Spirit of a Fighter – Chapter 743
मीरा की साँस रुक गई। वो बैठ गई, वहीं घास पर, और फ़ाइल को गोद में रखकर एक-एक पन्ना पलटने लगी। उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी। जैसे वो अंदर ही अंदर गिनती कर रही हो।
टिंकू उसके पास बैठ गया। उसने उँगली से पन्ने गिने।
"भाई," उसकी आवाज़ अटक गई। "ये… ये सोलह हैं।"
मीरा ने आख़िरी पन्ना पलटा और उसका हाथ रुक गया। उसने पन्ना उठाया और देर तक देखा, फिर धीरे से बोली, "सत्रह।"
मैंने फ़ाइल उसके हाथ से ले ली। पन्ने मेरे हाथ में थे, और मुझे लगा जैसे मैं किसी की चिता उठा रहा हूँ। हर पन्ना वज़नी था। हर नाम के नीचे एक ज़िंदगी थी — एक माँ का बेटा, किसी का भाई, किसी का पति। और उन सबके आगे एक ही लाइन, जैसे मौत को कोई और नाम दे दिया गया हो।
"अठारह," मैंने कहा। "ये सत्रह हैं। और एक और होना चाहिए।"
"क्यों?" मीरा ने पूछा।
"क्योंकि भैरव ने अखाड़े में खुद कबूल किया था — ग्यारह पहलवान उसकी बोतल से मरे। और ग्यारह सिर्फ़ पिछले कुछ साल के हैं। बीस साल का हिसाब है ये।"
मीरा ने फ़ाइल फिर खोली। उसने पन्ने उलटे किए, हिलाए, आख़िरी पन्ने और कवर के बीच उँगली डाली।
"यहाँ," उसने कहा। "एक पन्ना फटा है। जान-बूझकर फाड़ा गया है। देखो — किनारा अंदर की तरफ़ मुड़ा है। कोई जल्दी में था।"
टिंकू ने काग़ज़ निकाला — अपनी जेब से एक पुरानी परची, पेंसिल के कुछ टुकड़े।
"भाई," उसने कहा, "मुझे पता है ये क्या है। ये अठारह माँओं के बेटे हैं। अठारह। कोई इन्हें भूल जाए, तो मैं नहीं भूलूँगा।"
उसने पेंसिल उठाई और पहला नाम उतारना शुरू किया। उसका हाथ काँप रहा था, इसलिए अक्षर टेढ़े हो रहे थे, पर वो रुका नहीं।
मैंने पन्ने पलटने शुरू किए। एक-एक नाम। एक-एक तारीख़। एक-एक रकम। और हर रकम के आगे वही चार शब्द। मेरी आँखें नामों पर दौड़ रही थीं, जैसे कोई मुझे नीचे खींच रहा हो।
फिर मेरा हाथ रुका।
पन्ना नौ पर।
"शेर सिंह — मौत, बुख़ार।"
मेरी आँखों के सामने अक्षर धुंधले हो गए। मैंने पलक झपकाई, पर वो नाम वहीं था। मेरे पापा का नाम। मेरे पापा की मौत। एक पन्ने पर। एक रकम के साथ। जैसे उनकी ज़िंदगी एक हिसाब की लाइन हो।
फ़ाइल मेरे हाथ से छूट गई। वो घास पर गिरी, पन्ने बिखर गए — सफ़ेद पन्ने, भूरे पन्ने, उन पर लिखे नाम। लालटेन की रोशनी में लगा जैसे घास पर किसी ने क़ब्रों की कतार बिछा दी हो।
मैं घुटनों पर बैठ गया।
"वीर।" मीरा मेरे पास आई। उसने पन्ने समेटे, फ़ाइल उठाई, और मेरे सामने बैठ गई। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वो ज़िद थी जो मैं जानता था। "ये काग़ज़ नहीं है, वीर। ये अठारह क़त्ल हैं। और क़त्ल करने वाले ने खुद अपना हिसाब लिखकर रखा है। इसका मतलब — वो इसे कभी ख़त्म नहीं होने देना चाहता था। पर आज ये हमारे हाथ में है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके माथे पर पसीना था और आँखों में वो चमक — जो उस वक़्त आती है जब कोई सच को ज़मीन पर उतारने की तैयारी कर रहा हो।
"मेरे पापा का नाम," मैंने कहा। मेरी आवाज़ सूखी थी। "वो भी इसी लिस्ट में है। बुख़ार।"
"मुझे पता है," उसने धीरे से कहा। "मैंने देख लिया।"
तभी कालू काका की आवाज़ आई। वो दीवार के सहारे टिके हुए थे, और उनका शरीर धीरे-धीरे नीचे सरक रहा था, जैसे कोई पुरानी थैली खाली हो रही हो। वो घास पर बैठ गए। उनके हाथ काँप रहे थे — वो हाथ जिन्होंने बीस साल अखाड़े की मिट्टी सींची थी।
"अठारह," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी कुएँ से आ रही हो। "मैंने इनमें से कितनों को अपने हाथों से मिट्टी में लिटाया है। चार? पाँच? मुझे याद भी नहीं। मैं उनके पैर पकड़कर लेटाता था, उनका मुँह धोता था, और उनकी माँ को ये कहता था — 'बेटा बुख़ार से गया, भगवान को यही मंज़ूर था।'"
उनकी आवाज़ टूट गई। उन्होंने अपने चेहरे पर हाथ रख लिया।
"मैं झूठ बोलता रहा," वो फुसफुसाए। "बीस साल। हर माँ के सामने। हर दरवाज़े पर।"
टिंकू ने लिखना रोक दिया। वो कालू काका के पास गया और उनके सामने घुटनों के बल बैठ गया।
"काका," उसने कहा। "जो आदमी अपना गुनाह अपने मुँह से बोल देता है — वो अब गुनहगार नहीं रहा।"
कालू काका ने हाथ हटाया। उनकी आँखें भरी हुई थीं। उन्होंने टिंकू का सिर सहला दिया, बस एक बार।
मैंने पन्ने समेटे और फ़ाइल फिर खोली। मेरे हाथ अब काँप नहीं रहे थे। अजीब बात थी — जितना ज़्यादा नाम पढ़ता, उतना ही सिर ठंडा होता जा रहा था। ये गुस्सा नहीं था जो मेरे अंदर उठ रहा था। ये कुछ और था। जैसे मेरे अंदर किसी ने एक सिपाही जगा दिया हो।
"टिंकू," मैंने कहा। "कितने काग़ज़ हैं तेरे पास?"
"दो," उसने कहा। "और पेंसिल आधी बची है।"
"ये फ़ाइल मेरे पास रहेगी। तू जो लिख रहा है — वो तीन कॉपी में लिख। एक मेरे लिए, एक मीरा के लिए, और एक पंचायत के लिए।"
"पंचायत?" चुन्नी ने कहा। वो अब तक खंडहर की दीवार से टिका खड़ा था। "इसे पंचायत में ले जाएगा तो माधव सिंह उसे जला देगा। वो सरपंच है, पगला है।"
"तभी तो," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो पुरानी बहस वाली तेज़ी लौट आई, "हम इसे पंचायत में ले जाएँगे। जब पूरा गाँव सुन रहा हो, तब इसका कोई जला नहीं सकता।"
चुन्नी ने उसकी तरफ़ देखा, फिर मेरी। फिर उसने अपनी कमर से कुछ निकाला — एक छोटी सी थैली। उसे खोला। अंदर एक लोहे की चाबी थी, जिस पर जंग लगी थी।
"ये भी ले ले," उसने कहा। "भाई के पास दो चाबियाँ थीं। एक इस अलमारी की। और दूसरी — उस कमरे की जिसे भाई 'काग़ज़ों का कुआँ' कहता था।"
"काग़ज़ों का कुआँ?" मैंने कहा।
"मैंने कभी उसे खोला नहीं," चुन्नी ने कहा। "पर भाई बीस साल से वहाँ जाता था। रात में। अकेला। और लौटकर आता तो उसका चेहरा ऐसा होता जैसे उसने किसी की क़ब्र खोदी हो।"
मैंने चाबी ली। वो ठंडी थी, और अजीब तरह से भारी।
तभी बाहर से आवाज़ आई।
चलने की आवाज़। धीमी, भारी, एक पैर पूरा पड़ता और दूसरा घसीटता — जैसे कोई चलते हुए खुद को रोक रहा हो।
मैं उठ खड़ा हुआ। मेरी नाक ने खुद काम करना शुरू कर दिया, बिना मेरे कहे। और मैंने वो गंध पकड़ी।
पुरानी मिट्टी में सना तेल। जली हुई काग़ज़। बरसों पुरानी चप्पल। और उसके ऊपर — एक साफ़ गंध, जैसे पानी में धुली हुई सफ़ेद रुई।
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
"ये गंध," मैंने धीरे से कहा। मेरी आवाज़ अपनी नहीं लगी। "ये वही है जो रामलाल के घर थी। सफ़ेद मूँछों वाला आदमी।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसका हाथ अपने बैग पर चला गया — वहीं जहाँ वो काली मिर्च और तुलसी का पाउडर रखती थी।
"तू पक्का जानता है?" उसने पूछा।
"नाक झूठ नहीं बोलती," कालू काका ने कहा। वो दीवार के सहारे उठ खड़े हुए। "और वीर की नाक तो —"
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
एक बार। धीमी। फिर दूसरी बार। फिर तीसरी। और तीसरी के बाद चुप्पी — इतनी गहरी कि मुझे अपनी साँस तक सुनाई दे रही थी।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसका मुँह खुला रह गया, और उसकी पेंसिल हाथ से छूट गई। वो नीचे गिरी और घास पर एक छोटी सी आवाज़ हुई — टक।
"भाई," उसने फुसफुसाकर कहा, "मैं… मैं काग़ज़ कहाँ छिपाऊँ?"
मैंने फ़ाइल उसके हाथ से ली और अपनी धोती में, पेट के पास, कमरबंद में खोंस दी। फिर मैंने मीरा और कालू काका की तरफ़ देखा।
"जो भी हो," मैंने कहा, "कुछ भी मत छिपाना। जो सामने खड़ा हो, उससे ऐसे बात करना जैसे सब कुछ पता है।"
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