन्हें खूब पीटा था, पर उनकी आँखें जवान थीं। जवान और थकी हुई।
"बैठिए," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ अब नरम थी, पर उसकी नज़र ग़ुलाम रसूल की लाठी पर टिकी थी।
"नहीं," उन्होंने कहा। "मैं बैठूँगा तो फिर उठना मुश्किल होगा। और ये बात खड़े होकर ही कहनी है।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तेरे पापा शेर सिंह अखाड़े में नए थे। मैं उस वक़्त का सबसे बड़ा पहलवान था — सब मुझे शेर कहते थे, पर असली शेर तो वो था। भैरव ने मुझे पानी पिलाया। रात में मेरी नसें जलने लगीं। मैं अखाड़े के पीछे कीचड़ में गिरा और मरने लगा। तेरे पापा ने मुझे उठाया, अपने कंधे पर रखा, और पूरी रात दौड़ते रहे — एक गाँव से दूसरे गाँव, वैद्य से वैद्य। उन्होंने मुझे बचा लिया। पर उस रात भैरव के आदमियों ने उन्हें पहचान लिया। और जो आदमी उसका ज़हर पीकर बच जाए — भैरव उसे ज़िंदा नहीं छोड़ता।"
मेरा गला सूख गया। "तो पापा बुख़ार से नहीं मरे?"
ग़ुलाम रसूल ने अपनी आँखें बंद कर लीं। "बुख़ार का नाम उसने खुद रखा था। मरने से पहले उसने मुझसे कहा — 'ग़ुलाम, मेरे बेटे को मत बताना कि मैं कैसे मरा। उसे ये लड़ाई विरासत में मत देना।' मैंने वादा किया। पर आज तेरी नाक ने मुझे पकड़ लिया, और मैं अपना वादा तोड़ रहा हूँ। क्योंकि ये लड़ाई अब तेरी विरासत नहीं — तेरी ज़िंदगी है।"
मैंने कमरबंद से फ़ाइल निकाली। मेरे हाथ काँप रहे थे, पर मैंने उसे खोला और पन्ने पलटने लगा। मेरी नज़रें उन नामों पर दौड़ीं — नाम, तारीख़, रकम। और फिर रुक गईं।
"शेर सिंह," मैंने पढ़ा। मेरी आवाज़ फट गई। "मौत — बुख़ार। रकम — चार हज़ार।"
कमरा चुप हो गया।
"चार हज़ार," कालू काका ने धीरे से दोहराया। जैसे वो रकम नहीं, किसी की जान तौल रहे हों। "मेरे बेटे की कीमत भी चार हज़ार थी।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था, पर वो रो नहीं रहा था। वो बस मुझे देख रहा था — जैसे पूछ रहा हो कि अब हम क्या करें।
ग़ुलाम रसूल ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई और उसके सहारे झुककर मेरे पास आए। उन्होंने फ़ाइल में देखा, और उनका चेहरा किसी पुराने ज़ख़्म की तरह सिकुड़ गया।
"मैं इनमें से कई को जानता हूँ," उन्होंने कहा। "अठारह में से ग्यारह को।" उन्होंने एक नाम पर उँगली रखी। "ये रामू था। मेरे साथ अखाड़े में दंगल लड़ता था। इसकी माँ आज भी मुझे रोटी देती है — इसलिए नहीं कि वो मुझे प्यार करती है, बल्कि इसलिए कि मैं इसका आख़िरी दोस्त हूँ।" उनकी आवाज़ भारी हो गई। "मैं उसकी माँ से क्या कहूँ? कि उसका बेटा पानी से नहीं, एक आदमी के लालच से मरा?"
"भैरव कहाँ है?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी। "अगर वो इतने सालों से ये कर रहा है, तो उसके पास कोई न कोई तो होगा। कोई जगह। कोई ठिकाना।"
ग़ुलाम रसूल ने मीरा की तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में पहली बार कुछ और आया — डर। असली डर।
"उसका ठिकाना वो जगह है जहाँ तक कोई नहीं पहुँचता," उन्होंने कहा। "पर एक बात है। भैरव अब जवान नहीं है। वो भी मेरी तरह बूढ़ा हो गया है। और जो आदमी बूढ़ा होता है, वो जल्दी में होता है। उसे डर है कि वो मरने से पहले अपना काम पूरा कर ले।"
"काम?" मैंने पूछा। "कौन-सा काम?"
ग़ुलाम रसूल ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे वो मेरे अंदर कुछ ढूँढ रहे हों। फिर उन्होंने अपनी लाठी उठाई और उसका सिरा मेरी छाती की तरफ़ किया।
"अठारह पूरे हो गए," उन्होंने कहा। "उसे उन्नीस चाहिए। और उन्नीसवाँ तू है, वीर। शेर सिंह का बेटा। जिसने उसका ज़हर पीकर भी उसे हराया था — उसका बेटा।"
मेरे पैरों तले ज़मीन फिर खिसकी। टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी पकड़ मज़बूत थी।
"तो फिर हम उससे पहले," कालू काका बोले, "उस तक पहुँचेंगे।"
ग़ुलाम रसूल ने अपना सिर हिलाया, धीरे से। "उस तक पहुँचने का एक ही रास्ता है। और वो रास्ता उस पानी से होकर जाता है। जो पानी मैंने पीया, जो तेरे पापा ने पीया।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "तुझे वो पानी पीना पड़ेगा, वीर। पर इस बार — पीने के लिए नहीं। पहचानने के लिए। तेरी नाक को वो गंध याद रखनी पड़ेगी जो सिर्फ़ भैरव के पास है। और उसके लिए तुझे उसके बहुत पास जाना होगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल था, और उस सवाल के पीछे एक और सवाल — क्या तू ये कर पाएगा?
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