Spirit of a Fighter – Chapter 745
मैंने ग़ुलाम रसूल की आँखों में देखा। उनमें मेरे पापा की याद थी। और मेरे पापा की आख़िरी इच्छा — कि उनका बेटा इस लड़ाई से दूर रहे। पर मैं अब दूर नहीं था। मैं बीच में था।
"मैं तैयार हूँ," मैंने कहा।
तभी खंडहर के बाहर, दूर, उस लालटेन की रोशनी में जो दीवार पर पड़ी थी — एक और छाया आई। लंबी। और उस छाया के साथ एक आवाज़ आई। कोई गा रहा था। धीमी, टूटी आवाज़ में। कोई पुराना गीत।
ग़ुलाम रसूल का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"ये आवाज़," उन्होंने फुसफुसाया। "भैरव का पहला शिष्य। जिसे सब भूल गए थे। पर वो कभी नहीं भूला।"
और दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई।
॥
दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई।
सब रुक गए। ग़ुलाम रसूल की लाठी हवा में ही रह गई। टिंकू ने मेरा हाथ और कसकर पकड़ लिया। खंडहर के बाहर वो टूटी आवाज़ अब भी गा रही थी, पर धीरे-धीरे फीकी पड़ रही थी, जैसे कोई गाते-गाते दूर चला जा रहा हो।
कालू काका ने लालटेन उठाई और दरवाज़े की तरफ़ बढ़े। उनके हाथ काँप रहे थे, पर कदम नहीं रुके।
"रुको," मैंने कहा। मैंने आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली। हवा में गंध मिला रही थी — गीली मिट्टी, जला हुआ तेल, और वो पुरानी चमड़े की चप्पल। पर दरवाज़े के उस पार कोई ज़िंदा साँस नहीं थी। मुझे इंसान की गंध नहीं मिली।
"बाहर कोई नहीं है," मैंने कहा। "जो भी था, चला गया।"
कालू काका ने दरवाज़ा खोला। बाहर सिर्फ़ अंधेरा था और दूर, लालटेन की रोशनी में, धूल उड़ती दिख रही थी। ज़मीन पर एक लिफ़ाफ़ा पड़ा था। पुराना, पीला, किनारों से फटा हुआ। उस पर मेरा नाम लिखा था — वीर सिंह। लिखाई मोटी स्याही से थी, और वो स्याही अभी भी गीली लग रही थी।
मैंने लिफ़ाफ़ा उठाया। उसे सूंघा। उसमें वही गंध थी जो मैंने उस जली चिट्ठी में पकड़ी थी — जला काग़ज़, पुरानी चप्पल, और मिट्टी में मिला तेल। पर इस बार कुछ और भी था। कपूर। मंदिर जैसी गंध।
ग़ुलाम रसूल ने मेरी तरफ़ देखा। "खोलो मत।"
"क्यों?"
"क्योंकि ये वो भेजता है जो जानता है कि हम कहाँ हैं। और जो आदमी जानता है कि तुम कहाँ हो, वो तुम्हें बताने के लिए कुछ भेजता है — बताने के लिए नहीं, डराने के लिए।"
मैंने लिफ़ाफ़ा खोल दिया।
अंदर एक तस्वीर थी।
पुरानी तस्वीर। बीस-तीस साल पुरानी। सफ़ेद-काले रंग में, किनारों से मुड़ी हुई, बीच से एक जगह मोटी काग़ज़ से जुड़ी हुई। मैंने उसे कालू काका की लालटेन के नीचे किया।
तस्वीर में मिट्टी थी। अखाड़े की लाल मिट्टी। और उसमें तीन नौजवान पहलवान खड़े थे। तीनों के शरीर पर सिर्फ़ लंगोट, बदन पर मिट्टी, हाथों में गदा जैसी कोई चीज़। तीनों हँस रहे थे — वो हँसी जो सिर्फ़ जवानी में आती है, जब दुनिया में कोई डर नहीं होता।
और उनके पीछे, थोड़ी दूर, एक साधु बैठा था। कमंडल, जटा, तिलक। चेहरा धुँधला था — जैसे तस्वीर खींचते वक़्त वो हिल गया हो, या जैसे किसी ने जान-बूझकर उस पर उँगली फेर दी हो।
मैंने तस्वीर पलटी।
पीछे लिखा था, वही मोटी स्याही से — "जो अपने गुरु को भूल गया, उसका शिष्य भी उसे भूलेगा।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
मीरा ने मेरे कंधे के ऊपर से तस्वीर देखी। उसने उसे देर तक देखा, फिर उसकी आँखें सिकुड़ीं। उसने अपनी जेब से एक छोटी तस्वीर निकाली — वो तस्वीर जो उसे उसके पापा ने दी थी। रणवीर सिंह की जवानी की तस्वीर।
"लाइट इधर करो," उसने कहा।
कालू काका ने लालटेन आगे की। मीरा ने दोनों तस्वीरें पास-पास रखीं। उसकी तस्वीर में रणवीर सिंह अकेले खड़े थे, मिट्टी में, हाथ में गदा। और उनके पीछे, बहुत पीछे, धुँधले से — वही साधु।
"ये साधु," मीरा ने धीरे से कहा, और उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी ठंडक थी, "ये तो वही है जो रणवीर सिंह की पुरानी तस्वीर में था।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि मुझे अपनी साँस तेज़ सुनाई दे रही थी।
कालू काका ने तस्वीर मेरे हाथ से ली। उन्होंने उसे आँखों के बहुत पास किया। उनके होंठ काँपने लगे। और फिर उनका पूरा शरीर काँपने लगा — जैसे कोई बूढ़ा पेड़ अचानक हवा में झुक जाए।
"ये… ये बाबा हरिदास हैं," उन्होंने फुसफुसाया।
फिर उन्होंने तीन पहलवानों की तरफ़ उँगली की। पहला — मोटी मूँछों वाला, चौड़ी छाती। "ये रणवीर सिंह।" दूसरा — लंबा, घुंघराले बाल, हँसता हुआ। "ये… ये शेर सिंह। तेरे पापा।"
उनकी उँगली तीसरे पर रुकी। उन्होंने उसे छुआ नहीं, बस हवा में ही रोक दिया। उनकी आँखों से पानी बहने लगा, सफ़ेद दाढ़ी में गिरता हुआ।
"और ये तीसरा…" उनकी आवाज़ टूट गई। "ये… चंदन।"
मैंने एक पल सोचा कि मैंने ग़लत सुना। फिर मेरे पेट में एक झटका लगा, जैसे कोई सीढ़ी से गिरा हो।
"चंदन?" मैंने कहा। "कालू काका, तुम्हारा बेटा?"
कालू काका ने कोई जवाब नहीं दिया। वो बस तस्वीर को सीने से लगाकर खड़े रहे, और उनके कंधे हिल रहे थे। बूढ़े आदमी का रोना अजीब होता है — आवाज़ नहीं आती, बस शरीर हिलता है, जैसे अंदर कुछ टूट रहा हो।
टिंकू ने उनका कंधा पकड़ लिया। "काका, बैठिए।"
"मैंने इसे तस्वीर में देखा है," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ किसी और की लग रही थी। "ये तस्वीर मेरे घर में थी। मेरे बेटे की। बीस साल पहले। जब चंदन… जब चंदन नहर में मिला था, तब मैंने ये तस्वीर जलानी चाही थी। पर मैं जला नहीं पाया। मैंने इसे उसी दिन किसी के हाथ में दे दिया जिस पर मुझे भरोसा था।"
"किसके हाथ में?" मैंने पूछा।
"नहीं पता," उन्होंने कहा। "मैंने उस आदमी का चेहरा नहीं देखा। उस रात बारिश थी। उसने कहा — 'मैं इसे सुरक्षित रखूँगा। ये तेरे बेटे की आख़िरी निशानी है।' और मैंने दे दी।" उन्होंने सिर उठाया, और उनकी आँखें लाल थीं। "तीस साल से ये तस्वीर मेरे पास नहीं थी। और अब ये… ये लिफ़ाफ़े में आई है। बाबा हरिदास भेज रहा है।"
टिंकू ने तस्वीर को गौर से देखा। उसका चेहरा गंभीर था, जो मैंने कभी नहीं देखा था। "तो बाबा हरिदास ने ये तस्वीर भेजी है। मतलब वो हमें बता रहा है कि वो सब जानता है। कि वो जानता है कि हम क्या खोज रहे हैं।"
"नहीं," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ खुद मुझे सुनकर अजीब लगी। "वो हमें बता रहा है कि हम गलत रास्ते पर हैं।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "कैसे?"
"देखो क्या लिखा है।" मैंने तस्वीर उलटी करके उनकी तरफ़ की। "जो अपने गुरु को भूल गया, उसका शिष्य भी उसे भूलेगा। ये बात भैरव के लिए नहीं है। ये बात मेरे पापा के लिए है। और रणवीर सिंह के लिए। और… और चंदन के लिए।" मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। "काका, तुम्हारे बेटे ने अपना गुरु भुला दिया था, ना? इसीलिए ये हुआ।"
कालू काका ने आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उन्होंने धीरे से कहा, "चंदन बाबा हरिदास का शिष्य था। तीनों थे। तीनों भाई। और उन्हीं के आशीर्वाद से तीनों पहलवान बने।" उन्होंने तस्वीर में साधु की तरफ़ देखा। "और फिर… फिर सब भूल गए। पैसा आया, नाम आया, और गुरु पीछे छूट गया।"
मेरे मन में एक सवाल उठा, जो मुँह से निकल गया। "पर बाबा हरिदास यही तो चाहता है, ना? वो खुद तो उन्हें ज़हर पिलवा रहा है।"
ग़ुलाम रसूल ने अपनी लाठी ज़मीन पर मारी। एक टन की आवाज़ गूँजी। "बेटा, तू अभी भी नहीं समझा। बाबा हरिदास किसी को ज़हर नहीं पिलवाता। वो सिर्फ़ वो हिसाब लेता है जो उसके शिष्यों ने खुद अपने हाथों से बिगाड़ा। भैरव उसका हथियार है। माधव उसका पैसा है। और तेरे पापा… तेरे पापा उसकी सबसे बड़ी गलती।"
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