Spirit of a Fighter – Chapter 736
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी बंद आँखें अब भी मेरी तरफ़ थीं।
"तुम क्यों बता रहे हो?" मैंने पूछा। "तुम्हें क्या मिलेगा?"
"कुछ नहीं," उसने कहा। "मैं थक गया हूँ, वीर सिंह। तीस साल एक छत पर खड़े-खड़े। मैं चाहता हूँ कि अब कोई और इसे संभाले।"
"कौन?"
"तू," उसने कहा। "जब नौ दिन बाद अदालत में सच खुलेगा, तो सिर्फ़ माधव नहीं गिरेगा। बहुत सारे चेहरे खुलेंगे। और उनमें से एक चेहरा तेरी माँ का भी होगा।"
मेरी साँस रुक गई।
"तू झूठ बोल रहा है," मैंने कहा। पर मेरी आवाज़ टूट रही थी।
"मैं झूठ नहीं बोलता," उसने कहा। "पर मैं इतना ज़रूर कहूँगा — तेरी माँ ने जो किया, वो बुरे के लिए नहीं किया। उसने तुझे बचाया। और जिससे बचाया, वो तू खुद है।"
वो पलटा। उसने लालटेन उठाई, और छत के किनारे की तरफ़ चलने लगा।
"रुको!" मैंने कहा। "तुम जा कहाँ रहे हो? तुम कहाँ रहते हो?"
"जहाँ मिट्टी है," उसने कहा, बिना पलटे। "वो मिट्टी जो तेरे पापा ने मुझे दी थी।"
"कौन-सी मिट्टी?"
वो रुका। उसने धीरे से कहा, "जो तेरे घर के नीचे है।"
और फिर वो छत के किनारे से नीचे उतर गया। न सीढ़ियों से। बस… किनारे से। मैं दौड़कर किनारे तक गया और नीचे झाँका।
नीचे कोई नहीं था।
सिर्फ़ मिट्टी थी, और उस मिट्टी पर कुछ निशान — जैसे किसी ने नंगे पैर चलकर ज़मीन को छुआ हो।
मीरा मेरे पास आई। उसने नीचे देखा, फिर मेरी तरफ़।
"वो गया," उसने कहा।
"हाँ।"
"वीर…" उसने मेरी बाँह पकड़ी। "जो उसने कहा — तेरी माँ के बारे में — वो—"
"मुझे नहीं पता," मैंने कहा। और मेरी आवाज़ में वो सच था जो मैं छुपा नहीं सकता था। "मुझे कुछ नहीं पता, मीरा।"
हम छत से नीचे उतरे। टिंकू और कालू काका नीचे इंतज़ार कर रहे थे। टिंकू ने मुझे देखा और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"भाई, तुम्हारा चेहरा—"
"टिंकू," मैंने कहा। "मुझे घर जाना है।"
"अभी? रात में?"
"अभी।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो समझ थी जो सिर्फ़ बूढ़े लोगों की आँखों में होती है — जिन्होंने बहुत कुछ देखा है।
"बेटा," उन्होंने धीरे से कहा, "जो छत पर मिला, उसे अपने अंदर मत रख। वो ज़हर है।"
"मैं ज़हर नहीं पी रहा, काका," मैंने कहा। "मैं सिर्फ़ सच पूछ रहा हूँ।"
"सच भी ज़हर होता है," उन्होंने कहा, "अगर ग़लत वक़्त पर पिया जाए।"
मैंने उनकी बात अनसुनी कर दी। मैंने मीरा और टिंकू को साथ लिया और अखाड़े से बाहर निकला।
रास्ते में मैंने एक बार पीछे मुड़कर देखा। छत पर लालटेन अब भी जल रही थी। एक छोटी-सी पीली बिंदी, ऊपर, अंधेरे में।
मैंने अपनी चाल तेज़ कर दी।
घर पहुँचा तो आँगन में चूल्हा जल रहा था।
ये अजीब था। इतनी रात को? माँ आमतौर पर इस वक़्त सो चुकी होती थीं। पर वो चूल्हे के पास बैठी थीं, और उनके हाथ में रोटी बेलने वाला चौका था। पर वो रोटी नहीं बेल रही थीं। वो बस बैठी थीं, और चूल्हे की आग उनके चेहरे पर पीली रोशनी डाल रही थी।
"माँ?"
उन्होंने सिर उठाया। उनकी आँखें लाल थीं। और उनके माथे पर हल्दी का टीका उतरा हुआ था, फैला हुआ, जैसे उन्होंने उसे पोंछने की कोशिश की हो और पोंछ न पाई हों।
"आ गया?" उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ सामान्य थी। बिलकुल सामान्य।
"माँ, तुम जाग रही हो?"
"नींद नहीं आ रही थी," उन्होंने कहा। "चूल्हा जलाया। सोचा, तू आएगा तो गरम रोटी खा लेगा।"
मैं उनके पास बैठ गया। मीरा और टिंकू आँगन के फाटक पर रुक गए — वो जानते थे कि ये वक़्त उनका नहीं है।
"माँ," मैंने कहा। "मुझे कुछ पूछना है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में कुछ ऐसा था — जैसे वो जानती थीं कि मैं क्या पूछने वाला हूँ। जैसे वो बरसों से इस सवाल का इंतज़ार कर रही थीं।
"पूछ," उन्होंने कहा।
"मैं तुम्हारा बेटा हूँ?"
चूल्हे की आग एक पल के लिए भड़की, फिर धीमी पड़ गई।
माँ ने चौका रख दिया। उन्होंने अपने हाथ आँचल से पोंछे। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो पानी आया जो उन्होंने बरसों से रोका हुआ था।
"तू मेरा बेटा है," उन्होंने कहा। "चाहे कोई कुछ भी कहे। तू मेरा बेटा है।"
"पर मैं तुम्हारे पेट से नहीं आया," मैंने कहा। "ना?"
उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मेरी तरफ़ देखती रहीं।
और उनकी चुप्पी ने वो सब कह दिया जो शब्द नहीं कह सकते थे।
"कौन थी वो औरत?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ काँप रही थी। "जो मुझे लेने आई थी?"
माँ ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उनके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उन्होंने धीरे से कहा —
"वो औरत तेरी माँ थी, वीर।"
मेरा दिल रुक गया।
"और मैं?" मैंने पूछा। "मैं कौन हूँ?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में वो प्यार था जो मैंने हर दिन देखा था — सुबह की दाल में, रात की रोटी में, ठंड में ओढ़ाई चादर में।
"तू मेरा बेटा है," उन्होंने दोहराया। "बस इतना जान ले। बाकी सब… बाकी सब मैं तुझे कल बताऊँगी।"
"क्यों नहीं आज?"
"क्योंकि आज रात," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार काँपी, "एक औरत आई थी। इसी आँगन में।"
मैं खड़ा हो गया। "कौन?"
"मैं नहीं जानती," माँ ने कहा। "पर उसने मुझे देखा और कहा — 'तेरा बेटा बड़ा हो गया। अब मैं उसे ले जाऊँगी।'"
मेरे रोंगटे खड़े हो गए।
"और तुमने क्या कहा?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर उनकी आवाज़ में लोहा था।
"मैंने कहा — 'जब तक मेरी साँस है, वो तेरा नहीं होगा।'"
और तभी आँगन के फाटक की तरफ़ से टिंकू की आवाज़ आई। वो दौड़ता हुआ आया, और उसका चेहरा ऐसा था जैसे उसने भूत देखा हो।
"भाई!" वो हाँफ रहा था। "बाहर… बाहर कोई है।"
"कौन?"
"एक औरत।" उसने गला साफ़ किया। "काले कपड़े। और उसके हाथ में…" वो रुका। "उसके हाथ में तेरी तस्वीर है।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उन्होंने अपना आँचल मुँह पर रख लिया।
मैं फाटक की तरफ़ बढ़ा। माँ ने मेरा आँचल पकड़ लिया।
"मत जा," उन्होंने कहा। आवाज़ इतनी धीमी कि लगा हवा में घुल गई।
"माँ, वो मेरी तस्वीर लेकर खड़ी है।"
"इसीलिए मत जा।" उनकी पकड़ ढीली नहीं हुई। "जो चीज़ लेने आता है, वो पहले आदमी को देखता है। जो चीज़ देने आता है, वो पहले चीज़ दिखाता है।"
मैं रुक गया। उनकी बात मेरे पेट में उतर गई।
"तो वो मुझे देखना चाहती है," मैंने कहा।
"वो तुझे तौलना चाहती है," माँ ने कहा। "देखना चाहती है कि बीस साल में तू कितना बड़ा हुआ। कितना डरा हुआ हुआ।"
टिंकू ने फाटक के पल्ले से झाँका, फिर सिकुड़कर पीछे हट आया।
"वो हिली नहीं," उसने फुसफुसाया। "इतनी देर से एक कदम भी नहीं। जैसे खंभा हो।"
कालू काका सामने आ गए थे। उन्होंने मेरा कंधा थपथपाया और बिना कुछ कहे फाटक की तरफ़ बढ़ गए। दरवाज़ा खोला।
बाहर अंधेरा था, पर हवा में एक गंध थी — गीली मिट्टी और सूखे फूलों की, जैसे किसी पुराने मंदिर का दरवाज़ा खुला हो।
"तू आई है," कालू काका ने कहा। मैंने उनकी आवाज़ में डर नहीं सुना। थकान सुनी। आदमी की थकान, जो बरसों से एक ही सवाल का जवाब ढो रहा हो।
"मैं आई हूँ," एक आवाज़ आई। औरत की आवाज़, पर जैसे किसी कुएँ से निकलकर आई हो। "बीस साल हो गए, कालू। तूने मुझे एक बार भी खबर नहीं भेजी कि वो कैसा है।"
"वो मेरा बेटा नहीं था," कालू काका ने कहा। "तुमने मुझे उसका ठेका दिया था। ठेके पर बेटा नहीं होते।"
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